| Friday, 02 March 2012 10:24 |
लक्ष्मी नारायण मिश्र अभी नवीन खोजों के आधार पर दक्षिणी राजस्थान में पेट्रोलियम का भी पता लगा है। इस संबंध में सबसे पहले वर्ष 2006 में भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जियोलॉजिकल सर्वे आॅफ इंडिया) द्वारा की गई खोजबीन से पता चला कि दक्षिणी राजस्थान में भी तेल के भंडार हैं। हवाई सर्वे द्वारा लिए गए अंतरिक्ष मानचित्र में दर्शनी चट्टानों को धरती के ऊपर निकला दर्शाया गया है। ये दर्शनी चट्टानें उसी अवस्था में ऊपर पाई जाती हैं, जब पहले उस स्थान पर समुद्र रहा हो और वहां भौगोलिक उथल-पुथल हुई हो। उदयपुर में रॉक सल्फेट की बहुतायत यह सिद्ध करती है कि पहले यहां समुद्र था। इसलिए यह स्पष्ट है कि यहां के भूगर्भ में तेल भंडार है, जो शायद मेवाड़-बागड़ अंचल के उन्नीस हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र तक फैला हुआ है। मेवाड़ का आदिवासी अंचल दुर्लभ जड़ी-बूटियों का खजाना भी है। मेवाड़ के उदयपुर, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ आदि जिलों के दुर्गम अंचलों में अनेक ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं जिनकी अच्छी जानकारी कुछ आदिवासियों और कथूड़ी लोगों को है। ये औषधीय वनस्पतियां और पौधे रोजगार के अच्छे साधन हो सकते हैं। लेकिन न तो सरकार की इसके विकास में कोई रुचि है और न ही इन्हें प्रशिक्षण देने वाला कोई है। इसी प्रकार यहां के जंगलों में बीड़ी बनाने में उपयोगी टिमरू के पत्ते, खजूर, गोंद, शहद, आंवला, सफेद मूसली आदि वनोपज बड़ी मात्रा में पाई जाती हैं। शीशम, सागवान, महुआ, बांस आदि के वृक्ष गरीब आदिवासियों की जीविका के साधन बन सकते हैं। मगर तस्करों के साथ मिलीभगत से वन विभाग इसे लुटवाने में लगा हुआ है। सच तो यह है कि जब से जंगल सरकार के नियंत्रण में गए हैं, तभी से खनिज संपदा के साथ-साथ वन संपदा भी उद्योगपतियों को मिली लूट की छूट के कारण खत्म होती जा रही है। यह बात मेवाड़ के अलावा देश के दूसरे बहुत-से इलाकों में भी लागू होती है। कर्नाटक का बेल्लारी क्षेत्र अवैध खनन और भ्रष्टाचार के कारण सुर्खियों में रहा है। मगर इस पर चर्चा नहीं हुई कि लौह अयस्क के तेजी से और अतिशय दोहन के कारण बेल्लारी के पर्यावरण का क्या हाल हुआ। खनन का दायरा बढ़ते जाने से वनक्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में खनन के लिए पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी अनिवार्य है। फिर भी वनक्षेत्रों में खनन का सिलसिला बढ़ता जा रहा है तो इससे यही जाहिर होता है कि या तो पर्यावरण मंत्रालय अपने दायित्वों को लेकर गंभीर नहीं है या उसे पर्यावरण से अधिक खनन उद्योग के हितों की चिंता है। अंत में, प्रश्न यह है कि सोना उगलने वाले वन प्रदेशों की जमीन में आदिवासी भूखे-नंगे, चिथड़ों में लिपटे हुए, जर्जर घासफूस की झोपड़ियों में ही अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर क्यों हैं? सोने की खानों की प्राप्ति के बाद भी इन क्षेत्रों के निवासियों का विकास क्यों नहीं हुआ है। चाहे वह दक्षिणी राजस्थान हो, झारखंड हो या फिर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और ओड़िशा का आदिवासी बहुल अंचल हो। इसका मूल कारण यह है कि भूमंडलीकरण के तहत अपनाया गया विकास का मॉडल ही गलत है। विकास के इस मॉडल में असीमित पूंजी और नवीनतम तकनीकी के बल पर हो रहा उद्योगीकरण श्रमिकों के शोषण, कृषि भूमि के विनाश, किसानों के विस्थापन, खनिज संपदा की लूट और पर्यावरण के विनाश का कारण बन गया है। चंद लोग और ज्यादा अमीर होते जा रहे हैं, तो व्यापक जनता और ज्यादा गरीब होती जा रही है। प्रकृति और पूंजी के बीच शत्रुतापूर्ण अंतर्विरोध पैदा हो जाने से पर्यावरण बुरी तरह क्षतिग्रस्त होता जा रहा है। हमें यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि पानी, कोयला और परमाणु भट्ठियों से उत्पन्न यह समस्त ऊर्जा और जल, जंगल, जमीन जैसे समस्त जीवनदायी स्रोतों और प्राकृतिक खनिज संपदा का उपयोग कर मिल-कारखानों द्वारा उत्पादित समस्त माल मेहनतकश जनता के लिए नहीं है, बल्कि यह अमीरों के भोग-विलास के लिए, उनके अकूत मुनाफे की असीम भूख को तृप्त करने के लिए है। यह व्यवस्था नब्बे प्रतिशत मेहनतकश जनता की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नहीं है। |
BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7
Published on 10 Mar 2013
ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH.
http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM
http://youtu.be/oLL-n6MrcoM
Friday, March 2, 2012
धरती धन न अपना
धरती धन न अपना
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