BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Wednesday, June 13, 2012

हत्यारे के लिए सीबीआई और बाकी से बेहयाई

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/important-articles/300-2012-04-23-13-06-14/2740-hatyare-ke-liye-cbi-bramheshwar-mukhiya-ranveer-sena-cpiml-bathani-tola

नीतीश सरकार की पुलिस ने ही तो बथानी कांड के मुकदमे के वक्त ब्रह्मेश्वर को जेल से फरार दिखाया था, जबकि वह उस वक्त आरा जेल में ही बंद था.नीतीश कुमार पहले से ही पूरी नंगई के साथ हत्यारों के पक्ष में खड़े हैं...

सुधीर सुमन

पूर्ववर्ती लालू-राबड़ी सरकार के कारनामों की वजह से प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए नीतीश कुमार किसी भी मामले में उससे अलग नहीं हैं. दो दर्जन से अधिक जनसंहारों के अभियुक्त रणवीर सेना सरगना ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या की सीबीआई की जांच की मांग को आनन-फानन मान लेना इसका एक बड़ा सबूत है.लालू यादव और रामविलास पासवान द्वारा भी लपककर जिस तरह इस हत्या की सीबीआई जांच की मांग की गई, वह भी यही साबित करता है कि इन्हें सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक यथास्थिति की ही राजनीति करना मंजूर है.

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एक हत्यारे जिसने अपनी रिहाई के बाद भी कबूल किया कि वह रणवीर सेना का मुखिया था और जिसने नक्सलियों के कथित अत्याचार के खिलाफ हथियार उठाया था, जिसने यह कहकर बेगुनाह महिलाओं और बच्चों की हत्या की थी कि वे नक्सलियों को जन्म देती हैं और वे बड़े होकर नक्सली बनेंगे, उसे किसानों का हितैषी और गांधी बताना बिहार की राजनीति की अजीब विडंबना है.

नीतीश सरकार का भाजपाई मंत्री गिरिराज सिंह लगातार एक हत्यारे को महिमामंडित कर रहा है और नीतीश कुमार में हिम्मत नहीं है कि उसका विरोध करें. 

दरअसल ब्रह्मेश्वर सिंह की हत्या के बाद जैसे ही सीबीआई जांच की मांग उठी, उस वक्त तक रणवीर सेना की तरफदारी का जो नीतीश कुमार का रिकार्ड रहा था, उसे ही देखते हुए स्पष्ट हो गया था कि वे इसकी जांच की मांग को मान लेंगे.एक मुख्यमंत्री जो सत्तानशीन होते ही रणवीर सेना के राजनैतिक संरक्षकों की जांच के लिए बने अमीरदास आयोग को भंग कर चुका हो, उससे दूसरी उम्मीद की ही नहीं जा सकती थी.

नीतीश सरकार की पुलिस ने ही तो बथानी कांड के मुकदमे के वक्त ब्रह्मेश्वर को जेल से फरार दिखाया था, जबकि वह उस वक्त आरा जेल में ही बंद था.नीतीश कुमार पहले से ही पूरी नंगई के साथ हत्यारों के पक्ष में खड़े हैं, उन्हें लेकर किसी को कोई भ्रम नहीं है.सीबीआई जैसी संस्थाओं की जांच से परे गरीब मेहनतकशों की निगाह से जो जांच अनवरत चलती रहती है, उसमें लालू जी का 'सामाजिक न्याय' पहले कटघरे में आया था और आज नीतीश कुमार का 'न्याय के साथ विकास' कटघरे में है.

लेकिन नीतीश कुमार अभी भी बहुमत के नशे से बाहर नहीं आए हैं, वे अपने दोहरे मानदंड के लिए कुतर्क गढ़ने में माहिर हैं.उनका कहना है कि ब्रह्मेश्वर के परिवार वालों ने सीबीआई जांच की मांग की थी, इसलिए उन्हें मानना पड़ा.सवाल यह है कि हाल के महीनों में भाकपा-माले के रोहतास जिला सचिव भैयाराम यादव और औरंगाबाद जिले के सोनाहाथू पंचायत के मुखिया देवेंद्र सिंह उर्फ छोटू कुशवाहा की हत्या की सीबीआई जांच की मांग नीतीश कुमार ने क्यों नहीं मानी, जबकि उसकी मांग उनके परिवार के साथ-साथ दसियों हजार लोगों ने की? जिले और विधानसभा में प्रदर्शन भी किए.

छोटू कुशवाहा की हत्या के खिलाफ औरंगाबाद में जो प्रदर्शन हुए, उसमें अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव और ओबरा विधानसभा से दो बार विधायक रह चुके राजाराम सिंह पर खुद पुलिस के आला अधिकारियों ने बर्बर तरीके से हमला बोला और बुरी तरह जख्मी हालत में उन्हंे जेल में डाल दिया.इस बर्बर और जानलेवा पिटाई की जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए? इसी दौरान सीपीएम के एक प्रखंड सचिव सुरेंद्र यादव की हत्या हुई, उसकी भी सीबीआई जांच की अनुशंसा नहीं की गई? 

जून 2011 में फारबिसगंज में जब एक भाजपा पार्षद के कारखाने के लिए चाहरदीवारी बनाकर एक परंपरागत रास्ते को अवरुद्ध करने के खिलाफ विरोध कर रहे 4 निर्दोष मुसलमानों को पुलिस ने गोली मार दी थी, तब भी सीबीआई जांच की मांग उठी थी, लेकिन नीतीश कुमार ने कोई ध्यान नहीं दिया.अगले 15 जून को वामपंथी दलों के संयुक्त कन्वेंशन में ये परिवार भी जुटेंगे और नीतीश कुमार से सीबीआई जांच की मांग करेंगे, तब यह देखने लायक होगा कि नीतीश कुमार बिहार की सवर्ण-सांप्रदायिक और सामंती शक्तियों की ओर से कौन सा पैंतरा लेते हैं? 

विपक्षी पार्टियों की जांच की मांग इसे लेकर भी है कि वे कौन सी परिस्थितियां थीं, जिसके कारण रूपम पाठक ने एक भाजपा विधायक की हत्या की और उसने पहले जो उस विधायक पर आरोप लगाए थे, उस पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? बिहार में भ्रष्टाचार के दो बड़े मामलों- ट्रेजरी घोटाला और बियाडा जमीन घोटाला की मांग भी जोरशोर से उठी थी, लेकिन नीतीश कुमार ने इसका उपहास उड़ाते हुए यह कहा कि विपक्ष के पास दूसरा कोई काम नहीं है, इसलिए वे सीबीआई जांच की मांग उठाते रहते हैं.

बिहार की आम जनता हत्याओं के विरोध और प्रदर्शनों के चरित्र का फर्क भी देख रही है.ब्रह्मेश्वर की हत्या के बाद सड़कों पर खुलेआम गुंडागर्दी और आगजनी का जो शर्मनाक उदाहरण पूरे देश ने देखा, वैसा तो कोई उदाहरण उन शक्तियों ने कभी पेश नहीं किया, जिनको रणवीर सेना और उसको संरक्षण देने वाली राजनीतिक पार्टियां हमेशा के लिए मिटा देना चाहती हैं.

नीतीश कुमार द्वारा सीबीआई जांच की मांग को स्वीकार कर लेना इस मसले को थोड़ा लंबा खींचने की मंशा से भी प्रेरित हो सकता  है.भूमिहार समुदाय के भीतर से पिछले दो दशक में उभरे पेशेवर अपराधियों, लुटेरों और हत्यारों की जमात के आपसी अंतर्विरोधों को भी इस बीच हल करने की कोशिश की जा सकती है.अब इसमें भाजपा के भी अपने स्वार्थ हैं और जद-यू के भी.

दोनों इसके जरिए भूमिहार वोटों को अपनी ओर खींचना चाहते हैं.सवाल यह भी है कि जद-यू विधायक सुनील पांडेय, जिस पर ब्रह्मेश्वर सिंह के परिवार वालों को संदेह है, उसे हिरासत में लेकर पूछताछ क्यों नहीं की जाती? इसके पहले भी सुनील पांडेय अपने कारनामों की वजह से कुख्यात रहे हैं, फिर भी नीतीश कुमार का वरदहस्त उन पर क्यों है? सुनने में यह भी आता है कि भोजपुर-रोहतास में रंगदारी टैक्स वसूली समेत तमाम जयराम पेशे आजकल सुनील पांडेय और उनके विधान पार्षद भाई हुलास पांडेय द्वारा ही चलाया जा रहा है.

आरा नगर निगम चुनाव में सुनील पांडेय और ब्रह्मेश्वर सिंह समर्थक वार्ड पार्षद के मेयर बनाने की रस्साकसी में ब्रह्मेश्वर की असफलता की भी एक चर्चा है.लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि खुद ब्रह्मेश्वर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी सुनील पांडेय और उसके बीच टकराव की वजह बनी होगी.रणवीर सेना द्वारा वसूली गई भारी राशि और संपत्ति के बंटवारे को लेकर भी यह हत्या की गई होगी, इसकी चर्चा भी आम लोगों की जुबान पर है.

सवर्ण ग्रंथी से पीडि़त कई लोगों को यह भी लगता है कि ब्रह्मेश्वर आजकल किसान-मजदूरों की एकता और किसानों की सवालों पर संघर्ष की बात करने लगा था, इस कारण उसकी हत्या हुई.कुछ लोगों को यह भी लगता है कि उसकी हत्या उन लोगों की ओर से भी हो सकती है, जिनकी हत्याएं उसने की या करवाई.उसने सिर्फ गरीब मेहनतकशों की हत्या नहीं करवाई थी, बल्कि सवाल उठाने या विरोध करने पर उसकी सेना ने भूमिहार जाति के नौजवानों की हत्या भी की थी.खैर, ब्रह्मेश्वर की हत्या किसने की, यह तो जांच का विषय है.लेकिन जहां प्रशासन और सरकार पूरी तरह सवर्ण-सांप्रदायिक और सामंती शक्तियों के लिए समर्पित हो, वहां जांच के परिणाम भी संशय से परे कहां होंगे? उसके भी राजनीतिक निहितार्थ पर बहसें खड़ी होंगी.

सीबीआई जांच के जो भी परिणाम आएं, इस वक्त तो अपने दोहरे रवैये के कारण नीतीश सरकार खुद जनता के कटघरे में खड़ी हैं और उसके साथ ही राजद, लोजपा, कांग्रेस आदि शासकवर्गीय पार्टियां भी कटघरे में हैं, जिन्होंने कभी जनसंहारों की सीबीआई जांच की मांग नहीं की.रणवीर सेना के हमलों में जो लोग मारे गए थे, वे सिर्फ भाकपा-माले के समर्थक नहीं थे, वे राजद के जनाधार के भी लोग थे.भाकपा-माले की तो अभी भी मांग है कि रणवीर सेना के संरक्षकों  के नाम सामने लाए जाएं और उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाए.बथानी टोला समेत तमाम जनसंहारों के अभियुक्तों को दंडित किया जाए.

इस वक्त ब्रह्मेश्वर सिंह के घर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता मातमपुर्सी करने के लिए पहुंच रहे हैं.सवाल यह है कि इस तरह के हत्यारे को महिमामंडित करके ये पार्टियां किस राजनीतिक संस्कृति को बरकरार रखना चाहती हैं? सीबीआई जांच के परिणाम जो भी आएं, लेकिन जद-यू, भाजपा समेत राजद, लोजपा, कांग्रेस आदि तमाम पार्टियों का सामंतपरस्त चेहरा सामने आ गया है.

ब्रह्मेश्वर सिंह को किसानों के प्रतिनिधि के तौर पर पेश करना यह भी साबित करता है कि ये पार्टियां किसानों की शुभचिंतक नहीं हैं.जिस दिन खेत मजदूरों के साथ वास्तविक किसान कृषि विरोधी नीतियों के खिलाफ खड़ें होंगे, उस दिन ये पार्टियां और इनकी सरकारें उनका भी बर्बर दमन और संहार करने से बाज नहीं आएंगी. 

sudheer-sumanजन संस्कृति मंच से जुड़े सुधीर सुमन राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर लिखते हैं. 

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