BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Thursday, July 12, 2012

अदालती फैसले से असहमत - बिनायक

अदालती फैसले से असहमत - बिनायक



जेल के दौरान डॉ. बिनायक सेन को मानवाधिकार और लोक स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए सन् 2008 में जोनाथन मान अवार्ड और इस वर्ष लंदन में गांधी अवार्ड दिया गया। मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बिनायक सेन देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। फिलहाल वे जमानत पर हैं...

बिनायक सेन से अजय प्रकाश की बातचीत 

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आपको हाल ही में गांधी अवार्ड से नवाजा गया है, आप इस खुशी को किस रूप में रखना चाहेंगे?

मुझे लंदन के गांधी फाउंडेशन द्वारा गांधी अवार्ड दिया गया है। मैं फाउंडेशन के चयनकर्ताओं का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मुझे इस काबिल समझा। मैं इसे खुशी नहीं कहना चाहता, क्योंकि देश में मानवाधिकारों की जो स्थिति है, उसमें खुश होने की गुंजाइश बहुत कम है। यह तकलीफ मैंने अवार्ड लेते हुए भी साझा की थी। 

एक तरफ आपको गांधी अवार्ड से नवाजा जाता है और दूसरी तरफ हमारी सरकार आपको माओवादी मानती है?

ऐसी बात नहीं है। हम पेशे से डॉक्टर हैं और हम लोक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हैं। सरकार चाहे जो माने। हमें यह पुरस्कार भी लोक स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने के लिए दिया गया। 

आप लोक स्वास्थ्य के सवाल से लंबे समय से जुड़े हैं, भारत में इसके बेहतर होनी की क्या संभावनायें हैं?

हमारे देश में लगातार और लगातार गैरबराबरी बढ़ती जा रही है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की समिति 'कमिटी फोर सोशल डिटर्मिनेशन' की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में बढ़ती बीमारी की सबसे बड़ी वजह असमानता है। मैं इस रिपोर्ट को सही मानता हूं। देश का बड़ा तबका ऐसा है, जिसके पास खाने को पर्याप्त अन्न नहीं है। लोगों को दवाओं से पहले भरपेट अन्न की आवश्यकता है। हमारे देश में व्यापक आबादी के लिए ईलाज की सुविधा न होना तो एक सर्वमान्य सच जैसा है। 

सरकार इस दिशा में क्या प्रयास कर रही है?

अभी-अभी 12वीं पंचवर्षीय योजना में स्वास्थ्य के मसले को पहली बार रेखांकित कर सभी के लिए उचित और सुलभ भोजन को अधिकार के तौर पर शामिल करने की अनुशंसा की गयी है। सरकार इस अनुशंसा को स्वीकार करेगी, इसमें भी संदेह है। आज जो सिफारिशें हम कर रहे हैं वह बात 1946 में बनी भोर समिति ने भी कहीं थी। तब से सरकार इस दिशा में एक कदम भी नहीं चली है। भोर समिति की अनुशंसाओं को सरकार अगर लागू कर दे तो लोक स्वास्थ्य दुरूस्त हो जायेगा। पीपुल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) की एक याचिका पर सरकार फुड सिक्यूरिटी बिल बना रही है, लेकिन वह बिल सरकार अपने मन का बना रही है, पीयूसीएल के मुताबिक नहीं। इसके बनने के बाद भी भूख और बीमारी की वही भयावह स्थिति बनी रहेगी। 

छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मिलकर लोक स्वास्थ्य के क्षेत्र में और पीयूसीएल के पदाधिकारी के रूप में मानवाधिकार के क्षेत्र में आप काम करते रहे हैं। मगर वहां की सरकार पीयूसीएल को नक्सलियों का मुखौटा संगठन कहती है?

इधर-उधर के बयानों के बारे में नहीं कह सकता, मगर छत्तीसगढ़ सरकार ने मेरी जानकारी में ऐसा कोई औपचारिक बयान नहीं दिया है.

भारत में मानवाधिकारों की स्थिति के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

जेल से निकलते ही पहली बात जो मैंने मीडिया से कही थी, वह मानवाधिकार की चिंता ही थी। मैं तो फिर भी जमानत पर रिहा हो सका, मगर देश की जेलों में हजारों लोग ऐसे हैं जो बिना वजह जेलों में वर्षों से बंद हैं। तमिलनाडू के कुडनकुलम में न्यूक्लीयर प्लांट के खिलाफ संघर्षरत कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह का मुकदमा लगाकर जेलों में बंद कर दिया गया है तो पोस्को में जमीन न देने वालों को अपराधी करार दिया गया है। और हम उनकी कोई ढंग की कानूनी मदद भी नहीं कर पा रहे हैं। बंद लोगों के पक्ष में सभी मानवाधिकार संगठनों को पहल लेनी चाहिए, उन्हें रिहा किये जाने की कोशिश होनी चाहिए।  

माओवादी होने के आरोप में जेल में बंद पीयूसीएल की संगठन मंत्री सीमा आजाद को लेकर आपने कहा था कि आप उनसे जेल में जाकर मिलेंगे। अब उनको उम्रकैद की सजा हो चुकी है, आप इस मामले में क्या पहल लेने वाले हैं?

मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था। दूसरा, मिलना न मिलना कोई मायने नहीं रखता और न ही मेरे अकेले के करने से कुछ होने वाला है? कोशिश यह करनी है कि सीमा और उनके जैसे हजारों बंद लोगों को हम कैसे जेलों से बाहर निकालें। देशभर के मानवाधिकार संगठन इस मामले पर विचार-विमर्श कर रहे हैं कि क्या किया जा सकता है? वो जो फैसला लेंगे मैं भी उसमें भागीदार रहूंगा. सीमा आजाद को लेकर इलाहाबाद की निचली अदालत ने जो फैसला दिया है, उससे हम असहमत हैं। विचारों को मानने के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। 

कहा जाता है कि सीमा आजाद जैसे मामलों में निचली अदालतें आमतौर पर पुलिससिया वर्जन को पुष्ट करने वाले फैसले देती हैं?

मैं ऐसा नहीं मानता और न ही इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहूंगा.

आपके अपने केस की क्या स्थिति है?

मुझे छत्तीसगढ़ के रायपुर ट्रायल कोर्ट द्वारा देशद्रोह का आरोपी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा दी गयी है। मैं अप्रैल 2011 से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर जमानत पर हूं। मैंने सजा और मुकदमे दोनों के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर कर रखी है।  

ajay.prakash@janjwar.com

 

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