| uesday, 01 May 2012 10:33 |
शंकर शरण वह विडंबना इसलिए बनती है, क्योंकि पश्चिमी-सेमेटिक दृष्टि में मनुष्य की अवधारणा ही निरी भौतिक होने तक सीमित है। शारीरिक, भौतिक आवश्यकताओं और उपलब्धियों से परे वह अधिक दूर नहीं जाती। उन्हें मनुष्य का एक ही जीवन होने का विश्वास है, वे पुनर्जन्म नहीं मानते। इसलिए शरीर को भौतिक सुख का उपकरण और एकमात्र जीवन को उसी सुख के लिए समर्पित माना जाता है। अमेरिकी अर्थ में 'फ्रीडम' हर वह कार्य करने की छूट है, जिसकी वहां कानूनन मनाही न हो। इसलिए यौन-स्वच्छंदता वहां वैयक्तिक आजादी का सहज अंग है। यह मनुष्य की सेमेटिक, संकीर्ण अवधारणा से जुड़ा है। मनुष्य जीवन का कोई सतत, अविच्छिन्न, आध्यात्मिक पक्ष भी है, जिससे उसका आचरण, कर्म और कर्म-फल अखंडित रूप से जुडेÞ हैं, इसकी मान्यता ईसाइयत में नहीं है। उधर परिवार का अतिसंकीर्ण आकार और नाते-रिश्तों का अकाल इसलिए भी है। सीमित परिवार में भी आपसी कर्तव्य कामकाजी किस्म के दिखते हैं। यह सब मनुष्य की मात्र भौतिक अवधारणा का प्रतिफलन है। तभी स्त्री-पुरुष संबंध को मुख्यत: सेक्स केंद्रित, और सेक्स इच्छापूर्ति को भूख-प्यास बुझाने जैसा सामान्य कर्म समझा जाता है, जिसका कोई दूरगामी या भावनात्मक महत्त्व नहीं। पुरानी कम्युनिस्ट शब्दावली में, वह प्यास लगने पर 'एक गिलास पानी' पीने जैसी सहज बात है। ऐसे ही विचारों की छाया में वहां लड़के-लड़कियों का किशोर जीवन आरंभ होता है। इसीलिए उनके रोजमर्रा के उपयोगी सामानों में जूते, चश्मे, मोबाइल फोन की तरह ही गर्भ-निरोधक भी लगभग सामान्य माने जाते हैं। आयु कोई भी हो, यूरोपीय-अमेरिकी व्यवहार में पुरुष-स्त्री संबंधों में प्रेम यौनपरक ही माना जाता है। यौन-रहित स्नेह संबंधों की पहचान और संज्ञा वहां नहीं के बराबर है। सहोदर भाई-बहन या पुत्र-पुत्री के अतिरिक्तकिसी संबंध में यौन-मर्यादा जरूरी नहीं मानी जाती। उलटे किसी पुरुष द्वारा किसी स्त्री के प्रति सद्भावना, प्रशंसा को बिस्तर तक ले जाना नितांत तर्कपूर्ण समझा जाता है। यह एक प्रकार से भारतीय दृष्टि की पुष्टि ही है कि स्त्री-पुरुष 'मैत्री' जैसी चीज नहीं होती। इसीलिए बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड-सा कोई संबंध-शब्द भारतीय भाषाओं में नहीं है। अगर आज यहां इसका चलन बढ़ रहा है तो इसके परिणाम उससे भिन्न नहीं हंोंगे, जो पश्चिम में देखे जा रहे हैं। अगर विद्यार्थी जीवन में ब्रह्मचर्य और विवाह-पूर्व यौन संबंधों की वर्जना को दकियानूसी चीज समझा और समझाया जा रहा है तो यह कोई विवेकपूर्ण, वैज्ञानिक चिंतन नहीं है। न सिद्धांत, न व्यवहार में। यौन-संबंध में संयम और नियम को दकियानूसी मानने के पीछे अज्ञान, दुराग्रह और नकलची मानसिकता है। यूरोपीय देशों की भौतिक चमक-दमक के सम्मोहन में उधर के कुरूप, हानिकारक चलन को भी बेहतर मानना घोर अज्ञान ही है। विदेशी टेलीविजन चैनलों, फिल्मों के माध्यम से वह सब आचरण स्वीकार्य बनाया जा रहा है, जिसे भारतीय परंपरा दुराचार, पाप और अधर्म कहती रही है। कुत्सित भोगवाद को भी एक प्रकार की सहज जीवन-पद्धति बताने में विज्ञापन उद्योग की कारस्तानी भी है, जो हर चीज बेचने के लिए स्त्री-देह का खुल कर उपयोग कर रही है। इस कारस्तानी में कुटिलता भी है। क्योंकि यह स्त्री-पुरुष समानता का समर्थक होने की भंगिमा अपना कर स्त्री को भोगमात्र की वस्तु में तब्दील करती है। प्रेम की धारणा का अवमूल्यन करती है। पति-पत्नी से नीचे प्रेमी-प्रेमिका और उससे भी गिर कर बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड संबंध में प्रेम की गरिमा, कल्याण भाव और उत्तरदायित्व क्रमश: घटता है। संक्षिप्त अवधि का एक सीमित समझौता, जिसमें कोई व्यापक वचनबद्धता नहीं, तात्कालिक कारोबारी जैसा संबंध ही है। स्त्री और पुरुष की भिन्न प्रकृति और सामर्थ्य के अंतर से यह आखिरकार स्त्री को ही उपभोग की वस्तु बनाता है। अमेरिका-यूरोप में परिवार संस्था का नाश वही बात है। यह स्त्री की चाह नहीं थी, जो स्वभावत: स्थायित्व चाहती है। लेकिन यांत्रिक समानता और उत्तरदायित्व-विहीन यौन आचरण की वह अनिवार्य परिणति है। स्त्री-पुरुष के बीच मंगलकारी, आध्यात्मिक, धर्माचरण युक्तसंबंध की मान्यता पर ही परिवार दृढ़ रह सकता है। परिवार के ध्वंस से स्त्रियां ही मानसिक रूप से स्वाभाविक संबंध खो देती हैं और व्यवहार में और अकेली पड़ जाती हैं। इस संपूर्ण अनुभव और इसकी सीख को छिपा कर नई उम्र के लड़के-लड़कियों में आधुनिकता और समानता के नाम पर क्षुद्र संबंधों को बढ़ावा देना कुटिलता है। पर विज्ञापन-व्यापार जगत और धर्म-चेतना हीन बुद्धिजीवी यही कर रहे हैं। यह दुर्भाग्य है कि जब एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने देशवासियों को भारत से पारिवारिक मूल्य सीखने को कह रहे हैं, तब हम उच्छृंखल संबंधों को परिवार की कीमत पर स्वीकार्य बना रहे हैं। |
BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7
Published on 10 Mar 2013
ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH.
http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM
http://youtu.be/oLL-n6MrcoM
Wednesday, May 2, 2012
संबंधों की संस्कृति
संबंधों की संस्कृति
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