| Wednesday, 02 May 2012 10:49 |
रमेश दवे जनसत्ता 2 मई, 2012: उत्तर-आधुनिकता ने न जाने कितने प्रकार के डरों का संजाल फैला दिया है। सबसे बड़ा डर भाषा को लेकर पैदा किया जा रहा है। भारतीय भाषाओं के खत्म हो जाने के खतरों को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे भारत के एक सौ इक्कीस करोड़ लोगों की भाषा केवल अंग्रेजी हो गई हो। हिंदी वालों का डर तो इतना विकराल है कि वे क्षेत्रीय लोकभाषाओं (जिन्हें बोलियां कहा जाता है) के संरक्षण को भी हिंदी की अस्मिता के लिए खतरनाक मानते हैं। अब एक चर्चा का विषय यह है कि मीडिया की पैठ रसोईघर से लेकर बाजार तक हो गई है। मां-बाप बच्चों को दो साल की उम्र से प्ले स्कूल में भेज रहे हैं; वीडियो गेम्स, कंप्यूटर चैट, मोबाइल टॉक आदि के साधन और अवसर उपलब्ध करवा रहे हैं। क्या वे अपने बच्चों को अपनी मूल भाषा से वंचित कर अंग्रेजी भाषी हो जाने का दुस्वप्न नहीं देख रहे हैं! स्कूल से भाषा सीखते हैं जरूर, मगर कोई स्कूल आपके परिवार की भाषा तब तक नहीं छीन सकता, जब तक परिवार और खासकर मां मूल भाषा का त्याग नहीं करती। कोई भी भाषा, भाषा या संप्रेषण का माध्यम मात्र नहीं होती। वह एक समूची संस्कृति की प्रतिनिधि और संवाहक भी होती है। उसमें एक समाज की परंपरा, उपलब्धियां, ज्ञान, संस्कार, सोच आदि सब बोलते हैं। राष्ट्र-भाषा तो वह तब बनती है, जब उसमें राष्ट्र के जन-जीवन, राष्ट्र की परंपरा और राष्ट्र के प्रति प्रेम दिखाई दे। उसे मंच की भाषा के बजाय, मन की भाषा बनाना होता है। कोई भी भाषा जब उस समुदाय की आत्म-भाषा बन जाती है तो आत्म-भाषा ही व्यापक रूप से राष्ट्र-भाषा बन जाती है। हिंदी न तो अंग्रेजी की तरह प्रतिष्ठा-प्रतीक बन पाई, न सही अर्थ में आत्म-भाषा या मन की भाषा। अभी तक हिंदी की जो भी यात्रा है, वह औपचारिक अधिक और आत्मीय कम रही है। बावजूद इसके हिंदी के मरने का कोई डर नहीं पालना चाहिए, भले ही अंग्रेजी आपके बाथरूम, बेडरूम और किचन तक क्यों न फैल गई हो। अगर आॅक्सफर्ड कोश में प्रतिवर्ष हिंदी के सौ-पचास शब्द जुड़ सकते हैं तो हिंदी शब्दकोश में अंग्रेजी के या अन्य भाषाओं के शब्दों को समाहित कर उन्हें हिंदी के ही शब्द बनाया जा सकता है। उसे हम हिंग्लिश क्यों कहें, वह तो हमारी हिंदी ही हो गई। दुनिया में भाषाएं तब मरती हैं, जब रेड इंडियंस, अफ्रीकी, नैटिव्ज आदि की भाषाओं की तरह हिंदी का भाषा समुदाय भी नष्ट कर दिया जाए, जिसकी आशंका इसलिए नहीं है कि अब किसी विदेशी सत्ता या उपनिवेश की संभावना भारत में नहीं है। बाजार आए, भूमंडल भारत में बिछ जाए, मगर खेत, खेती, खलिहान और देसी खान-पान जब तक जीवित हैं, भाषा भी जीवित रहेगी। हिंदी एक समग्र-संपूर्ण भाषा बने कुल सौ-सवा सौ वर्ष का ही तो इतिहास जी रही है। अगर हम आत्महीनता से मुक्त होकर, स्कूल, कॉलेज के स्तर पर अंग्रेजी की तरह हिंदी को एक अनिवार्य विषय बना दें, यहां तक कि तकनीकी की शिक्षा में भी, तो पढ़ी-लिखी, अच्छी हिंदी की पीढ़ी खड़ी हो सकती है। अभी तो हालत यह है कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम भी बड़े पैमाने पर अंग्रेजी हो गई है। निजी स्कूलों का कारोबार देश के हर कोने में फैल गया है और इन अधिकतर स्कूलों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। अगर शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं न हों तो वे ज्ञान-विज्ञान का माध्यम कैसे हो सकती हैं? जिस प्रकार सही अंग्रेजी, शुद्ध अंग्रेजी बोलने को हमने प्रतिष्ठा से जोड़ रखा हैं वैसा भाव हिंदी के प्रति हर स्तर पर होना जरूरी है। हिंदी की पाचन-शक्ति बहुत अच्छी है, वह अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक सहिष्णु, उदार और उन्मुक्त है। अगर हमारा पूरा अध्यापक, प्राध्यापक और छात्र समुदाय अपनी भाषा और खासकर हिंदी को जीवन की भाषा बना ले तो एक दिन वह जीविका की भी भाषा बनेगी और हिंदी उस दिन सच्चे अर्थ में आत्मभाषा भी होगी और राष्ट्रभाषा भी। |
BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7
Published on 10 Mar 2013
ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH.
http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM
http://youtu.be/oLL-n6MrcoM
Wednesday, May 2, 2012
भाषा के विस्थापन का डर
भाषा के विस्थापन का डर
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