BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, June 11, 2012

गंदगी ढोती गंगा

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/2011-05-27-09-06-23/2735-ganga-river-polutited-in-india-water-man-rajendra-singh

गंदगी ढोती गंगा

18 जून से गंगा मुक्ति का संग्राम

गंगा मुक्ति संग्राम उन दुर्जन शक्तियों से  है, जो गंगा में प्रदुषण, गंगा धारा पर बांध बनाकर या नये शहर बसाकर अतिक्रमण तथा गंगाजल, रेत, पत्थर का खनन करके गंगा का शोषण  कर रहे हैं। अब इस अतिक्रमण, प्रदूषण, शोषण से गंगा मुक्ति का संग्राम 18 जून 2012 को दिल्ली से शुरू होगा...

राजेंद्र सिंह उर्फ़ पानी बाबा 

औद्योगिक घरानों, राजनेताओं तथा समाज के गंगा से भ्रष्टाचार  के चलते सभी उद्योगों एवं सरकारी संस्थानों, नगर पालिकाओं, नगर पंचायतों को गंदा जल गंगा में मिलाने की राज स्वीकृति मिली है। भारत में पवित्रता से गंदगी को दूर रखना, अमृत में जहर को नहीं मिलने देना तथा वर्ष जल और गंदे पानी को अलग-अलग बहने के लिए नदियों को नालों से अलग रखने का विधान था। लोकतंत्र आने से पहले 1932 में हाकिन्स, बनारस मंडलायुक्त अंग्रेज के आदेश  को हमारे राजनेताओं और धर्म नेताओं ने बनारस में सबसे पहले गंगा में गंदे नाले मिलाने की स्वीकृति दी थी। यहां के समाज ने भी इसे स्वीकार किया था। वहां से फिर पूरी गंगा के साथ ऐसा ही बुरा व्यवहार होने लगा। 

आजादी के बाद हमने जिन्हें अपना वोट देकर अपना नेता बनाया, उन्होंने हमारी गंगा मैया की सेहत को ठीक रखने की भूमिका नहीं निभाई। परिणाम स्वरूप अंग्रेजी हुकूमत से मिली मैली गंगा मैया आजादी के बाद गंदगी ढोने वाली गंगा बन गई। 

dirty-ganga

अन्न व ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के नाम पर गंगा को बांधों में बांध दिया, जिसके कारण गंगा की अपनी विलक्षण प्रदुषण नाशिनी शक्ति नष्ट हो गई। धीरे-धीरे गंगा मैया स्वयं बीमार हो गई। गंगा अमृत की दो बूंद मरते समय अपने कंठ में पाने के लिए भारतीयों की अंतिम ईच्छा पूरी करने वाला भारतीय गंगा गौरव ही अब समाप्त हो गया है। 

एक बार फिर अब भारतवासी खड़े हो रहे हैं। गंगा की अविरलता-निर्मलता को लक्ष्य बनाकर गंगा मुक्ति संग्राम शुरू किया है। इस हेतु 'गंगा तपस्या से गंगा मुक्ति संग्राम' शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज जी की प्रेरणा से स्वामी श्री अविमुक्ते"वरानन्द जी, स्वामी सानन्द जी, गंगा प्रेमी भिक्षु, कृष्ण  प्रियानन्द ब्रहमचारी व श्री राजेन्द्र सिंह जी ने गंगा तपस्या का संकल्प लिया था। मकर संक्राति 14 जनवरी को गंगा सागर जाकर विविधि रूपों में गंगा तपस्या शुरू हुई थी। 

यह तपस्या बिना स्वार्थ गंगा सेवा और रक्षण कार्यों के लिए लम्बे समय तक चली। स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द की शिष्या साध्वी पूर्णम्बा ने अपने गुरु के स्थान पर जल त्याग कर घोर कठिन तपस्या शुरू कर रखी है। इनके साथ शारदाम्मा जी भी घोर तप कर रही हैं। जल छोड़कर इस समय सात तपस्वी तपस्यारत हैं। इनमें औघड़ स्वामी श्री विद्या मठ वाराणसी में जल छोड़कर तपस्या कर रहे हैं। छः तपस्वी गंगा प्रेमी भिक्षु, कृष्ण प्रियानन्द ब्रहमचारी, साध्वी पूर्णम्बा, साध्वी शारदाम्बा, योगेशवर नाथ जी व नागेशवर नाथ जी हैं। राजकीय चिकित्सालय, कबीर चोरा, वाराणसी में तपस्यारत हैं। 

ये बहुत ही कृषकाय बन गये हैं। इनको देखकर सरकार के विरुद्ध क्रोध भड़कता है। सरकार संवेदनहीन बनकर गंगा तपस्वियों को अनदेखी कर रही है। तपस्वियों की तरफ सरकार नहीं देखती है। ना देखें! गंगा की अविरलत-निर्मलता बनाने का काम शुरू कर दे। गंगा आस्था और गंगा पर्यावरण रक्षा का काम तुरन्त प्रभाव से शुरू कर दे। गंगा कानून बनवाये। हमने जो करने के लिए लिखा है, वह सरकार कर दे। तपस्वियों का तपबल उनकी गंगा सदाचार शक्ति उन्हें फिर स्वस्थ्य बना देगी।

गंगा सदाचार सरकार विरोधी नहीं है। गंगा से समाज का भ्रष्ट आचरण रोक कर सदाचार करना है। तथा सरकारी अधिकारियों, नेताओं-व्यपारियों, उद्यमियों का गंगा से भ्रष्टाचार रूकवा कर सदाचार शुरू कराना लक्ष्य है। इस लक्ष्य पूर्ति में जो बाधायें हैं, उनसे संघर्ष की जरूरत है। इसीलिए गंगा तपस्वियों को गंगा सदाचार लक्ष्य सिद्धि तक पहुंचाने हेतु गंगा मुक्ति संग्राम शुरू करने का संतों ने मन बनाया है। 

गंगा मुक्ति संग्राम उन दुर्जन शक्तियों से लड़ना है, जो गंगा में प्रदुषण, गंगा धारा पर बांध बनाकर या नये शहर बसाकर अतिक्रमण तथा गंगाजल, रेत, पत्थर का खनन करके गंगा का शोषण  कर रहे हैं। अब इस अतिक्रमण, प्रदूषण, शोषण से गंगा मुक्ति का संग्राम 18 जून, 2012 को दिल्ली से शुरू होगा। इसको शुरू कराने में देशभर की सज्जन संत शक्तियां जुटेगी। 

गंगा मुक्ति संग्राम का एक तैयारी यात्रा दल 7 जून, 2012 को दिल्ली पहुंच रही है। 22 मई, 2012 को बनारस से 11 टोलियां गंगा बेसिन के 11 राज्यों के लिए यात्रा पर निकली थीं। वे आज 7 जून, 2012 को दिल्ली पहुंचना शुरू कर रही हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, हरियाणा से होते हुए दिल्ली पहुंची है। 8 जून, 2012 को दूसरा दल दिल्ली पहुंचेगा। ये दल गंगा को आजादी दिलाने के हेतु इस पर बन रहे बांधों को रूकवाने, गंदे नाले गंगा जी से अलग करवाने तथा गंगा की भूमि पर हो रहे अतिक्रमण को रूकवाने हेतु चेतना जागरण करते हुए दिल्ली पहुंच रहे हैं। 

हरियाणा में स्वामी श्री सचिदानन्द जी, श्रीराम मंदिर (छिछरौली), सुरेश  राठी, सुल्तान सिंह, उत्तर प्रदेश से ईश्वर चन्द्र, अभिमन्यु सिंह, अरविन्द कुशवाह, कृष्ण पाल, संजय सिंह, ओमवीर सिंह तोमर, मेजर हिमांशु, सुबोधनन्दन शर्मा, अवनीश मिश्र, विक्रात, रमन त्यागी, उत्तराखण्ड से सुशीला भंडारी, शिव प्रसाद डबराल, शमशेर सिंह बिष्ट, गीता गुरौला, राजस्थान से कन्हैयालाल गुर्जर, निरंजन, चमन सिंह, रेणू सिसोदिया, विनोद कुमार, दिल्ली से मास्टर बलजीत सिंह, प्रीतम सिंह, दिवान सिंह, कपिल मिश्रा, पंकज कुमार, राघवेन्द्र अवस्थी, प्रणव सिंह, बिहार से बसंत भाई, विजय कुमार, झारखण्ड़ से घनश्याम भाई, पश्चिम  बंगाल से जनक दफतरी, मध्यप्रदेश  से संजय सिंह पर्मार्थ, अरुण त्यागी, अरुण मिश्र, छत्तीसगढ़ से धरमेन्द्र आदि के नेतृत्व में सभी राज्यों में गंगा मुक्ति संग्राम हेतु जन चेतना जागरण जारी है। 

ये सब दल अपने-अपने राज्यों से गंगा मुक्ति संग्राम की तैयारी करके 18 जून, 2012 दिल्ली पहुंच रहे हैं। दिल्ली के आस-पास गंगा के दोनों तरफ के लोग 18 जून, 2012 को प्रातः 10 : 00 बजे गांधी समाधि, राजघाट नई दिल्ली पहुंचेंगे। यहां से गंगा कूच करके जंतर मंतर पहुंचेंगे।

तपस्या से गंगा की शिक्षा, सेवा करने का एहसास जगा है। संग्राम से गंगा मुक्ति कार्य कराने का आभास होगा। तपस्या गंगा तीर्थों, गंगा सागर (पश्चिम बंगाल), प्रयागराज (इलाहाबाद), मायापुरी (हरिद्वार), मोक्षपुरी (काशी ) में अभी तक होती रही है। अब यह दिल्ली में होगी। तपस्या और संग्राम साथ ही साथ दिल्ली में गंगा जी के लिए चलेगा। त्यागबल तपस्या से आया है। गंगामृत लाने हेतु लोकबल को दिल्ली लाना अब जरूरी लगता है। इस हेतु गंगा मुक्ति संग्राम शुरू हुआ है। अब गंगा की अविरलता-निर्मलता का निर्णय और काम शुरू कराने के सरकारी संकल्प बिना मानने वाले नहीं है।

अभी भारत के संतों का मानना है कि गोमुख से लेकर गंगा सागर तक अविरल-निर्मल गंगा बहे। कानपुर जैसे भंयकर प्रदुसहं  फैलाने वाले शहरों का प्रदूषण तुरन्त प्रभाव से रूके। गंगा भारतीयों की आस्था, धार्मिक, अध्यात्मिक, सांस्कृतिक श्रद्धा का केन्द्र रही है। इस पर कुछ मुख्यमंत्रियों के वक्तव्य निराशाजनक है। उत्तराखण्ड़ राज्य में अभी तक जितनी विद्युत परियोजनायें बनी हैं। उन्होंने आज तक अपने लक्ष्य का आधा उत्पादन भी नहीं किया है। सरकारी आंकड़े बताते हैं, कि अभी केवल 23 प्रतिशत ऊर्जा उत्पादन हो रहा है। 

भगीरथी में गंगा तपस्या के बल से तीन बांध रद्द हुए लेकिन अलकनन्दा पर नये 50 प्रस्तावित बांध हैं। पांचों प्रयागो की जननी अलकनन्दा और मंदाकिनी पर नया पुराना बांध स्वीकार नही है। 

गंगा मैया को जन्म देने वाले हिमालय में गंगा की सभी धाराओं को उनकी अपनी ताल तरंगों के साथ तीव्र गति से चट्टानों से टकराती हुई हड़-हड़ ध्वनि के साथ चलना देखना चाहते हैं। दुनिया भर से आने वाले तीर्थ यात्री एवं पर्यटक गंगा मैया के हिमालयी आकर्षण  से आकृष्ट होकर करोड़ों की संख्या में उत्तराखण्ड जाते हैं, इन तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों की उत्तराखण्ड पहुंचने से उत्तराखण्ड़ को जो लाभ है। वह ऊर्जा उत्पादन से नहीं होगा, इसलिए उत्तराखण्ड़ में गंगा पर अब कोई भी किसी भी प्रकार का निर्माण स्वीकार नहीं है। गंगा मैया राष्ट्रीय नदी है इस हेतु इसको पदोचित रा'ट्रीय सम्मान दिलाने वाला एक कानून बनना चाहिए। राज्य सरकारों को भी इसके राष्ट्रीय  महत्व को सम्मान देना है।

''गंगा द्वार समीपे तु तटमानन्द नामकम'' यह शास्त्रों से स्पष्ट होता है कि गंगा हरिद्वार से ऊपर विशेषण  सहित प्रभावित होती है और हरिद्वार में आकर केवल गंगा मैया कहलाने लगती है। अतः गंगा के ये दोनों स्वरूप या वृहद आयाम अविरलता-निर्मलता से युक्त होना चाहिए। उत्तराखण्ड़ स्वर्ग लोक जहां केवल देवता स्नान करते हैं। इस क्षेत्र में गंगा के साथ खिलवाड़ करना देवत्व के साथ खिलवाड़ है। अर्थात देवभूमि में गंगा के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। 

भगीरथ का रथ गंगा कणों, रेती, भभूति, हिमालय की औषधीय  गुणों को गोमुख से गंगासागर तक पहुंचना चाहिए। यह भगीरथी का गणतव्य गंगा सागर तक जाना चाहिए। नहीं तो गंगा सागर के सारे द्वीप नष्ट हो जायेंगे। ये द्वीप नष्ट होने की प्रक्रिया तुरन्त रूकनी चाहिए। इस हेतु गंगा की अविरलता जरूरी है। हिमालय की रेती, सागर के द्वीपों में जमकर वहां का उपजाऊपन, समृद्धि व भूगोल को बनाकर रखता है।

गंगा मूल धारा के चारों तरफ कोई उद्योग नहीं लगे। पूरा बेसिन प्रदूशित उद्योगों से मुक्त बने। गंगा मैया सर्वोच्च (ए) श्रेणी की नदी हैं। इसको नैसर्गिक नहीं तो पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित त करना जरूरी है। गंगा मैया के पर्यावरणीय प्रवाह से ही हमारी सेहत और हमारी आर्थिकी सुधरेगी। भारत का स्वाभिमान गौरव और ज्ञान को प्रतिष्ठित  करने के लिए अब गंगा अविरलता और निर्मलता भारत सरकार के कार्यों की प्राथमिकता बनना चाहिए। 

rajendra-singh-jal-purushतरुण भारत के संस्थापक राजेंद्र सिंह का जल संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है.

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