BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Wednesday, June 13, 2012

सोनिया के रिमोट में ही वाइरस, इसीलिए अर्थव्यवस्था पर यह संकट!

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सोनिया के रिमोट में ही वाइरस, इसीलिए अर्थव्यवस्था पर यह संकट!

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

असहनीय धूप के साथ घबराहट पैदा करने वाली उमस की जुगलबंदी लोगों की दिनचर्या एवं सेहत पर भारी पड़ रही है। सूरज फिर आग उगलने लगा। अर्थ व्यवस्था ने मौसम की उमस को और दमघोंटू बना दिया है और इसे समझने के लिए अर्थ शास्त्री होना जरूरी नहीं भी है। थोड़ा आंख कान खुले होने चाहिए। पर संकट यह है कि आम आदमी आर्थिक मामलों से घबराता है। कमाया और बीवी के हवाले घर की जिम्मेवारी। न कोई हिसाब किताब,​​ न कोई सरोकार। पढ़े लिखे भी अर्थ व्यवस्था से कतराते हैं। तकनीक समझने में आज शाइनिंग इंडिया के गली गली पसरे शंघाई में किसी को कोई तकलीफ नहीं है , पर अपने बहिष्कार और कत्ल के चाकचौबंद इंतजाम को नजरअंदाज करके हम खुद सत्तावर्ग की नरसंहार संस्कृति को आक्सीजन दे रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल पिछले कुछ वक्त से बेहाल नजर आ रहा है। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। जीडीपी का घटकर 9 साल के सबसे न्यूनतम स्तर 5.3 फीसदी तक पहुंच जाना, कृषि क्षेत्र में महज 1.7 प्रतिशत का विकास तो उत्पादन के क्षेत्र महज 0.3 प्रतिशत विकास दर, बढ़ता वित्तीय घाटा और बढ़ती महंगाई।एसएंडपी ने कहा है कि शक्तिशाली कांग्रेस अध्यक्ष और नियुक्त प्रधानमंत्री के बीच भूमिकाओं का विभाजन है। इसी के चलते नीति निर्धारण ढांचा कमजोर हुआ है। एसएंडपी की चेतावनी के बाद सरकार कोई ठोस कदम उठाने के बजाय अब भी आर्थिक संकट होने से इनकार कर रही है, लेकिन इस इनकार से कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि विदेशी निवेशक इस रेटिंग और रेटिंग एजेंसी पर बेहद भरोसा करते हैं। एसएंडपी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की ऋण साख घटाने की चेतावनी दी है। उसने कहा कि धीमे विकास और नीति निर्धारण में राजनीतिक अवरोधों के चलते भारत निवेश ग्रेड रेटिंग खोने वाला पहला ब्रिक देश बन सकता है।एसएंडपी ने कहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अलग भूमिकाएं होने के चलते ही देश में सुधारों की गाड़ी अटकी पड़ी है। आर्थिक उदारीकरण में रुकावट के लिए सहयोगी दल और विपक्ष जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि केंद्र सरकार में नेतृत्व ही इस संकट की जड़ है।फिलहाल, इंवेस्टमेंट ग्रेड कैटेगरी में भारत सबसे निचले स्तर पर है। बीबीबी रेटिंग के साथ रूस और ब्राजील भारत से एक पायदान ऊपर हैं। भारत के अलावा सभी ब्रिक देशों का आउटलुक स्टेबल है। एजेंसी ने विल इंडिया बी द फस्र्ट ब्रिक फॉलन एंजलि! शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें यह चेतावनी दी गई है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया है कि भारत ब्रिक देशों में अपनी निवेश ग्रेड रेटिंग गंवाने वाला संभवत: पहला राष्ट्र हो सकता है। ब्रिक में ब्राजील, रूस, भारत और चीन आते हैं। वित्त मंत्री ने कहा कि आगामी महीनों में आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं बढ़ेंगी।एस एन्ड पी ने अपनी रिपोर्ट में कहां हे पिछले दस सालों में ब्राजील, रूस और चीन के साथ साथ भारतीय अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ी है, लेकिन अब हालात और हैं।आर्थिक सुधारों को अगर तेजी नहीं दी गई तो इन देशों के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था पिछड़ जाएगी।

औद्योगिक उत्पादन लगभग शून्य है और अर्थ व्यवस्था चौपट है। संपूर्ण बहुमत न मिलने की १९८४ से चल रही परंपरा को राजनीतिक बाध्यता बताकर असलियत पर पर्दा डालने का कारोबार चल रहा है। जबकि अल्पमत नरसिंह राव सरकार ने बिना बहुमत देश की अर्थ व्यवस्ता को खुला बाजार बना दिया और तबसे आर्थिक सुधार बेरोकटोक जारी है। भारत अमेरिका परमाणु संधि भी बिना बहुमत पास हो गयी। तो नीति निर्धारण में विकलांगता की वजह ​​संसद नहीं है, न संविधान है और न लोकतांत्रिक व्यवस्था, अब ताजा रेटिंग रपट से यह खुलासा हो ही गया है कि शरीकी मारामारी नहीं, क्षत्रपों की महांत्वांक्षा भी नहीं और न उनकी निर्मम सौदेबाजी, असली वजह सोनिया गांधी के उस  रिमोट में है जिसमें गैर संवैधानिक, गैर संसदीय तत्वों के सहारे आहलूवालिया , सैम पित्रोदा, नंदन निलेकणि, रंगराजन जैसे लोगों के जरिये प्रणव मुखर्जी, कमलनाथ, चिदंबरम के कंधे पर बंदूक रखकर सरकार और अर्थ व्यवस्था का संचालन कर रही हैं। बिना किसी वित्तीय नीति के महज मौद्रिक कवायद और बहुजनों के बहिष्कार और नरसंहार संस्कृति के जरिये। कारपोरेट​ ​इडिया, काला धन, बिल्डर प्रोमोटर माफिया, काला बाजार, भ्रष्टाचार और वैश्विक पूंजी के हक में । सरकार को शेयर बाजार की चिंता है। अबाध पूंजी परवाह यानी कालाधन घुमाने की फिक्र है, पर उत्पादन प्रणाली और अर्थ व्यवस्था की कोई चिंता नहीं है।बहिष्कृत भूगोल और समाज के बहुजनों की क्या औकात, सिवाल सोसाइटी को भी देश द्रेही बताने से परहेज नहीं करती यह सरकार। क्या भारतीय संविधान में सोनिया गांधी के रिमोट का कोई प्रावधान है ,क्या संविधान के मुताबिक भारतीय प्रधानमंत्री का संसद और जनता के अलाव किसी औरके प्रति ​​जवाबदेही है, इस यक्ष प्रश्न का जवाब दिये बगैर अर्थव्यवस्था की बदहाली का रोना फिजूल है।मालूम हो कि अब सिर्फ सीमा आजाद या विनायक सेन नहीं, सरकार की नजर में अन्ना हजारे भी देशद्रोही हैं। बहरहाल अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से मिली चिट्ठी का जवाब देते हुए कहा, 'PMO' की चिट्ठी में मुझे देशद्रोही बताया गया है. अन्ना ने चिट्ठी पर सवाल उठाते हुए कहा, 'अगर मैं देशद्रोही हूं तो सरकार आपकी है, आप कार्रवाई क्यों नहीं करते? अगर मैं देशद्रोही हूं तो मुझे जेल में क्यों नहीं डाल दिया जाता? अन्ना कारपोरेट साम्राज्यवाद या अंध हिंदू राष्ट्रवाद या खुले बाजार के खिलाफ नहीं हैं, सिर्फ कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ बोल रहे हैं  तो उनके साथ यह सलूक, तो व्यवस्था बदलने का ख्वाब देखने वालों का क्या होगा?ऐसी निरकुंश सत्ता तो ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भी नहीं थी और न ही सत्ता किसी सोनिया गांधी के रिमोट में समाहित थी!

चिदंबरम या प्रणव मुखर्जी आर्थिक मामलों में दक्षता के कारण नहीं, राजनीतिक जोड़ तोड़ के कारण वित्तमंत्री बना दिये जाते हैं और बाहैसियत वित्तमंत्री वे राजनीतिक बाध्यताओं को ही संबोधित करते हैं। देश, अर्थ व्यवस्था या बहुसंख्यक जनता के हितों से उनका सरोकार नहीं है। जिनके सरोकार हैं, कारपोरेट साम्राज्यवाद की बढ़त के लिए उफान पर आये अंध हिंदू राष्ट्रवाद के बहाने उन्हें राष्ट्रद्रोही बताकर निरंकुश अव्वस्था का आलम बना दिया गया है।​​बेतरतीब असहनीय मौसम की तरह हमारे लोग प्रबल धर्मांध जैसे इसे ईश्वरीय अभिशाप मानकर खामोश तमाशबीन बने हुए हैं इस हद तक कि​ ​ अपने रगों से बहते खून की खबर तक नहीं।भारत की साख को लेकर अंतरर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स [एसएंडपी] की सख्त चेतावनी को औद्योगिक उत्पादन के आंकडे़ मजबूती दे रहे हैं।एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में चेताया है कि भारत की रेटिंग को सटोरिया ग्रेड में डाला जा सकता है। यही नहीं, पहली बार किसी वैश्विक रेटिंग एजेंसी ने एक प्रकार से सरकार पर राजनीतिक टिप्पणी भी की है। मुखर्जी ने एसएंडपी की रिपोर्ट के कुछ घंटे बाद ही कहा कि मौजूदा स्थिति पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आगामी महीनों में देश में वृद्धि की संभावनाएं बलवती होंगी।भारत की ऋण साख घटाने की चेतावनी देने वाली एसएंडपी पर ही वित्त मंत्रालय ने पारदर्शी नहीं होने का आरोप जड़ दिया है। मंत्रालय ने कहा कि एसएंडपी जितना आंक रही है, भारतीय अर्थव्यवस्था उससे कहीं बेहतर स्थिति में है। आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव आर गोपालन ने कहा कि आप कुछ मानदंडों के आधार पर फैसला नहीं कर सकते। हम मानते हैं कि हमारी स्थिति बेहतर है।लेकिन नए वित्त वर्ष की शुरुआत ही औद्योगिक उत्पादन के मोर्चे पर बुरी खबर से हुई है। अप्रैल में कारखानों में उत्पादन एकदम ठप रहा। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर 0.1 प्रतिशत रही। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भी औद्योगिक उत्पादन की धीमी रफ्तार पर चिंता जाहिर की। उन्होने कहा कि अर्थव्यवस्था को लेकर देश मे नकारात्मक धारणा बनी हुई है। सरकार इसे सकारात्मक करने के लिए कदम उठाएगी। केंद्र सरकार की नीतिशून्यता ने देश के औद्योगिक उत्पादन का पहिया पूरी तरह रोक दिया है। भारत की आर्थिक सेहत और साख में गिरावट की आशंकाओं को मजबूती देते हुए औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार अप्रैल में सिर्फ 0.1 प्रतिशत पर सिमट गई। बाइस उत्पाद व उद्योग समूहों में से दस में उत्पादन घटा है। खनन व कैपिटल गुड्स का उत्पादन बुरी तरह टूट गया है। अब निगाहें रिजर्व बैंक [आरबीआइ] की तरफ हैं, जो अगले हफ्ते मौद्रिक नीति की समीक्षा करेगा। इस दौरान वह ब्याज दरों में कमी का एलान कर सकता है। औद्योगिक उत्पादन की धीमी होती रफ्तार के बाद अब रिजर्व बैंक की तरफ से ब्याज दरों में कमी की संभावना बढ़ गई है। केंद्रीय बैंक इस महीने की 18 तारीख को मौद्रिक नीति की मध्य तिमाही समीक्षा पेश करेगा। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी मानते हैं कि औद्योगिक उत्पादन में लगातार गिरावट को देखते हुए रिजर्व बैंक रेपो रेट [वह दर जिस पर बैंक आरबीआइ से कम अवधि के कर्ज प्राप्त करते हैं] में कम से कम चौथाई फीसद की कमी कर सकता है।रिलायंस इंडस्ट्रीज के केजी-डी6 क्षेत्र में उत्पादन के अब तक के निचले स्तर पर पहुंचने के बीच कंपनी ने आगाह किया है कि यदि सरकार ने उत्पादन बढ़ोतरी के लिए निवेश की मंजूरी नहीं दी, तो क्षेत्र में उत्पादन और घट सकता है। रिलायंस इंडस्ट्रीज ने धमकी दी है कि वह उत्पादन में गिरावट के लिए क्षतिपूर्ति की मांग करेगी, क्योंकि इसकी वजह यही है कि सरकार गैस क्षेत्रों में निवेश योजना को मंजूरी नहीं दे रही है।

जारी..

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