BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Saturday, May 4, 2013

जीवन बीमा निगम की साख को धक्का!

जीवन बीमा निगम की साख को धक्का!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


भारतीय वित्तीय संस्थानों में राष्ट्रीयकृत स्टेट बैंक आफ इंडिया, सरकारी उपक्रम जीवन बीमा निगम और डाकघरों की साख अब भी अटूट है। पर बंगाल में चिटफंड कंपनियों की मेहरबानी से जीवन बीमा निगम की साख को भी धक्का लगा है। इन छोटी बड़ी कंपनियों ने डाकघरों और जीवन बीमा निगम के एजंटों को आशातीत कमीशन और ऊपरी कमाई की लालच देकर अपने नेटवर्क में शामिल कर लिया है।जीवन बीमा निगम और डाकघर का नेटवर्क सर्वत्र है, इसलिए ऐसे एजेंटों की पहुंच भी उसी अनुपात में आम एजंटों के मुकाबले कहीं अधिक है।गनीमत है कि बैंकिंग सेक्टर के लोग फिलहाल इस दलदल में फंसे नजर नहीं  आ रहे हैं। पर अलमारियां एक के बाद एक खुल रही हैं, पता नहीं कब कहां से कोई नरकंकाल बरामद हो!


डाकघरों की अल्प बचत योजनाओं के ब्याज में लगातार हो रही कमी और जीवन बीमा कंपनी के कारोबार को मुक्त बाजार के हवाले कर दिये जाने से छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में इन एजंटो की आय बहुत कम रह गयी है। अल्प बचत और बीमा से मोहभंग की हालत में लोग अपने परिचित इन्ही संस्थाओं के एजंटों की ओर से बेहतर विकल्प बताने पर आंख मूंदकर निवेश करते रहे हैं।राष्ट्रीय अल्प बचत प्रणाली अब उस रूप में नहीं रह गई है जिसमें उसकी स्थापना की गई थी। इसका मकसद था उन लोगों की वित्तीय बचत को आकर्षित करना जो बाजार अर्थव्यवस्था के हाशिए पर थे और उस बचत को केंद्र और राज्य सरकारों को ऋण के रूप में देना। इसमें ग्रामीण बचत का बड़ा हिस्सा पहले भी और अब भी डाक घरों के जरिए नियंत्रित होता है।


श्यामला गोपीनाथ कमेटी की सिफारिशें अल्प बचत अभिकर्ताओँ के हित में नहीं है। एजंटों का कमीशन कम कर देने से पूरे देश के लगभग 5 लाख एजंटों के समक्ष जीविका की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।एजंटों का कमीशन कम कर देने से विगत 40 वर्षों से अल्पबचत के क्षेत्र में सेवाएं देते आ रहे एजंटों के समक्ष रोजगार की समस्या आ गयी है।जिससे वे बड़ी आसानी से चिटफंड कंपनियों के शिकंजे में फंसता जा रहे हैं।


बीमा योजनाओं के कायकल्प हो जाने से भी बीमा एजंटों का कारोबार घटा है। प्रीमियम भी वसूल न होने की हालत में लोग अब बीमा नहीं कराना चाहते। दूसरी ओर, उन्हें निजी बीमा संस्थाओं और उनके एजंटो का कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है।


जीवन बीमा एजंटों और डाकघर एजंटों की बाजार में अपनी अपनी संस्थाओं की साख की वजह से जनजीवन में उनकी गहरी पैठ का फर्जी कंपनियों ने खूब इस्तेमाल किया है। ग्रामीण और दूर दराज के इलाकों में ऐसा खूब हुआ है।


दिक्कत यह है कि इन एजंटों केनियमन और निगरानी की कोई व्यवस्था अभी बनी नहीं है। जो थी, वह भी अब नहीं है।


लोग निवेश के लिए जीवन बीमा निगम और डाकघरों में पहुंचते हैं, तो सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक जैसे मरीजों को डाइवर्ट करके निजी नर्सिग होम में भेज देते हैं और उनपर कोई कार्रवाई नहीं होती, उसीतरह की प्रैक्टिस में ये एजंट अब पारंगत हो गये हैं।


शारदा फर्जीवाड़ा के खुलासे से अपनी जमा पूंजी खोने के बाद एजेंटों के लिए जान बचाना मुश्किल हो रहा है।


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