BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Thursday, July 12, 2012

समर्थन करें या विरोध, मलाई मिलेगी दोनों तरफ

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/2858-uttrakhand-bandh-samarthan-virodh-kee-rajniti

उत्तराखंड की बांध राजनीति 

पेयजल मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी जंतर मंतर पर जो ड्रामा कर आए हैं, उसके पीछे भी आम आदमी के साथ होने वाले 'हाथ' का ही हाथ है.जीडी अग्रवाल जैसे बांध विरोधी हों या उत्तराखंड जनमंच जैसे बांध समर्थक, सरकार हर किसी को अपने इशारों पर नचा रही है...

मनु मनस्वी

जैसा कि अंदेशा था, उत्तराखंड में वही हुआ.कांग्रेसी रंग में रंगा उत्तराखंड ने उसी अनुरूप जनमत दिया, जैसा कि दिल्ली का दस जनपथ चाहता था.सितारगंज विधानसभा उपचुनाव में साम-दाम-दंड-भेद की गंदली राजनीति के खेल में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इतनी भारी विजय प्राप्त की, जिसकी प्रकाश पंत (हारे प्रत्याशी) और भाजपा ने कभी कल्पना तक नहीं की होगी.

uttarkahhsभ्रष्टाचार के मामले में भाजपा के धुरंधर रहे निशंक भी आश्चर्य में हैं कि इस कदर गुपचुप तरीके से भी मालकटाई के साधन क्या बटोरे जा सकते हैं.उत्तरखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के घोटाले इसलिए सामने आ सके क्योंकि उन्होंने हद पार कर दी थी.वे पैसे पर ऐसे पिल बैठे थे, जैसे बरसों के भूखे को फ्री के होटल में छोड़ दिया गया हो, जबकि कानून के जानकार बहुगुणा हर चाल सोच-समझकर चल रहे हैं.वे मालकटाई के सभी रास्ते इस तरह खोल रहे हैं कि जनता को उसमें अपना हित नजर आए.यानि जनता का तो भला (ख्वाबों में) और नेताओं का तो खैर भला ही भला.

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में जब से कांग्रेस ने पैर धरा है, वह भी उन्हीं प्रदेशों की तर्ज पर लठियाया जा रहा है, जहां कांग्रेसी सूरमा मुखिया बने बैठे हैं.राज्य में आज चारों ओर भ्रष्टाचार का दानव ईमानदारी का सिर कुचलता जा रहा है, वह कांग्रेसी हब्सियों का ही पैदा किया हुआ ऐसा भस्मासुर है, जो खुद को छोड़ दूसरों को ही भस्म करने पर आमादा है.बारह वर्षों में इस राज्य की कुल जमापूंजी यदि कुछ है तो वो है हजारों करोड़ का कर्ज, जो न चाहते हुए भी हर उत्तराखंडवासी के सिर पर लादा जा चुका है.

सीमित संसाधनों वाले इस राज्य में ले-देकर पर्यटन और ऊर्जा ही ऐसे विकल्प बचते है, जो राज्य के विकास का खाका तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन सत्ता को मलाई का कटोरदान समझने वाले लोलुपों के लिए राज्य के हितों के कोई मायने ही नहीं हैं.उन्हें तो अपनी सातों पुस्तें इन पांच सालों में तारनी हैं, जिसके लिए वे किसी को भी गिरवी रख सकते हैं.

पेयजल मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी जंतर मंतर पर जो ड्रामा कर आए हैं, उसके पीछे भी आम आदमी के साथ होने वाले 'हाथ' का ही हाथ और करामात है.चाहे जीडी अग्रवाल जैसे बांध (और उत्तराखंड) विरोधी हों या उत्तराखंड जनमंच जैसे बांध समर्थक, सरकार हर किसी को अपने इशारों पर नचा रही है.और इस सबमें जनता का हित भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा ही नजर आता है.

अब तक तो जीडी अग्रवाल जैसों की एक ही जमात वजूद में थी, जो खुद को पर्यावरण का हितैषी बताकर उत्तराखंड के विकास के ताबूत में आखिरी कील ठोकते हुए बांधों का विरोध इस प्रकार कर रहे थे, मानों बांध बने, तो उत्तराखंड पर कहर बरपा जाएगा.ये जमात तो खैर अब धीरे-धीरे नंगी होने लगी है, लेकिन इधर बीते दिनों सत्ता और कॉरपोरेट के चारणभाटों की एक बिल्कुल नई जमात का उदय हुआ है, जिसे जनमानस का समर्थन भी मिल रहा है.

ये जमात बांधों का विरोध करने वालों को लतियाकर खुद को उत्तराखंड का उद्धारक घोषित कर रही है, जबकि असलियत यह है कि ये जमात बांध बनाने वाली कंपनी के फेंके हुए टुकड़ों पर पलकर ही ये सब ता-था-थैया कर रही है.उत्तराखंड जनमंच एण्ड कंपनी के एक सम्मेलन में कर्ताधर्ताओं ने बीते दिनों श्रीनगर में वरिष्ठ अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला के मुंह पर स्याही पोतने वालों को सम्मानित कर उन्हें 'वीर योद्धा' की उपाधि दे डाली.

सुनने में आया है कि आने वाले लोगों के लिए जीवीके कंपनी के पैसों से खाने का ऐसा लाजवाब प्रबंध था, कि हर कोई तारीफ के पुल बांधने को उतारू हो जाए.हुआ भी यही. जनता ने तालियां पीटकर उनका समर्थन किया.हद तो तब हो गई, जब एक पत्रकार द्वारा जनमंच से बांध बनाने वाली कंपनी के टट्टू होने के संबंध में पूछने पर जनमंच के महासचिव राजन टोडरिया ने खुलेआम कह दिया कि राज्य हित में यदि कोई जनमंच की सहायता करेगा, तो वह स्वीकार्य है.

जिस प्रकार उत्तराखंड जनमंच जीवीके कंपनी के सवेसर्वा रेड्डी की खाकर उसकी बंसी बजा रहा है, उससे राज्य के भविष्य की उजली तस्वीर की कल्पना तो बेमानी ही होगी, हां उजली तस्वीर यदि किसी की बनेगी, तो वो हैं, अवधेष कौशल, राजन टोडरिया और लीलाधर जगूड़ी की, जो 'जो भी प्यार से मिला हम उसी के हो लिए' की तर्ज पर हर सरकार से गोटी भिड़ाए रखते हैं.

लब्बोलुआब यह है कि राज्य में बांधों का समर्थन करने वाले भी बिके हुए हैं, और विरोध करने वाले भी.अब किसे चुनें यह यक्षप्रश्न है.हम तो बस यही दुआ कर सकते हैं कि बांध राज्य की जरूरत हैं, लेकिन यदि इसके लिए जनमंच जैसे सरकारी भोंपूं आगे आते हैं तो इसका विरोध किया ही जाना चाहिए.

manu-manasvee

लेखक उत्तराखंड में पत्रकार हैं.

No comments:

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...