BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Saturday, June 9, 2012

अब कुमाउनी कविता में ‘मास अपील’ कौन लायेगा ?

http://www.nainitalsamachar.in/sherda-a-kumaoni-poet-of-masses/

अब कुमाउनी कविता में 'मास अपील' कौन लायेगा ?

6 अक्टूबर और 28 नवम्बर 1977 के बीच का कोई गुनगुना दिन था……तीसरा पहर…..जब शेरदा को पहले पहल देखा। याद यों है कि 6 अक्टूबर को रिंक हॉल में जंगलों की वह नीलामी ध्वस्त हुई थी, जिसने मुझे 'बच्चा सम्पादक' से स्थायी आन्दोलनकारी बना दिया और 28 नवम्बर तो खैर 'नैनीताल क्लब कांड' के कारण अब इतिहास में दर्ज है। मैं शेखर पाठक के साथ मल्लीताल से लौट रहा था कि तब के नटराज (आज के क्लासिक) होटल के पास शेखर आदतन एक दुबले, लम्बे, झोले-टोपी वाले ठेठ पहाड़ी व्यक्ति के साथ गुणमुण करने लगा। मैं थोड़ा आगे इन्तजार करता हुआ कुढ़ता रहा। उसके मुक्त होने के बाद मैंने पूछा तो उसने बताया कि ये शेरदा अनपढ़ हैं। ''ओ हो, ओ परूली बौज्यू वाले!'' मुझे आकाशवाणी के 'उत्तरायण' कार्यक्रम का उन दिनों का सबसे लोकप्रिय कुमाउनी गीत याद आ गया।

फिर जान-पहचान बढ़ी और वन आन्दोलन के प्रभाव में शेरदा ने हमारे लिये एक गीत लिखा- ''बोट हरीया हीरूँ का हारा, पात सुनूँ का चुड़ / बोट में बसूँ म्यर पहाड़ा, झन चलाया छुर / ठ्यकदारों तुम ठ्याक नि ल्हिया, ख्वार फुटाला धुर / जथकैं हमारा धुर जंगला, उथकैं हमर सुर। उस दौर में गिरदा के 'आज हिमाल' के साथ यह गीत भी खूब गाया गया। हालाँकि अपनी मजबूरियों के चलते शेरदा गिरदा की तरह प्रत्यक्ष रूप से सड़क पर गाने नहीं आ सकते थे।

1980 में कभी एक दिन बटरोही जी शेरदा को लेकर समाचार में आ गये। उन्होंने कोशिश कर कुमाऊँ विश्वविद्यालय के एम.ए. (हिन्दी) के पाठ्यक्रम में कुमाउनी को वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल करवा कर शेरदा की एक किताब को लगवा दिया था। लेकिन ऐसी किताब तो कहीं थी ही नहीं। तब तक शेरदा छपे रूप में 'दीदि बैणी', 'हसणैक् बहार' जैसी बहुत छोटी-छोटी कितबिया में ही उपलब्ध थे। तब 'हुड़का प्रकाशन' के पहले पुष्प के रूप में 'मेरि लटि पटि' का प्रकाशन किया गया। हुड़का प्रकाशन के लिये मैं, शेखर, गिरदा, नवीन जोशी, हरीश पन्त, पंकज बिष्ट, प्रमोद जोशी, थ्रीस कपूर और भी न जाने कौन-कौन मित्र हर महीने पच्चीस या पचास रुपये जमा कर एक पूँजी तैयार कर रहे थे और तभी संयोग से हमें शेरदा अनपढ़ की यह किताब छापने को मिल गई। गिरदा ने शेरदा के साथ लग कर उनकी कवितायें संग्रह के रूप में 'गछ्यायीं', सखा दाज्यू (विश्वंभरनाथ साह 'सखा') ने मन लगा कर 'लटि पटि' का कवर डिजाइन किया और हरीश पंत ने राजहंस प्रेस के फोरमैन आनन्द मास्साब के साथ ट्रेडिल पर ब्लॉक से चार रंग की वह शानदार छपाई की कि फोर कलर आफसैट छपाई भी मात खा गई! इसी पाठ्यक्रम के लिये हमने देबसिंह पोखरिया और डी.डी. तिवारी की 'कुमाउनी लोक साहित्य' भी प्रकाशित की और फिर हुड़का प्रकाशन ने चारु चन्द्र पांडे जी का 'अङवाल', वंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' का 'सिसौंण' कविता संग्रह और नित्यानंद मिश्र जी की पुस्तक 'कूर्माचल गौरव गाथा छापे। आज इनमें कोई भी पुस्तक उपलब्ध नहीं है। हुड़का प्रकाशन भी इन्हीं के साथ डूब गया, बगैर किसी लेखक को एक पैसा दिये या स्वयं कुछ कमाये! शेरदा महीने-दो महीने में आते और 'मेरि लटि पटि' की दस-पन्द्रह प्रतियाँ उठा ले जाते। यही उनकी रॉयल्टी रही। न उन्हें अपनी किताब से कुछ पाने की उम्मीद थी और न हम उन्हें कुछ दे पाने की स्थिति में थे। शायद एक बार हमारी बातचीत में रॉयल्टी को लेकर कुछ बदमजगी पैदा हुई।

'मेरि लटि पटि' के प्रकाशन के दौरान शेरदा का नैनीताल समाचार में नियमित आना होता था। गिरदा भी मौजूद होता और तब अनेक बार उनके साथ अच्छी बहसें होती थीं। हालाँकि बहस करना उनका स्वभाव नहीं था, वे तो स्वाभाविक कवि थे। समकालीन विश्व साहित्य तो छोड़ें, भारतीय या हिन्दी साहित्य की भी उन्हें कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन उनकी कविता जब फूटती तो हरेक को अपने साथ बहा ले जाती थी। 'लटि पटि' का प्रकाशन करते हुए ही मैंने जाना कि उन्होंने 'मनखी और मौत', 'मुर्दाक बयान' और 'जग जातुरि' जैसी असाधारण कवितायें भी लिखी हैं। 1983 में जब बाबा नागार्जुन नैनीताल आये और उन्होंने समाचार दफ्तर में बैठ कर 'हम जंगलों का एक एक बिरवा' कविता लिखी, तभी उन्हें शेरदा से उनकी कुछ गंभीर कवितायें सुनवाई गई। बाबा मंत्रमुग्ध हो गये। हम उन दिनों शेरदा से बहुत नाराज होते कि वे सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में ऐसी विश्वस्तरीय रचनाओं से कुमाउनी साहित्य को वंचित कर रहे हैं। लेकिन उस रोज रानीबाग में उनकी चिता को अपलक देखते हुए मुझे इलहाम हुआ कि ऐसे साहित्य से ही तो उन्होंने सामान्य से सामान्य व्यक्ति के साथ तादात्म्य स्थापित किया और कुमाउनी कविता को 'एलीट' बनने से बचाये रखा। अन्यथा कुमाउनी कविता जन-जन की कविता कैसे बनती और क्यों लोग कुमाउनी कवि सम्मेलनों की ओर फटकते ? शेरदा के जाने के बाद सबसे बड़ी चुनौती तो यही रहेगी कि कुमाउनी कविता में वह 'मास अपील' कौन पैदा करेगा ?

लीजिये शेरदा की एक कविता सुनिये

संबंधित लेख....

No comments:

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...