BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, June 11, 2012

मासूमों का मुर्दाघर बना बिहार

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मासूमों का मुर्दाघर बना बिहार

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मासूमों का मुर्दाघर बना बिहार
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४० साल का राम श्रृंगार अपने ८ साल के बच्चे की लाश के सामने चुपचाप बैठा हुआ है। उसकी आँखों में एक बूँद आंसू नहीं हैं। हाँ, उसकी अंगुलियाँ जमीन को खोद रही है, मानो नाखूनों से माटी खोदकर वह खुद उसमें समा जाना चाहता हो। दरअसल राम श्रृंगार और बिहार के मुजफ्फरपुर, गया और अन्य आदिवासी इलाकों में रहने वाले उस जैसों के लिए जीने और मरने का अंतर खत्म हो गया है। इन इलाकों में बच्चों की अज्ञात बीमारी से हो रही मौतों से त्राहि-त्राहि मची है। सरकारी मशीनरी स्वस्थ्य सेवाओं की तंगहाली का रोना रो रही है। मुख्यमंत्री खुश है कि बिहार विकास की दौड़ में अन्य राज्यों को पीछे छोड़ रहा है। केंद्र के लिए ये इलाके हमेशा से माओवाद के कारखाने रहे हैं, यहाँ सिर्फ बंदूक की गोलियाँ भेजी जाती हैं, दवा की गोलियां नहीं। बिहार के मुजफ्फरपुर और गया जिलों में पिछले १९ दिन के दौरान ८७ बच्चों की अज्ञात बीमारी से मौतें हुई हैं। ये सरकारी आंकड़ा है जिनमे वो बच्चे शामिल हैं जो सरकारी अस्पताल तक पहुँच पाए। अगर गैर सरकारी आंकड़ों को देखा जाए तो इससे सिर्फ बिहार ही नहीं पूरा देश शर्मिंदा होगा।

हैरतंगेज ये है कि इन ताबडतोड मौतों के बावजूद सरकार अब तक बीमारी की मूल वजह नहीं ढूँढ पायी है। चिकित्सक अब तक इस अज्ञात बीमारी को एक्यूट एंसिफ्लोपैथी सिंड्रोम समझ कर इलाज कर रहे हैं जिसमे लू लगने, सेरेबरल मलेरिया, मेंनिंजाइटिस, टीबी मेनिंजाइटिस और न्यूरो साइस्टिकरकोसिस जैसी १७ बीमारियों के लक्ष्ण होते हैं। लेकिन अभी तक इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि ये रोग जापानी इन्सेफेलाइटिस ही है। बिहार के पत्रकार साथी संजीव चन्दन कहते हैं ये मौत का ये आंकड़ा बेईमानी है। आज भी बिहार के दूरगामी इलाके स्वस्थ्य सेवाओं से पूरी तरह से कटे हुए हैं। इनमे वो आंकड़े शामिल नहीं है जिनकी मौत चिकित्सा अभाव में हो रही है, या फिर वो जो राहों की दुर्गमता या फिर झोला छाप चिकित्सकों की वजह से दम तोड़ दे रहे हैं। गौरतलब है कि बिहार में इन्सेफेलाइटिस की वजह से हर साल सैकड़ों जाने जाती है। पिछले साल यहाँ पर १५० बच्चों की मौत इन्सेफेलाइटिस से हुई थी। बिहार के स्वास्थय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे मौत के इन मामलों को इन्सेफेलाइटिस कहे जाने पर साफ़ इनकार करते हुए  कहते हैं जब तक जांच नहीं हो जाती हम कुछ भी नहीं कह सकते।

जब हम आपको यह जानकारी दे रहे हैं तब हमें जो जानकारी उपलब्ध है उसके मुताबिक समूचे बिहार के अलग-अलग अस्पतालों में तक़रीबन २०८ बच्चे जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे। इस बीमारी से सर्वाधिक ४० मौतें मुजफ्फरपुर जिले में हुई है, वहीँ गया में ११ बच्चे अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं लेकिन सरकार द्वारा अब तक इसे बचाव और गाँवों तक इलाज पहुंचाने को लेकर कुछ भी नहीं किया गया है। सरकार कह रही है कि दोनों जिलों में इस बीमारी को देखते हुए विशेष कार्य योजना बनाई जा रही है। बीमारी के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए सभी गांवों में पर्चियां बांटी जा रही हैं और प्रचार अभियान चलाया जा रहा है, जबकि हकीकत ये है कि  ज्यादातर गाँवों में दवा का भी छिडकाव नहीं हुआ है न तो प्रशिक्षित चिकित्सक जाने को तैयार हैं। पटना मेडिकल कालेज की डॉ सुजाता चौधरी बताती है कि हमारे यहाँ १०० से ज्यादा बच्चों की भरती हुई है जिनमे से ३४ को हम बचा नहीं पाए हैं। वो बताती है कि ज्यादातर बच्चों में इन्सेफेलाइटिस के लक्षण हैं लेकिन हम इस रोग में इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं को देने के बावजूद उन्हें बचा नहीं पा रहे हैं।

अजीबोगरीब है कि पिछले साल जब अक्तुबर माह में बच्चों की में ताबड-तोड़ मौतें होने लगी तो विश्व स्वास्थय संगठन, नेशनल इंस्टीट्युट आफ वायरोलाजी और केंद्र सरकार की एक भारी-भरकम टीम ने प्रभावित इलाकों में जाकार जबरदस्त जांच-अनुसंधान किया, लेकिन वो रिपोर्ट को अब तक अंतिम रूप नहीं दे पायी। एनआईवी ने जो प्रारंभिक रिपोर्ट भेजी है, उसमें साफ लिखा है, अज्ञात बीमारी की चपेट में आनेवाले ज्यादातर वह बच्चे थे, जिन्होंने जैपनीज इंसेफ्लाइटिस (जेइ) का टीका लिया था। टीम ने 116 बच्चों की जांच के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। इस बार भी पीड़ित होने वाले कई बच्चे जेई का टीका ले चुके हैं। हालांकि बीमारी के कारणों का पता नहीं चल सका है। टीम ने भी इस बाबत शोध की आवश्यकता जताई है। टीम ने अपने अध्ययन रिपोर्ट में कहा है, अज्ञात बीमारी दरअसल एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम है। गंदगी वाले इलाके में यह बीमारी का प्रकोप ज्यादा है, लेकिन यह इंसेफ्लाइटिस नहीं है। जांच में इंसेफ्लाइटिस के वायरस बेस्टनाइल, नीपा व चांदपुरा वायरस नहीं मिले हैं। टीम ने यह भी कहा कि यह सेलिब्रल मलेरिया नहीं है। जिन बच्चों की जांच की गयी, उनमें  ज्यादातर दो से छह साल के बीच के है। इसके अलावा इनमें जो कॉमन बातें पायी गयीं, उनमें 70 फीसदी बच्चों का घर गांव के किनारे है। इनके घर के पास खेत या बगीचा है। यह सुबह चार से आठ बजे के बीच पीड़ित हुये। टीम को एक प्रश्न का संतोषजनक जवाब नहीं मिल पाया कि पीड़ित बच्चों के बीमारी होने के कितने समय पहले लीची खायी थी?

अजीबोगरीब ये भी है कि मौत के सभी आंकड़े बिहार के ग्रामीण इलाकों से है। मौत का एक भी मामला शहरी इलाकों से नहीं आया है। गया के अनुग्रह नारायण मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एएनएमसीएच) के शिशु रोग विशेषज्ञों ने कहा हैं कि इस बीमारी से पीड़ित अधिकांश बच्चे गांवों के हैं, जो गंदगी, गरमी और गरीबी के कारण इस बीमारी से ग्रस्त हो रहे हैं। कई दिनों तक वे इधर-उधर इलाज कराते हैं और जब स्थिति बिगड़ जाती है तो वे बड़े अस्पतालों में आ रहे हैं। अंतिम समय में मरीजों को बचा पाना मुश्किल हो रहा है। इस अज्ञात बीमारी का इलाज करने में चिकित्सक भी लाचार नजर आ रहे हैं| वहीँ ग्रामीणों का निजी अस्पतालों तक पहुँच पाना संभव नहीं हो पा रहा। बच्चों की मौत से बिहार में वैसी छटपटाहट तो नहीं दिख रही है लेकिन मधेपुरा जैसी जगहों पर छुटपुट विरोध करके यह मांग जरूर की जा रही है जो भी सरकार तत्काल ऐसे उपाय करे ताकि मासूमों की मौत रुक सके।

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