BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, February 6, 2012

जनवादी नीतियों को छोड़ उत्तराखंड की सियासत में अप्रासंगिक बना उक्रांद

जनवादी नीतियों को छोड़ उत्तराखंड की सियासत में अप्रासंगिक बना उक्रांद


Monday, 06 February 2012 09:55

प्रयाग पांडे, नैनीताल नैनीताल, 6 फरवरी। दिशाहीन और सत्ता लोलुप नेतृत्व ने उत्तारखंड क्रांति दल को उत्तराखंड की सियासत में अप्रासंगिक बना दिया है। निजी अहम और महत्वाकांक्षा के कारण दल के नेताओं ने खुद उक्रांद का गला घोटा। राज्य में क्षेत्रीय सियासी पार्टियों के लिए लोगों के मन में गहरा अविश्वास भी पैदा कर दिया है। राज्य की सियासत में क्षेत्रीय दलों की ताकत घटने का फायदा उन राष्टÑीय सियासी दलों को हो रहा है, जिनकी उपेक्षा की वजह से अलग राज्य की अवधारणा का जन्म हुआ और दशकों के संघर्ष के बाद उत्तराखंड राज्य वजूद में आया। 
सांगठनिक और वैचारिक धरातल पर पहले से ही लड़खड़ा रहे उत्तराखंड क्रांति दल में पिछले साल हुए विभाजन ने उक्रांद को सियासी रूप से शून्य पर ला खड़ा कर दिया है। उक्रांद का एक धड़ा निजी सत्ता सुख के लिए भाजपा के सामने इस कदर नतमस्तक हो गया कि उसने दल के वजूद को मिटाने से भी गुरेज नहीं किया। अलग राज्य की अवधारण को हकीकत में तब्दील करने के लिए संघर्ष करने के बजाय सत्ता की मलाई चाटने को बेताब उक्रांद ने 2007 में कार्यकर्ताआें की राय को दरकिनार कर भाजपा सरकार को समर्थन देने का फैसला किया। सत्ता की यही मलाई उक्रांद के लिए मीठा जहर साबित हुई। पिछले साल जनवरी में उक्रांद के भीतर तीसरी बड़ी फूट पड़ गई।
अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर लड़ने के लिए 25 जुलाई, 1979 को उत्तराखंड क्रांति दल बना था। उत्तराखंड क्रांति दल के गठन के एक साल बाद दल को रानीखेत विधानसभा के रूप में आगे बढ़ने का हौसला मिला। 1980 में उक्रांद के जसवंत सिंह बिष्ट ने रानीखेत विधानसभा सीट पर शानदार जीत दर्ज की। इसके बाद 1985, 1989 और 1993 में तीन बार काशी सिंह ऐरी उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए।
शुरुआत में उत्तराखंड क्रांति दल अलग राज्य के लिए लड़ने वाला अकेला था। तब भाजपा और कांग्रेस अलग राज्य के कतई हिमायती नहीं थे। वाम दलों का एक धड़ा भी अलग राज्य के मुद्दे से असहमत था। मण्डल आंदोलन के दौरान उक्रांद एकाएक बड़ी क्षेत्रीय सियासी ताकत के रूप में सामने आया। पहाड़ के नौजवान मण्डल आंदोलन के बहाने अलग राज्य आंदोलन से जुड़ने लगे। राज्य आंदोलन में आम लोगों, खासकर महिलाओं की भागीदारी बढ़ने लगी। आंदोलन को मिलते जनसमर्थन को देख पहले भाजपा और बाद में कांग्रेस भी मजबूरन अलग राज्य का राग अलापने लगे। भाजपा और कांग्रेस ने पहले आंदोलन की बागडोर अपने हाथ लेने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए। लेकिन अलग राज्य आंदोलनकारियों ने कभी भी इन दोनों राष्टÑीय राजनीतिक दलों का नेतृत्व


स्वीकार नहीं किया। पहाड़ की जनता ने उक्रांद का नेतृत्व मंजूर किया।
अलग राज्य आंदोलन के दौरान भी उक्रांद के नेताओं में दशा और दिशा भ्रम लगातार बना रहा। उक्रांद ने 1996 के लोकसभा चुनाव में 'राज्य नहीं तो चुनाव नहीं' का नारा दिया। लोकसभा चुनाव का बहिष्कार किया। लेकिन विधानसभा चुनाव में कूद गए। उक्रांद नेताओं में क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर तीखे और लड़ाकू तेवर कम ही नजर आए। लेकिन प्रगतिशील आंदोलनों के मंचो पर उक्रांद के कुछ नेताओं की मौजूदगी और भागीदारी से पहाड़ में उक्रांद को जुझारू तेवरों वाले दल के रूप में पहचान हासिल करने में मदद मिली।
राज्य आंदोलन जब चरम पर था, तब राज्य की नब्बे फीसद जनता उक्रांद के पीछे खड़ी थी। भारी जन आंदोलन के दबाव के चलते नवंबर, 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य बन गया। राज्य बनते ही उक्रांद ने जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को तिलांजलि दे दी। राज्य के 2002 के पहले चुनाव में उक्रांद सिर्फ चार सीटें ही जीत पाया। तब उक्रांद के काशी सिंह ऐरी, विपिन त्रिपाठी, नारायण सिंह जंतवाल और प्रीतम सिंह पंवार पहली विधान सभा में विधायक बने। दल विधान सभा के भीतर और बाहर अलग राज्य आंदोलन से जुड़े मुद्दों की वाजिब पैरोकारी कर पाने में पूरी तरह नाकाम रहा। नतीजन 2007 के विधानसभा चुनाव में उक्रांद चार के बजाय तीन सीटों पर सिमट गया। जिन राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का विरोध कर उक्रांद जवान हुआ था, 2007 में बेशर्मी के साथ उन्हीं में से एक भाजपा की गोद में जा बैठा। तभी से उत्तराखंड की क्षेत्रीय सियासत में उक्रांद की उल्टी गिनती शुरू हो गई। इसका नतीजा जनवरी, 2011 में उक्रांद के दो फाड़ के रूप में सामने आया।
उक्रांद के विघटन से दल ने अपना चुनाव निशान 'कुर्सी' तो गवाई ही, साथ में पहाड़ के लोगों का भरोसा भी गंवाया है। अब पहाड़ के लोगों के सामने दो उक्रांद है। पहला उक्रांद (प्रगतिशील), जिसका चुनाव निशान कप और प्लेट है। दूसरा उक्रांद (जनतांत्रिक), जिसका चुनाव निशान पतंग है। उक्रांद (प्रगतिशील) तो इस बार विधानसभा चुनाव में पचास से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा पाया है। लेकिन उक्रांद (जनतांत्रिक) के नेता दिवाकर भट्ट देवप्रयाग से और ओम गोपाल नरेंद्र नगर से भाजपा के चुनाव निशान से चुनाव लड़े हैं।
उक्रांद के नेताओं की इस अवसरवादी सियासत से पहाड़ के आम लोग बेहद आहत हैं। जाहिर है कि छह मार्च को चुनाव नतीजे आने के बाद लोगों की यह नाराजगी जगजाहिर हो जाएगी। मुमकिन है कि लोग सत्ता लोलुप नेताओं को माफ भी कर दें। लेकिन क्षेत्रीय राजनीति का इतिहास उन्हें शायद ही माफ कर पाएगा।

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