BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Sunday, June 10, 2012

क्यों रच रहे हैं हम ऐसा भयावह समाज…?

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क्यों रच रहे हैं हम ऐसा भयावह समाज…?

क्यों रच रहे हैं हम ऐसा भयावह समाज…?

By  | June 10, 2012 at 9:16 am | No comments | आपकी नज़र

 

  • मजदूरों के जीवन में रंग कौन भरेगा?
  • आखिर कब तक मजदूरों के साथ छल होता रहेगा? कब तक…?

अरुण कुमार झा

1750 के आस-पास यूरोप में औद्योगिक क्रांति का बिगुल बजा था। इसके चलते दुनिया के उद्योग-व्यापार से जुडे पूँजीपतियों के चेहरे दमकने लगे, वहीं मजदूरों के माथे पर बल पड़ गया। उनके शोषण की दास्तान भी यहीं से शुरू हुई। कारखानों में मजदूरों से 12 से 18 घंटों तक काम लिया जाने लगा। शोषण से मुक्ति के लिए उनके सामने उस वक़्त कोई उपाय ही नहीं था। उसी बीच कार्ल मार्क्स जैसे मसीहा का अभ्युदय हुआ. उन्होंने श्रमिक-जीवन को शोषण से मुक्ति की नयी राह दिखलाई। हजारों मजदूरों ने अपनी कुर्बानी देकर इस राह को सहज बनाया लेकिन यह राह लम्बी नहीं चली। बाद मे आन्दोलन की कमान ट्रेड यूनियनों के हाथ में आई. इनकी मुक्ति के उपाय इनके लिए दो तरफा प्रहारक साबित हुए। कुछ धूर्त ट्रेड यूनियन-लीडरों ने कारखानों के मालिको के साथ साँठ-गाँठ कर श्रमिकों का दोहरा शोषण का एक रास्ता तैयार कर लिया. ये चालाक लोग अपने पेट-पोषण में ही लग गये । और यही आज की सच्चाई है। वहीं एक दूसरा कड़वा सच यह भी है कि अब तो सरकार भी मजदूरों के शोषण के लिए कटिबद्ध नज़र आती है। धीरे धीरे सभी सरकारी काम ठेके पर करवाने की तैयारी भीतर-भीतर शुरू हो गई है। क्या यह लोकतान्त्रिक तरीका है? अब बताइए शेषित मजदूर कहाँ जायेंगे? क्या करेंगे? कहाँ जाकर रोयेंगे? इसलिए मजदूरों को चेतना होगा, अपनी भलाई के लिए, शोषण की मुक्ति के लिए फिर से एकता की राह पर चलना होगा. फिर से वही कुरबानी की राह अख्तियार करनी पड़ेगी जिस राह पर अमेरिका के शिकागो में हजारों मजदूर चले थी. उन्होंने अपनी कुरबानी दी थी। लेकिन अब सावधनीपूर्वक लड़ने का समय है। अब पूँजीवाद का रूप पहले से ज्यादा विकृत और घिनौना हो गया है। क्योंकि उनके साथ सरकार जो शामिल हो गयी है।
अब एक बार फिर दुनिया भर के मज़दूरों को "'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' के नारे को सार्थक रूप देना होगा। खेत में काम करने वाला मजदूर हो चाहे रिक्शा खींचने वाल, भवन निर्माण में लगे हुए लोग हों, या कल-कारखाने में कार्यरत्. रेल में, पोस्ट ऑफिस में हो, खान में हों, सड़कों के निर्माण में लगे हुए हों, बीड़ी उद्योग में लगे हों, ईंट भट्टों में लगे हों, कालीन-उद्योग में लगे हो, चमड़े की सफाई में लगे हों, पटाखे-और बारूद जैसे खतरनाक उत्पाद में लगे हों, फैशन उद्योग, में लगे हों, या अन्य किसी भी सेक्टर में कार्यरत हों. हर कहीं स्थिति बद से बदतर नज़र आती है। श्रमिकों के पास न रहने के लिए हवादार मकान हैं, न पीने के साफ पानी. न बिजली है, न अच्छे कपड़े। न स्वास्थ्य-चिकित्सा की सुविधाएँ. और न सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी! बच्चों के जीवन स्तर को उठाने के लिए शिक्षा-व्यवस्था का आभाव है. जो व्यवस्था है वो शर्मनाक है. । कितने आश्चर्य की बात है कि मजदूरों के लिए कानून तो बनाया गया है लेकिन उनमें इतने छेद कर दिए गए हैं कि मत पूछिए. अफसर-दलाल-ठेकेदारों को उस छेद से छन-छन कर उनके हक का मलाई मिल रही है. सारा लाभ उनकी झोली में गिरने लगा । कैसी घिनौनी व्यवस्था के संचालक हैं सरकार में बैठे हुए लोग? दूसरे के हक को छीनने को ही अपनी शान समझते हैं!
आजाद भारत के मजदूरों की स्थिति इतनी दयनीय क्यों बनी हुई है? कोई जवाब देने वाले नेता नही हैं इस देश में , न कोई अफसर जो इनके विकास के पैसों से ही रोजी-रोजगार पा रहे हैं। आखिर क्यों रच रहे हैं हम ऐसा भयावह समाज…? यह सवाल समाज के लोगों से है, नेताओं से है, कॉरपोरेट मीडिया के संचालकों से है, पूँजीपतियों से है, सरकार से है, न्यायपालिका से भी है। क्या इनकी जिम्मेदारी नही बनती कि आजाद भारत के माथे पर मजदूरों की जो स्थिति कलंक के धब्बे जैसे लगती है, उससे देश को निजात दिलायें। अन्ना-रामदेव के टीम को नहीं दिखता यह सब कि उनके टेंट को खड़ा करने वाले मजदूरों की स्थिति बदतर होती जा रही है? उन्हें यहाँ भ्रष्टाचार नजर नहीं आता? कब कोई मसीहा मनुष्य रूप में अवतरित होगा, जो इनके जीवन में सभी रंग भरेगा? जैसे मजदूर पूँजीपतयों से लेकर हम सभी के जीवन में रंग भरते हैं? आखिर कब तक मजदूरों के साथ छल होता रहेगा? कब तक…?

अरुण कुमार झा, लेखक दृष्टिपात पत्रिका के प्रधान संपादक हैं।

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