BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, May 7, 2012

प्रणव दादा के लिए मनीला से मिले संकेत!

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जिस प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति चुनाव में सबसे तेज घोड़ा माना जा रहा है , खुले बाजार की वैश्विक व्यवस्था में उनकी स्थिति और मजबूत हुई है। इंदिरा गांधी के देहांत के बाद उनके प्रधानमंत्री बनने की चर्चा जरूर चली थी और शायद उन्होंने भी उम्मीद बांध रखी थी क्योंकि वे राजीव के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस से अलग हो गये थे।

तब उन्होंने अपनी अलग पार्टी बी बना ली थी। पर जनाधार की जड़ों से कटे रहकर और कांग्रेस में गांधी नेहरु परिवार की विरासत के चलते प्रणव बाबू की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा तो मर ही चुकी है। सिख राष्ट्रवाद के सहारे कांग्रेस अकालियों को भी मनमोहन सिंह के समर्थन में अकालियों को भी खड़ा करने में कामयाबी हासिल की है।

अब बंगाली राष्ट्रवाद को भुनाने की पूरी तैयारी है। वामपंथी और ममता दोनों पहले बंगाली राष्ट्रपति की संभावना को खारिज नहीं कर सकते। अगर राष्ट्रपति बन जाये प्रणव तो उनकी भूमिका क्या होगी, मनीला से इसके संकेत मिले हैं। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को विकास के लिए विभिन्न देशों को सस्ता कर्ज देने वाले बहुपक्षीय वित्तीय संगठन एशियाई विकास बैंक यानी एडीबी के निदेशक मंडल का अध्यक्ष चुना गया है। एडीबी का मुख्यालय मनीला में है।

एडीबी की 45वीं वार्षिक आम सभा में भारत को गौरवान्वित करने वाले एक अन्य निर्णय के तहत इसका 46वां वार्षिक सम्मेलन अगले वर्ष दिल्ली में कराने की घोषणा की गई। वित्त मंत्री ने एडीबी के निदेशक मंडल की अध्यक्षता का दायित्व स्वीकार करते हुए बैठक के समापन सत्र में कहा कि भारत को अध्यक्षता स्वीकार कर बहुत खुशी है।

भारत 1966 में एडीबी का संस्थापक सदस्य था पर इस संस्था ने उसके 2 दशक बाद भारत को कर्ज सहायता देनी शुरू की। मुखर्जी ने भारत के साथ एडीबी के सहयोग के बारे में कहा कि यह 25 सालों की साझेदारी उत्साहजनक और चुनौतीपूर्ण रही है।

उन्होंने कहा कि वह गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।एडीबी के सचिव रॉबर्ट डाउसन ने बताया कि एडीबी भारत को 2012-14 की 3 साल की अवधि में विकास की योजनाओं के संचालन के लिए कुल 6.24 अरब डॉलर का कर्ज देने वाला है। यह कर्ज परिवहन, उर्जा, शहरी विकास, कृषि एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंध, वित्त तथा शिक्षा के लिए होगा।

पर बाजार में सरकार की साख सुधरती नहीं दीख रही। मारीशस वाला मुद्दा तो बना हुआ है। टेलीकाम नीलामी के मामले में भी सरकार बुरी

तरह फंसी है। एनसीपीटी के मामले में सरकार की राजनीतिक बाध्यताओं का नये सिरे से पर्दाफाश हो गया। प्रस्तावित राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) को लेकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच जारी गतिरोध समाप्त होने का कोई संकेत शनिवार को नहीं मिला।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुरजोर वकालत के बावजूद गैर कांग्रेस शासित राज्यों ने इस संस्था के मौजूदा स्वरूप का खुलकर विरोध किया। मनमोहन सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम शांतिपूर्वक मुख्यमंत्रियों की बातें सुनते रहे।जाहिर है कि आतंकवाद के खिलाफ केंद्र की मुहिम एनसीटीसी को करारा झटका लगा है।

इस मसले पर दिल्ली के विज्ञान भवन में पीएम के साथ हुई बैठक में ज्यादातर मुख्यमंत्रियों ने इसे नकार दिया। हालांकि सरकार ने ये जताने की कोशिश की है कि ये मसला अभी पूरी तरह खटाई में नहीं पड़ा है। केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने शनिवार को कहा कि राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) के गठन के सिलसिले में अभी कोई फैसला नहीं हो पाया है।

विपक्षी दलों के साथ सरकार के कुछ सहयोगी दलों के मुख्यमंत्रियों द्वारा भी इसके विरोध में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में आवाज बुलंद करने के बाद चिदम्बरम का यह बयान आया।सरकार की इस बेबसी पर बेरहम कारपोरेट इंडिया को बी तरस आ रहा होगा।

तृणमूल कांग्रेस और गैरकांग्रेस शासित राज्यों की मुखालफत के मद्देनजर जारी गतिरोध को दूर करने के लिए शनिवार को मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया गया था लेकिन केंद्र सरकार की मंशा धरी की धरी रह गई। गतिरोध खत्म होने के बजाए बढ़ ही गया। करीब 15 मुख्यमंत्रियों ने एनसीटीसी के गठन का या तो विरोध किया या कहा कि उसका मौजूदा स्वरूप उन्हें स्वीकार नहीं है। तीन मुख्यमंत्रियों ने इसके गठन को पूरी तरह खारिज कर दिया।

खास बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस जो लगातार आर्थिक सुधारों के मामले में अड़ंगा डाल रही है, उसे पटाने में कांग्रेसी सौदेबाजी और जुगाड़ की कला, केंद्रीय एजंसियों के इस्तेमाल की परंपरा काम नहीं कर रही है। केंद्री मदद मिलने में टालमटोल से नाराज पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र [एनसीटीसी] के गठन के आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए शनिवार को कहा कि इससे देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा।

उन्होंने कहा कि इससे सिर्फ केंद्र सरकार व राज्यों में अविश्वास बढ़ेगा।यहां मुख्यमंत्रियों की बैठक में बनर्जी ने कहा कि गिरफ्तारी, तलाशी और जब्त करने जैसी प्रस्तावित शक्तियों से संपन्न एनसीटीसी जैसे संस्थान के गठन से संवैधानिक तौर पर स्वीकृत देश के संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचेगा।एनसीटीसी के गठन के आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए बनर्जी ने मांग की कि पुलिस का कामकाज राज्यों के विशेषाधिकार में शामिल रहना चाहिए, जिसका उल्लेख संविधान में किया गया है।

उन्होंने कहा कि केंद्र एवं राज्य में शक्तियों और दायित्वों का सही संतुलन किसी भी परिस्थिति में बिगड़ने नहीं देना चाहिए।बनर्जी ने कहा कि वह केंद्र सरकार से अनुरोध करती हैं कि एनसीटीसी के गठन के लिए गृहमंत्रालय की ओर से तीन फरवरी 2012 को जारी आदेश वापस लिया जाए।

गौरतलब है कि बैठक की शुरुआत करते हुए गृहमंत्री चिदंबरम ने कहा कि मुंबई हमलों के बाद देश को कड़े कानून की जरूरत है। उनके मुताबिक आतंक पर नकेल कसना एक बड़ी चुनौती है। आतंक से लड़ना राज्य और केन्द्र की साझा जिम्मेदारी है क्योंकि आतंकी राज्य की सीमाएं नहीं देखते।

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