BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, June 11, 2012

पढ़ना गुनाह कब से हो गया?

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पढ़ना गुनाह कब से हो गया?

पढ़ना गुनाह कब से हो गया?

By  | June 11, 2012 at 7:15 pm | No comments | शब्द | Tags: 

क्या आपके पास नक्सलवादी साहित्य है?

अशोक कुमार पाण्डेय

कोई दो साल पहले महाराष्ट्र में कहीं एक पुस्तक मेले से एक महिला कार्यकर्ता को गिरफ्तार कियागया था। उन पर आरोप था कि वह नक्सलवादी साहित्य बेच रही थीं। जिन किताबों के चलते उन पर यह आरोप लगाया गया था उनमें मार्क्स-एंगल्स-लेनिन की किताबों के साथ भगत सिंह के लेखों का संकलन भी था। बताते हैं कि पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा कि - ग़ुलामी के वक़्त भगत सिंह ठीक था पर अब उसकी क्या ज़रुरत?
इसके बाद तमाम पत्रकारों, कार्यकर्ताओं आदि की गिरफ़्तारी के बाद यह जुमला सुनने को मिला। हालांकि कभी साफ़ नहीं किया गया कि यह नक्सलवादी साहित्य है क्या बला? जैसे इस बार सीमा आज़ाद के संदर्भ में चे की किताबों का नाम आया तो मुझे पुस्तक मेले का एक वाकया याद आया। संवाद के स्टाल पर एक बिल्कुल युवा लड़की इस ज़िद पर अड़ गयी कि उसे स्टाल पर लगे बड़े से फ्लैक्स बैनर का वह हिस्सा काट कर दे दिया जाय जिस पर चे की फोटो (दरअसल उन पर लिखी एक किताब की) लगी है। आलोक ने टालने के लिये किताब के बारे में, या उनकी एक दूसरी किताब का अनुवादक होने के कारण मुझसे मिलने के लिये कहा। मैने जब उससे चे में दिलचस्पी की वज़ह पूछी तो बोली कि " बस वह मुझे बहुत एक्साईटिंग लगता है!"
ऐसे ही एक मित्र ने जब माओ की कवितायें देखीं तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि माओ कवि भी हो सकते हैं। पढ़ने के बाद बोले 'यार नेता कैसा भी हो कवि शानदार है।' ज़रा सोचिये माओ के लिखे की प्रशंसा करने वाले वे सज्जन नक्सलवादी साहित्य के पाठक होने के आरोप में अन्दर नहीं किये जा सकते क्या? वैसे मैने दर्शन के विद्यार्थियों को 'ज्ञान के बारे में' या 'अंतर्विरोध के बारे में' जैसे लेख पढ़ते देखा है…बेचारे!
क्या एक जिज्ञासु पाठक होना पुलिसवालों की हत्या, रेल की पटरियां उखाड़ना और आगजनी जितना बड़ा अपराध है?
मेरी समझ में यह नहीं आता है कि जो किताबें मेले के स्टालों में ख़ुलेआम बिकती हैं या बाज़ार में सर्वसुलभ हैं वे किसी के हाथ में पहुंचकर नक्सलवादी साहित्य कैसे हो जाती है?
पढ़ना गुनाह कब से हो गया?
"दख़ल विचार मंच" से

अशोक कुमार पाण्डेय, लेखक जनवादी साहित्यकार हैं| 'कल के लिए' पत्रिका के कार्यकारी संपादक

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