BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, October 17, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख अखिलेश के कंधों पर सवार रामगोपाल यादव मुलायम से पुराने हिसाब चुकता करेंगे ?

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हम सिर्फ ट्रंप को देख रहे हैं और मैडम हिलेरी को कतई नहीं देख रहे हैं। हम यह भी नहीं देख रहे हैं कि अमेरिका परमाणु युद्ध की तैयारी में है और भारत उनके लिए सिर्फ बाजार है।इस बाजार पर कब्जे के लिए वह कुछ भी करेगा। मुश्किल है कि हमारी राजनीति जितनी अंध है ,उससे कुछ कम हमारी राजनय नहीं है।हम दुनिया को अमेरिकी नजर से देख रहे हैं और हमारी कोई दृष्टि है ही नहीं।हमें अमेरिकी कारपोरेट हितों की �


हम सिर्फ ट्रंप को देख रहे हैं और मैडम हिलेरी को कतई नहीं देख रहे हैं।

हम यह भी नहीं देख रहे हैं कि अमेरिका परमाणु युद्ध की तैयारी में है और भारत उनके लिए सिर्फ बाजार है।इस बाजार पर कब्जे के लिए वह कुछ भी करेगा।

मुश्किल है कि हमारी राजनीति जितनी अंध है ,उससे कुछ कम हमारी राजनय नहीं है।हम दुनिया को अमेरिकी नजर से देख रहे हैं और हमारी कोई दृष्टि है ही नहीं।हमें अमेरिकी कारपोरेट हितों की ज्यादा चिंता है,भारत या भारतीय जनता के हितों की हमें कोई परवाह नहीं है।

हम यमन पर अमेरिकी हमले पर चुप्पी साधे बैठे हैं तो दूसरी तरफ अमेरिकी ने परमाणु विश्वयुद्ध की तैयारी कर ली है और हम इसके लिए अभी से रूस और चीन को जिम्मेदार ठहराने लगे हैं और फूलकर कुप्पा हैं कि हो न हो,ट्रंप राष्ट्रपित बन जायेंगे और इस्लाम का नमोनिशां मिट जायेगा कि ट्रंप भी हिंदू हो गये हैं।

पलाश विश्वास

किसी कारपोरेट कंपनी का सीईओ चाहे कोई हो,उस कंपनी के कारोबारी हित जैसे नहीं बदलते ,वैसे ही उसकी नीतियों में कोई परिवर्तन नही होता।मौजूदा विश्वव्यवस्था कारपोरेट कंपनी जैसी है और उसका सर्वेसर्वा मुखिया अमेरिकी साम्राज्यवाद शत प्रतिशत कारपोरेट है।कारपोरेट हितों के लिए दोस्ती दुश्मनी नहीं,मुनाफासूली सर्वोच्च प्राथमिकता होती है जिसके लिए कारपोरेट कंपनी वह कुछ भी कर सकती है।अमेरिकी राष्ट्र का कोरपोरेट चरित्र न भारत के हित में है और न मनुष्यता के हित में है।हम यमन पर अमेरिकी हमले पर चुप्पी साधे बैठे हैं तो दूसरी तरफ अमेरिकी ने परमाणु विश्वयुद्ध की तैयारी कर ली है और हम इसके लिए अभी से रूस और चीन को जिम्मेदार ठहराने लगे हैं और फूलकर कुप्पा हैं कि हो न हो,ट्रंप राष्ट्रपित बन जायेगें और इस्लाम का नमोनिशां मिट जायेगा कि ट्रंप भी हिंदू है।

हम सिर्फ ट्रंप को देख रहे हैं और मैडम हिलेरी को कतई नहीं देख रहे हैं।

हम यह भी नहीं देख रहे हैं कि अमेरिका परमाणु युद्ध की तैयारी में है और भारत उनके लिए सिर्फ बाजार है।इस बाजार पर कब्जे के लिए वह कुछ भी करेगा।

मुश्किल है कि हमारी राजनीति जितनी अंध है ,उससे कुछ कम हमारी राजनय नहीं है।हम दुनिया को अमेरिकी नजर से देख रहे हैं और हमारी कोई दृष्टि है ही नहीं।हमें अमेरिकी कारपोरेट हितों की ज्यादा चिंता है,भारत या भारतीय जनता के हितों की हमें कोई परवाह नहीं है।

ताजा खबर यह है कि पश्चिम के देश भी सीरिया मुद्दे पर अमेरिका के साथ हैं। वे लगातार सीरिया में रुस की भूमिका की आलोचना कर रहे हैं। हाल ही में पुतिन फ्रांस जाने वाले थे लेकिन उन्होने दौरा रद्द कर दिया क्योंकि फ्रांस के राष्ट्रपति ने रुस पर यह आरोप लगाया था कि रुस सीरिया में युद्द अपराधों में शामिल है।

इन्ही जटिल युद्ध परिस्थितियों में मजा यह है कि जैसे भारत में हिंदुत्व खेमा ट्रंप को राष्ट्रपति देखने के लिए बेताब है वैसे ही रूसी दक्षिणपंथी भी ट्रंप के दीवाने हैं। अमेरिकी डोनाल्ड ट्रंप को वोट दें या फिर परमाणु युद्ध के लिए तैयार रहें। यह कहना है रूस में व्लादिमीर पुतिन के दक्षिणपंथी सहयोगी व्लादिमीर झिरीनोवस्की का। उनके अनुसार ट्रंप अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो रूस और अमेरिका के बीच का तनाव कम कर सकते हैं। जबकि उनकी डेमोक्रेटिक प्रतिद्वंद्वी हिलेरी क्लिंटन दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध में झोंक देंगी।

गौरतलब है कि झिरीनोवस्की की लिबरेशन डेमोक्रेटिक पार्टी सितंबर में हुए रूस के संसदीय चुनाव में तीसरे स्थान पर आई थी। बहुत से रूसी झिरीनोवस्की को गंभीरता से नहीं लेते।इन्हीं झिरीनोवस्की के हवाले से पुतिन को परमाणु युद्ध के लिए मोर्चाबंद दिखाने की कोशिश रतभअमेरिका के साथ सात भारत में भी हो रही है लेकिन अमेरिका के यमन पर हमले और सीरिया में आतंकवादी संगठनों के अमेरिकी और इजराइली मदद और मध्यएशिया के तेल कुँओं पर उनके कब्जे पर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

खाड़ी युद्ध के बुश पिता पुत्र,वियतनाम युद्ध के रिचर्ड निक्सन,क्यूबा के खिलाफ बिल क्लिंटन और मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा में बुनियादी फर्क कुछ भी नहीं है चूंकि अमेरिका पूरी तरह एक कारपोरेट राष्ट्र है।अमेरिकी अर्थव्यवस्था कारपोरेट है तो यह मुक्तबाजार भी कारपोरेट है।

इसलिए चाहे डोनाल्ड ट्रंप जीते या फिर मैडम हिलेरी,युद्ध और गृहयुद्ध का अमेरिकी कारोबार बंद नहीं होने जा रहा है।

नस्ली और स्त्रीविरोधी बयानों और ग्लोबल हिंदुत्व के समर्थन के मुद्दों को किनारे पर रखें तो यह समझना शायद आसान हो सकता है कि तमाम सबूत चीख चीखकर बता रहे हैं कि दुनियाभर के आतंकवादी संगठनों को अमेरिकी मदद के पीछे मैडम हिलेरी का प्रत्यक्ष हाथ हैं और वे इजराइल और अमेरिकी जायनी कारपोरेट सत्ता वर्ग के ट्रंप से कहीं ज्यादा मजबूत प्रतिनिधि हैं।

हम भारत में फासिज्म के राजकाज को डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन,ग्लोबल हिंदुत्व के साथ उनके संबंध और मुसलमानों और आप्रवासियों,शरणार्थियों के खिलाफ उनकी नस्ली घृणा के मद्देनजर मैडम हिलेरी का असली चेहरा देखने से परहेज करें तो यह भारी गलती होगी।क्योंकि मैडम हिलेरी का नजरिया ट्रंप से कतई अलग नहीं है,जो दरअसल अमेरिकी कारपोरेट विश्वव्यवस्था का जायनी रंगभेदी नजरिया है।

जैसा कि इन दिनों यह धारणा सुनामी की तरह फैलायी जा रही है कि पाकिस्तान को रुस और चीन से भारत के खिलाफ युद्ध में मदद मिलने वाली है और युद्ध हो या आतंकवाद के खिलाफ युद्ध हो,अब अमेरिका भारत के साथ रहेगा।इसके विपरीत हकीकत की जमीन पर कूटनीतिक बयानों के अलावा भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के बाद अश्वेत राष्ट्रपति बाराक ओबामा के लगातार  दो दो कार्यकाल में अमेरिका ने पाकिस्तान के खिलाफ भारत के हक में अब तक कोई कार्रवाई लेकिन नहीं की है।

हिंदुत्व के झंडेवरदार अगर समझते हों कि डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बन जाने के बाद मुसलमानों के खिलाफ अमेरिका बाकायदा धर्मयुद्ध छेड़ देगा और पाकिस्तान को मटियामेट कर देगा,यह ख्याली पुलाव के अलावा कुछ और नहीं है।

भारत में वोट बैंक समीकरण साधने के लिए जैसे हिंदुत्व का एजंडा है वैसे ही अमेरिका का प्रेसीडेंट बनने के लिए रंगभेदी श्वेत वर्चस्व डोनाल्ड ट्रंप का कारपोरेट एजंडा है और वे अरबपति हैं तो कारपोरेट समर्थन के लिए मैडम हिलेरी के जायनी लिंक और उनको इजराइली समर्थन के मद्देनजर मुसलमानविरोधी तेवर अपनाना उनका अपना चुनावी समीकरण है ,जो शायद बुरीतरह फेल हो सकता है क्योंकि अमेरिकी मीडिया मैडम हिलेरी के पक्ष में हैं और वे ट्रंप की धज्जियां बिखेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।जैसे उग्र हिंदुत्व के बिना भारतीय राजनीति की अब कल्पना नहीं की जा सकती ,वैसे ही उग्र इस्लाम विरोध अब अमेरिकी चुनावी समीकरण है।

अपने देशी मीडिया के युद्धोन्माद और कारपोरेट हितों के जलवे को देखते हुए खाड़ी युद्ध में विश्व जनमत बदलने के अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया की भूमिका के मद्देनजर गौर करने वाली बात यह है कि ट्रंप और मैडम हिलेरी की नूरा कुस्ती की आड़ में अमेरिका ने तीसरे विश्वयुद्ध और परमाणु युद्ध की पूरी तैयारी कर ली है और पश्चिमी मीडिया इसके लिए सीरिया संकट के बहाने रूस और चीन को जिम्मेदार ठहराने की मुहिम उसीत रह  शुरु कर दी है जैसे तेलयुद्ध के लिए सद्दाम हुसैन को महिषासुर बना कर उनका वध कर दिया गया।

जाहिर है कि हम ट्रंप पर जरुरत से ज्यादा चर्चा कर रहे हैं और काफी हद तक धर्मनिरपेक्षता के तहत मैडम हिलेरी का समर्थन करने लगे हैं।जबकि दोनों में से किसी के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने से भारत को कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है।दोनों मनुष्यता के खिलाफ युद्ध अपराधी हैं।विडंबना यह है कि हमारे यहां लोग अभी अभी जो अमेरिकी नौसेना ने यमन पर हमला कर दिया है ,उसे पाकिस्तान में आतंकवादी अड्डों को तहस नहस करने की कथित सर्जिकल स्ट्राइक की तरह जायज मानकर अमेरिकी कार्रवाई के तहत इसे भी जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।

गौरतलब है कि अमरीकी सेना ने यमन में तीन रडार ठिकानों पर हमला किया है। इस हमले से पहले अमरीकी नौसेना के युद्धपोत पर यमन की तरफ से एक मिसाइल दाग़ी गई है। अमरीकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन के मुताबिक़ मिसाइल हमले में शामिल तीन रडार ठिकानों को तबाह कर दिया गया है। पेंटागन का कहना है कि ये ठिकाने ईरान समर्थक हूथी विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इलाक़े में थे। पेंटागन का ये भी कहना है कि राष्ट्रपति ओबामा ने इन हमलों के लिए मंज़ूरी दी थी.अमेरिका के एक अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से स्वीकृति मिलने के बाद यूएसएस विध्वंसक द्वारा दागे गए टॉमहॉक क्रूज मिसाइल से यमन के लाल सागर तट पर हुथी के नियंत्रण वाले क्षेत्र में हमला किया गया।वहीं यूएस नेवी के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर जानकारी दी है कि यूएस नेवी के डेस्‍ट्रॉयर नीट्ज ने गुरुवार को सुबह करीब चार बजे टॉकहॉक क्रूज मिसाइल यमन पर दागी है। इस अधिकारी के मुताबिक लाल सागर पर जब अमेरिकी शिप पर हमला हुआ तो यह रडार सक्रिय थे और तभीहमले की असफल कोशिश की गई। इस अधिकारी के मुताबिक जिन जगहों पर हमले हो रहे हैं वहां पर आबादी नहीं है। ऐसे में जानमाल का कोई नुकसान नहीं हुआ है।

इधर भारतीय मीडिया में भी रूस के आक्रामक रवैये की वजह से परमाणु युद्ध और तीसरे विश्वयुद्ध के हालात पर अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया की तर्ज पर प्रचार अभियान शुरु हो गया जैसे तेल युद्ध के दौरान,अफगानिस्तान को रौंदने के दौरान और मध्यपूर्व एशिया और अफ्रीका के देशों में अमेरिकी लोकतंत्र के अरब वसंत के पक्ष में भारतीय मीडिया अमेरिकी कारपोरेट हितों के तहत अमेरिकी मीडिया को भोंपू बना हुआ था।

अमेरिका ने इस बीच अपने नागरिको को सीरिया संकट संभावित परमाणु युद्ध के लिए आगाह कर दिया है लेकिन भारतीय मीडिया ने रूस की इसी तरह की चेतावनी के मद्देनजर ऐसे किसी परमाणु युद्ध या तीसरे विश्वयुद्ध से पहले ही उसके लिए रूस के राष्ट्रपति को सद्दाम हुसैन बनाना शुरु कर दिया है।

भारतीय मीडिया में अमेरिकी स्वर है।मसलन सीरिया संकट पर रूस और अमेरिका के बीच का तनाव विश्व युद्ध में बदल सकता है। रूस की मिलिटरी तैयारियां साफ तौर पर इसके भयावह संकेत दे रही हैं। पुतिन काफी आक्रामक फैसले लेते दिख रहे हैं। सूत्रों के हवाले से अभी खबर आई कि पुतिन ने रूस के उच्च अधिकारियों, राजनेताओं और उनके परिवार को घर (होमलैंड) लौटने को कहा है। इसी क्रम में रूस ने बुधवार को अंतरमहाद्वीपीय बलिस्टिक मिसाइलों का भी परीक्षण किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस की सेना ने जापान के उत्तर में तैनात अपनी सबमरीन से न्यूक्लियर वॉरहेड ढोने की क्षमता वाले एक रॉकेट का परीक्षण किया है।

भारत अमेरिका परमाणु संधि के परमाणु हथियारों के साथ साथ भारतीय रक्षा,प्रतिरक्षा और आंतरिक सुरक्षा अमेरिका के हवाले हो जाने की वजह से,आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के युद्ध में भारत के पार्टनर बन जाने से अमेरिका के भारत विरोधी रवैये में कोई बुनियादी फर्क आया हो या बांग्लादेश युद्ध के वक्त हिंद महासागर में सातवां नौसैनिक बे़ड़ा भेजने वाला अमेरिका सोवियत संघ की तरह भारत का मित्र हो गया हो,यह वैसा ही मिथक है जैसे हम यह मानते हैं कि हमारे कल्कि अवतार का दीवाने खास अमेरिका का व्हाइट हाउस है।उसी तरह ट्रंप का हिंदुत्व दावा भी वोट बैंक साधने का उपक्रम है।ट्रंप भी उसीतरह मोदी के दोस्त हैं,जैसे ओबामा रहे हैं।

गौरतलब है कि अमेरिका के कई हिंदू संगठनों ने राष्ट्रपति पद के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन किया है। ट्रंप ने भी कहा है कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो भारत और अमेरिका के संबंध बेहद मजबूत होंगे। ट्रंप को समर्थन देने के लिए रिपब्लिकन हिंदू कोएलिशन की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें करीब पांच हजार लोगों ने ट्रंप की जम कर तारीफ की। इस कार्यक्रम में ट्रंप के अलावा बॉलीवुड की हस्तियों के साथ पांच हजार से ज्यादा भारतीय मूल के अमेरिकी शामिल हुए।

इस मौके पर  रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह भारतीयों और हिन्दुओं का बेहद सम्मान करते हैं। उन्होंने यह बात कही। एनडीटीवी को दिए गए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, 'मैं हिन्दुओं का बेहद सम्मान करता हूं, वे शानदार उद्यमी होते हैं... भारत का मैं बेहद सम्मान करता हूं'। आतंकवाद से निपटने की अपनी नीति को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा- हम चरम परीक्षण करके आतंकवाद से लड़ेंगे. (मुस्लिम जगत में) कुछ ऐसा चल रहा है जो सकारात्मक ताकत नहीं है।

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि राष्ट्रपति चुने गए तो वे भारत को अमेरिका को बेस्ट फ्रेंड बनाएंगे। ट्रंप की नजर यह दोस्ती दोनों देशों के लिए जरूरी है। वे हिंदूओं को बहुत मानते हैं! यदि वे राष्ट्रपति बन गए, व्हाइट हाउस पहुंच गए तो वह हिंदु समुदाय का अपना राष्ट्रपति होगा। भारत और अमेरिका के रिश्ते प्रगाढ़ होंगे। दोनों देश 'सबसे अच्छे दोस्त' होंगे। यह सब कहते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि यदि वे राष्ट्रपति बने तो नरेंद्र मोदी से उनकी खूब पटेगी। उनके राष्ट्रपति चुने जाने का अर्थ होगा कि व्हाइट हाउस में भारतीय और हिंदू समुदाय का सच्चा दोस्त है।

न्यू जर्सी में आतंकवाद से पीड़ित हिंदुओं के लिए हो रहे एक चैरिटी समारोह में ट्रंप पीड़ित, उनके परिवार और अन्य भारतीयों से मुलाकात के लिए पहुंचे। रिपब्लिकन हिंदू कोलिशन यानी RHC नाम के संगठन ने अपने इस कार्यक्रम में खासतौर पर डॉनल्ड ट्रंप को बुलाया था। ट्रंप इस मौके पर भारत की संस्कृति के रंग में रंगे दिखे. ट्रंप ने दीप जलाकर कार्यक्रम की शुरुआत की और जमकर हिंदू प्रेम भी दिखाया। चैरिटी समारोह में ट्रंप पीड़ित, उनके परिवार और अन्य भारतीयों से मुलाकात के लिए पहुंचे. रिपब्लिकन हिंदू कोलिशन यानी RHC नाम के संगठन ने अपने इस कार्यक्रम में खासतौर पर डॉनल्ड ट्रंप को बुलाया था।

ट्रंप ने कहा, 'मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ काम करने का इंतजार कर रहा हूं। वह अर्थव्यवस्था और नौकरशाही को सुधारने में बेहद ऊर्जावान रहे हैं। शानदार व्यक्ति। मैं उनकी सराहना करता हूं।' यह पहली बार था जब ट्रंप ने इस चुनावी मौसम में भारतीय-अमेरिकियों के समारोह में शिरकत की। उन्होंने (मोदी) ने भारत में टैक्स प्रणाली को आसान किया है। भारत आज तेजी से विकास कर रहा है। यह बहुत अच्छा है, लेकिन हम यहां अमेरिका में विकास नहीं कर रहे हैं।

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Sunday, October 16, 2016

ताराचंद्र त्रिपाठी:इसी खंडदृष्टि के कारणऔर बहुलांश में जातीय या राष्ट्रीय अहंकार के कारण भी हम मानव इतिहास के उस मानव-महासागरीय स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाते हैं, जो वास्तविक है. इस मानव-महासागर में किस सांस्कृतिक चेतना की लहर कहाँ उपजी और कहाँ तक पहुँच गयी, पूर्वग्रहों से मुक्त हुए बिना इस रहस्य को समझना सम्भव नहीं है.


ताराचंद्र त्रिपाठी

इतिहास के बारे में जब भी हम बात करते हैं तो प्राय: हमारी दृष्टि किसी कालखंड और किसी क्षेत्र-विशेष तक ही सीमित होती है. हम यह भूल जाते हैं कि कोई भी इयत्ता केवल अपने आप में ही पूर्ण नहीं होती, अपितु वह अनेक इयत्ताओं के संयोग और सहयोग से निर्मित होती है. उदाहरण के लिए सिन्धुघाटी सभ्यता को ही लें, हमारी दृष्टि केवल उस नगर तक सीमित रह जाती है. हम यह भूल जाते हैं कि नागर सभ्यता सभ्यता का विकास तभी सम्भव होता है, जब उस की आधारभूत कृषि और पशुपालन परक ग्रामीण सभ्यता भी फल-फूल रही होती है. और यह सभ्यता नागर सभ्यता के ध्वस्त होने के साथ ध्वस्त नहीं होती, केवल संक्रमित होती है. संक्रमणशील जन जिस नये क्षेत्र में में बसते हैं, उन क्षेत्रों में अपने पुराने क्षेत्र के स्थान नामों, अपनी धार्मिक आस्थाओं के प्रतीकों को पुनर्स्थापित करते हैं. और इस प्रकार सांस्कृतिक नैरन्तर्य बना रहता है. पर अपनी खंड दृष्टि के कारण हम इस सांस्कृतिक नैरन्तर्य का अवगाहन नहीं कर पाते. 
इसी खंडदृष्टि के कारणऔर बहुलांश में जातीय या राष्ट्रीय अहंकार के कारण भी हम मानव इतिहास के उस मानव-महासागरीय स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाते हैं, जो वास्तविक है. इस मानव-महासागर में किस सांस्कृतिक चेतना की लहर कहाँ उपजी और कहाँ तक पहुँच गयी, पूर्वग्रहों से मुक्त हुए बिना इस रहस्य को समझना सम्भव नहीं है.
जिस महाप्रलय की बात हम करते हैं, जिसके अवशेष ब्रिटिश पुरातत्वविद जार्ज वुली ने मसोपोटासमिया में खोज निकाले हैं वह आज से लगभग ५ हजार साल पहले मेसोपोटामिया में आयी एक सुनामी थी. इस जलप्रलय पहला विशद वर्णन आ्ज से लगभग पाँच हजार साल पहले के गिलगिमेश नामक सुमेरियन महाकाव्य में हुआ है. (यह महाकाव्य भी असुर बनीपाल (८०० ई.पू) के ईंटों की पट्टियों पर नुकीली कीलों से अंकित अभिलेखों के संग्रहालय, जिसे असुर बनीपाल का पुस्तकालय भी कहा जाता है, से प्राप्त हुआ.) सुनामी तो आयी मेसोपोटामिया में, यादें अनेक एशिया महाद्वीप के अनेक क्षेत्रों की प्रजातियों के आख्यानों में अलग-अलग नामों से व्याप्त हो गयीं, कहीं वैवस्वत मनु नायक हो गये, तो कहीं हजरत नूह, और कहीं नोवा, कहीं जियसद्दू, कहीं कोई और. पर कथा वही रही
यही नहीं, यह धारणा भी बनी रही कि इस प्रलय से पहले जो देव सभ्यता थी, उसमें लोग हजारों साल तक जीवित रहते थे. गिलगिमेश में भी सुमेर के जिन पौराणिक राजाओं का उल्लेख है, उनमें कोई राजा २८ हजार साल राज्य करता है तो कोई ४३ हजार साल, हजार साल से कम की तो बात ही नहीं है. अपने पुराणों में भी देख लीजिये, हमारे राजा दशरथ को भी सन्तान न होने की चिन्ता तब सताती है, जब उनकी अवस्था साठ हजार साल हो जाती है. राम ग्यारह हजार साल राज्य करते हैं. १० हजार साल अपने हिस्से के और एक हजार साल राजा दशरथ की अकाल मृत्यु हो जाने से उनके बचे हुए. राजा सागर के साथ हजार पुत्र होते हैं, शिव चौरासी हजार साल तक तपस्या करते हैं. और तो और दान में दी गयी भूमि को छीनने वाला भी साथ हजार साल तक अपनी ही विष्टा में कीड़े रूप में रहने के लिए अभिशप्त होता है. 
एक और बात, जो मानव महासागरीय लहरों को प्रमाणित करती है वह स्त्री पात्रों के संवादों के लिए मुख्य भाषा से इतर किसी जन बोली का विधान. यह संस्कृत नाटकों में ही नहीं है अपितु उन से लगभग २ हजार साल पहले के सुमेरी महाकाव्य गिलगिमेश में भी स्त्री पात्र ही नहीं अपितु देवी इनाना के संवादों के लिए भी जनभाषा का ही प्रयोग हुआ है. यही नैरन्तर्य और सारूप्य पौराणिक आख्यानों, मिथकों में ही नहीं है प्रतीकों या मोटि्फ्स में भी परिलक्षित होता है.
एक भ्रान्ति, जो सम्भवत: वेदों की श्रुति परम्परा के कारण उत्पन्न हुई है, वह यह कि वैदिक आर्य लेखन कला से अनभिज्ञ थे. वेद तो गेय छ्न्द हैं. उनको मूल गेय रूप में बनाये रखना, एक बड़ी भारी चुनौती रही होगी. फलत: इन गेय छ्न्दों को न केवल श्रुति परंपरा से संरक्षित किया गया अपितु हस्त संचालन( उच्चै उदात्त, निच्चै अनुदात्त, समाहार: स्वरित:) के माध्यम से उनकी स्वरलिपि भी तैयार कर दी गयी है. यह भी ज्ञातव्य है कि विद्वानों के अनुसार वेदों का संकलन जितने प्रामाणिक और व्यवस्थित रूप से किया गया है, , उसकी दूसरी मिसाल विश्वसाहित्य में नहीं है.
गेय छ्न्द तो श्रुति परम्परा से चले, लेकिन टीकाओं के लिए तो लिपि आवश्यक रही होगी. और वह थी. लेकिन उसका माध्यम अधिक टिकाऊ नहीं था. ताड़्पत्र और भोजपत्र पर अंकित होने के कारण बार बार प्रतिलिप्यांकन अपरिहार्य था. यवन आक्रमण के बाद हमने माध्यम बदला और शिलाओं को माध्यम के रूप में प्रयोग करना आरंभ किया और तब से लिपि का क्रमिक विकास सामने आया. जब कि वैदिक आर्यों से बहुत पहले मिस्र में शिलाओं को और मेसोपोटामिया में ईंट की पट्टिकाओं पर अक्षर उत्की्र्ण करने के उपरान्त उन्हें पका कर स्थायित्व प्रदान किया गया था.
जहाँ तक ऐतिहासिक स्रोतों की दुर्लभता का सवाल है, उसमें भी हमारा दृष्टिदोष एक कारक है. लिखित साक्ष्य नहीं हैं, लोक गाथाएँ पूरा चित्र प्रस्तुत नहीं करतीं, किंवदन्तियाँ बहुत दूर के अतीत का उद्घाटन नहीं करतीं. कालजयी पुरातत्व भी सीमित है. पर जो सन्मुख है, जो अतीत की अनेक परतों पर जमी धूल को दूर कर सकता है, उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है, वह हैं हमारे स्थान-नाम.
पर उनका संकलन कौन करे. एक गाँव में और उसके आस-पास ही पचासों स्थान-नाम हैं. स्थान- नाम या स्थान को पहचानने के लिए निर्धारित कोई प्रमुख प्रतीक या लैंड्मार्क. ये लैंड्मार्क भी किसी स्थायी आधार या याद पर ही तो रखे गये होंगे. और इन आधारों के द्वारा स्थानों का नामकरण करने वाले पूर्वजों ने अपनी प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक स्थिति की यादों को चिरस्थायी बनाने का प्रयास किया है. जब अंग्रेज अपने साथ के साथ यूरोप के शताधिक नामों को आपके नैनीताल में बसा गये हैं, तो जो लोग सिन्धु सभ्यता के नाश के बाद छितराये होंगे, तो क्या उन्होंने अपने नये सन्निवेशों के नामों में अपनी पुरानी यादों को नहीं संजोया होगा?

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यह अभूतपूर्व धर्म संकट क्यों है? क्योंकि मनुष्यता और प्रकृति के विध्वंस का मुक्तबाजार हमने चुना है! आस्था और धर्म कर्म की सांस्कृतिक जड़ें खत्म करके हम अपराधकर्म में तब्दील कर रहे हैं धर्म को? सौ सालों के आर पार मनुष्यता के लोकसंगीत की पूरब पश्चिम धाराओं को एकाकार कर देने के पीछे विशुध भारतीय बाउल आंदोलन और लालन फकीर का दर्शन है जो संत कबीर का दर्शन,संत रविदास की दृष्टि और तथागत गौ

यह अभूतपूर्व धर्म संकट क्यों है?

क्योंकि मनुष्यता और प्रकृति के विध्वंस का मुक्तबाजार हमने चुना है!

आस्था और धर्म कर्म की सांस्कृतिक जड़ें खत्म करके हम अपराधकर्म में तब्दील कर रहे हैं धर्म को?

सौ सालों के आर पार मनुष्यता के लोकसंगीत की पूरब पश्चिम धाराओं को एकाकार कर देने के पीछे विशुध भारतीय बाउल आंदोलन और लालन फकीर का दर्शन है जो संत कबीर का दर्शन,संत रविदास की दृष्टि और तथागत गौतम बुद्ध का धम्म भी है और इसका सबूत फिर गीतांजलि के कवि का लिखा गीति नाट्य चंडालिका है,जहां बुद्धं शरणं गच्छामि के साथ बहुजन जीवन यंत्रणा जितनी है,उससे कहीं अधिक भारत की दार्शनिक विरासत का समन्वय की विविधता और बहुलता है।

पलाश विश्वास

हमारा धर्म कितना कमजोर है जो महज असहमति या आलोचना से लहूलुहान हो जाता है?

हमारी आस्था कितनी निराधार है कि हम दूसरों की आस्था से अपने को असुरक्षित मानते हैं?

हमारी आस्था कितनी असहाय है कि नास्तिकता की चुनौती के सामने वह आत्मरक्षा के लिए गिरोहबंद अपराधकर्म में बदल जाती है?

आस्था और धर्म कर्म की सांस्कृतिक जड़ें खत्म करके हम अपराधकर्म में त्बील कर रहे हैं धर्म को?

मनुष्यता और प्रकृति को तिलांजलि देकर मुक्तबाजार का नरसंहार ही अब धर्म कर्म है,इसीलिए यह अभूतपूर्व हिंसा,युद्ध, गृहयुद्ध और फासिज्म का राजकाज है।

भारतीय उपमहादेश में धर्म कर्म का बुनियादी आधार मनुष्यता और प्रकृति दोनों है।सिंधु सभ्यता,वैदिकी साहित्य,बौद्धमय भारत,जैन धर्म,सिख धर्म से लेकर अठारवीं सदी के नवजागरण समय के ब्रह्म समाज और मतुआ आंदोलन में कर्मकांड के कारोबार,पुरोहित तंत्र और पाखंड के बदले मनुष्यता और प्रकृति को सभी स्तरों पर सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है।

भारतीय संत परंपरा में संत कबीर, सूरदास,रसखान से लेकर संत रैदास, चंडीदास और लालन फकीर के जाति धर्म के बजाय उनकी मनुष्यता का दर्शन ही सिंधु सभ्यता,वैदिकी साहित्य,बौद्ध धम्म,जैन अहिंसा,गुरुग्रंथ साहेब की गौरवशाली परंपरा है।

भारत में उपासना पद्धति और धर्मस्थलों तक धर्म सीमाबद्ध कभी नहीं रहा है।हमारे महाकाव्यों में धर्म की व्याख्या भी मनुष्यता के शाश्वत मूल्यों पर आधारित है।जिस श्रीकृष्ण ने गीता के उपदेश दिये,वह जन्म से आर्य नहीं हैं।उनके मामा और दूसरे परिजन असुर हैं तो वे पले बढ़े ग्वालों के साथ,जो न ब्राह्मण हैं और न क्षत्रिय। आज की भाषा में कहें तो श्रीकृष्ण ओबीसी हैं।इसी तरह हिंदुओं के आदि देव महादेव अनार्य हैं तो चंडी ते तमाम रुपों में आर्य अनार्य मिलाप है।काली कामाख्या अनार्य हैं।

विज्ञान और जीव विज्ञान में जड़ और जीवित प्राणियों में भेद स्पष्ट हैं।जीवित सभी प्राणियों के जैविकी जीवन से मनुष्य का जीवन चक्र अलहदा नहीं है।बहुत पहले भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने अपने प्रयोगों से साबित किया है कि वनस्पति भी उतने ही संवेदनशील हैं,जितने कि मनुष्य।बौद्ध धर्म और जैन धर्म में सभी जीवों के प्रति अहिंसा का अनुशीलन है।सभी जीवों और वनस्पतियों की अपनी भाषा होती हैं और उनकी इंद्रियां भी उनके जीवन चक्र को नियंत्रित करती है।

भारतीय दर्शन परंपरा के मुताबिक इस जैविकी जीवन के इंद्रिय नियंत्रित जीवन चक्र से मुक्त विवेक और प्रज्ञा के लक्ष्य ही धर्म कर्म के बुनियादी सिद्धांत रहे हैं। बायोलाजिकल के बजाय भारत में जो स्पीरिच्युअल लाइफ की बात की जाती है,वही भारतीय आध्यात्म है लेकिन वह धर्म कर्म का पुरोहित तंत्र कतई नहीं है।बल्कि पुरोहित तंत्र के अनुशासन या मनुस्मृति के दायरे से बाहर बहुसंख्य आम जनता का आध्यात्म और विविध बहुल धर्म कर्म रीति रिवाज पर्व त्योहार हमारा साझा लोकसंंसार है, लोकभाषाएं, बोलियां और लोकसंस्कृति के विविध रुप हैं।

यह भारतीय लोकसंसार का आध्यात्म जैविकी भोग और विलास के इद्रिय नियंत्रित जैविकी जीवन से मुक्ति के लिए ही धर्म कर्म आस्था उपासना को माध्यम मानता है,जो गांधी के शब्दों में कहें तो साधन हैं,साध्य नहीं है।साध्य मनुष्यता है जो नैसर्गिक है और प्राकृतिक भी है।

वैदिकी साहित्य में वेदों में प्राकृतिक शक्तियों की ही उपासना है,जहां मूर्ति पूजा नहीं है।मिथक भी वेदों ने रचे नहीं है।वेदों,ब्राह्मण ग्रंथों और संहिता साहित्य के बाद शुरु उपनिषद और आरण्यक काल में इसी जैविकी जीवन से मुक्ति के मार्ग खोजे जाते रहे हैं,तो उनमें जनपदों के लोक जीवन की गूंज भी सर्वत्र है।वैदिकी काल से उपनिषद आरण्यक काल में जो भी साहित्य रचा गया है,वह प्रकृति के सान्निध्य में आरण्यक सभ्यता का उत्पादन है।वैदिकी काल से लेकर उपनिषद काल तक कहीं मिथक नहीं हैं।मिथक आधारित धर्म कर्म और मूर्ति पूजा नहीं है।यज्ञ और होम भी सत्ता का धर्म है,जो आम जनता में कहीं प्रचलित नहीं है और ऩ उनपर पुरहोित तंर्त कहीं हावी है।

वैदिकी काल से ही आस्था के समांतर अनास्था और नास्तिकता के चार्वाक द्रशन परंपरा की निरंतरता है।मिथक महाकाव्यों और पुराणों की उपज हैं,जिनका सिलसिला वैदिकी धर्म के अवसान और ब्राह्मण धर्म के उत्थान से शुरु हुआ।

गौतम बुद्ध की सामाजिकत क्रांति के तहत समता और न्याय पर आधारित जो धम्म प्रवर्तन हुआ उसके साथ ही ब्राह्मण ध्रम का अवसान हो गया।लेकिन बुद्धमय भारत के अवसान के बाद मनुस्मृति के अनुशासन के मुताबिक रचे गये मिथकों के धर्म कर्म,मूर्तिपूजा,मंत्र तंत्र और उन पर आधारित रंगभेदी जातिव्यवस्था की वजह से पुरोहित तंत्र लगातार मजबूत होता रहा लेकि धर्म के बुनियादी सिद्धांत कतई नहीं बदले। जैविकी जीवन चक्र से मुक्ति का लक्ष्य नहीं बदला।लोक आध्यात्म भी नहीं बदला।जिसकी निरंतरता भारत का संपूर्ण इतिहरास है तो अखंड संस्कृति भी है।

जैविकी जीवन से मुक्ति का जो साध्य भारतीय धर्म कर्म आध्यात्म का है,वह भारतीयता की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है और हमारे जनपद साहित्य, लोक साहित्य, कला माध्यमों, विधाओं, बोलियों, लोक परंपराओं,लोकगीतों, नृत्यों,लोकसंस्कृति और रंगकर्म में उसकी निरंतरता रही है,जो लोकतंत्र का वास्तविक विमर्श है और जिसका आधार सामाजिक यथार्थ और उत्पादन संबंध दोनों हैं।

इसके विपरीत गैर भारतीय सभ्यताओं में सारा जोर जैविकी जीवन का चरमोत्कर्ष है।यूरोप और अमेरिका में औद्योगिक क्रांति के बाद विज्ञान और तकनीक के चमत्कार से जैविकी जीवन और इंद्रियों की आकांक्षा की पूर्ति का मुक्त बाजार भोग और विलास,युद्ध,गृहयुद्ध और अभूतपूर्व हिसां का चरमोत्कर्ष है,जहां जैविकी जीवन को सुख संपत्ति का आधार बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों की लूटखसोट की अबाध पूंजी प्रवाह और क्रयशक्ति ही अंतिम साध्य हैं,जिसके लिए मनुष्यता और प्रकृति का विध्वंस अनिवार्य है।अनंत भोग है ,जिसका कोई अंत नहीं है ।अनंत लोभ है,जिसकी कोई सीमा नहीं।

इसके विपरीत,भारतीय आध्यात्म,लौकिक जीवन और भारतीय संस्कृति,आस्था और धर्म कर्म में लेकिन भग और लोभ दोनों का निषेध है। यहां कर्म का मतलब श्रम है और श्रम के बिना जीवन चक्र भी हमारे यहां निषिद्ध है।बिना श्रम भोजन भी निषिद्ध है और पूरी सामाजिक संरचना उत्पादन प्रणाली के ढांचे के मुताबिक है।

भोग और लोभ की अंधी पागल दौड़ की इसी जैविकी सभ्यता के विकास के खिलाफ गांधी ,रवींद्रनाथ,विवेकानंद से लेकर आइनस्टीन और तालस्ताय जैसे तमाम दार्शनिक और चिंतक दुनियाभर में सक्रिय हैं तो जैविकी जीवन से मुक्ति के साध्य के तहत भारतीय दर्शन पंरपरा और लोक जीवन में मनुष्यता अब भी सर्वोच्च है।वही धर्म कर्म दोनों हैं,जिसमें बुनियादी जरुरतों के सामाजिक यथार्थ हैं और उसके लिए देशज उत्पादन प्रणाली है,जिसके उत्पादक संबंधों के जरिये भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है।लेकिन भोग विलास के लिए क्रयशक्ति की कोई प्रासंगिकता है नहीं।

भारत में धर्म कर्म और आध्यात्म में असहिष्णुता का कोई इतिहास नहीं रहा है और विभिन्न रक्तधाराओं के विलय से बने महान भारततीर्थ में विविधता और बहुलता का गौरवशाली इतिहास हमारा है,जहां आस्था या अनास्था,धर्म कर्म के अधिकार में सत्ता के पुरोहित तंत्र का भी कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ है।

तो करीब सात हजार साल के ज्ञात भारतीय इतिहास में आज यह अभूतपूर्व धर्म संकट क्यों है,इसपर हम विवेचना करें तो बेहतर है।

यह धर्म संकट इसलिए है कि धर्म के नाम पर हम पुरोहित तंत्र के राजकाज के ब्राह्मणधर्म को सत्ता सौंपी है और भारतविरोधी मनुष्यता विरोधी प्रकृतिविरोधी युद्धक मुक्तबाजार के लिए अपनी अर्थव्यवस्था,अपनी उत्पादन प्रणाली,अपने प्राकृतिक संसाधनों के साथ साथ अपने गौरवशाली इतिहास और भारतीय संस्कृति को तिलांजलि देकर हम अमेरिकी जैविकी चरमोत्कर्ष की क्रयशक्ति की अंधीदौड़ में एक दूसरे का गला काटने से भी हिचक नहीं रहे हैं।मुक्तबाजार का यह महाभारत है।युद्धोन्माद है।

इसीलिए हमारा धर्म अब हमारा आध्यात्म नहीं है,युद्धोन्माद है।

हम उस लालन फकीर को नहीं जानते,जिन्होंने अपने वजूद के भीतर मनुष्यता के चरमोत्कर्ष के लिए सारी अस्मिताओं को तिलांजलि देकर कर्म कांड के पाखंड के बजाय धर्मनिरपेक्षता के विविधता और बहुलता का धर्म साधा है।

लालन फकीर गीत गोविंदम के जयदेव और पदावली के चंडीदास और वैष्णव आंदोलन के चैतन्य महाप्रभु को बाउल दर्शन में एकाकार कर देते हैं और इसी बाउल दर्शन के आाधार पर रवींद्र की गीतांजलि है,जिसे नोबेल पुरस्कार मिलने के पूरी एक सदी के बाद एक और बाउल, अमेरिकी जिप्सी बाउल बाब डिलान को राक एंड रोल और जाज के मूल स्वर से पृथक लोकसंगीत की जमीन पर खड़े होने के लिए,संगीत में मनुष्यता की जड़ों को खोजते हुए गीत लिखने के लिए नोबेल मिला है।जो उपलब्धि रवींद्र ने सौ साल पहले हासिल कर ली थी।दोनों उपलब्धियां बाउलधर्मी हैं।

सौ सालों के आर पार मनुष्यता के लोकसंगीत की पूरब पश्चिम धाराओं को एकाकार कर देने के पीछे विशुध भारतीय बाउल आंदोलन और लालन फकीर का दर्शन है जो संत कबीर का दर्शन,संत रविदास की दृष्टि और तथागत गौतम बुद्ध का धम्म भी है और इसका सबूत फिर गीतांजलि के कवि का लिखा गीति नाट्य चंडालिका है,जहां बुद्धं शरणं गच्छामि के साथ बहुजन जीवन यंत्रणा जितनी है,उससे कहीं अधिक भारत की दार्शनिक विरासत का समन्वय की विविधता और बहुलता है।

गीत गोविंदम से लेकर चंडीदास के कीर्तन,चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन में फिर असुर अनार्य श्रीकृष्ण हाड़ मांस रक्तधारा में बहुजन समाज का जैविकी जीवन और पुरोहित तंत्र के विरुद्ध वहीं बाउल आध्यात्म है जो धर्म निरप्क्ष,जाति निरपेक्ष भारतीय इतिहास है।विवधता और बहुलता का साझा चूल्हा है।

इस आलेख की शुरुआत से पहले आज सुबह मैंने व्यापक पैमाने पर लालन फकीर के गीत,चंडीदास के पदावली कीर्तन,गीतगोविंदम,लोककवि विजय सरकार के लोकगीत,संपूर्ण गीतांजलि और चंडालिका के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किये हैं।मौका लगा और हम जिंदा रहे तो इन पर अलग अलग विस्तार से चर्चा भी करेंगे।

हमारी संत साधु पीर फकीर बाउल परंपरा में पूरब में लालन फकीर और उत्तर भारत में संत कबीऱ की न कोई जाति है और न उनका कोई मजहब है।

बाउल और सूफी आंदोलन जैसे धर्म निरपेक्ष जाति निरपेक्ष है,उसी तरह भारत में संतों का भक्ति संत आंदोलन में राम रहीम एकाकार है।

मजार और दरगाहब जितने मुसलमनों के हैं,उससे कम हिंदुओं के नहीं रहे हैं। संत कबीर,सूरदास,रसखान,मीराबाई,गोस्वामी तुलसीदास,संत तुकाराम,चैतन्य महाप्रभु, दादु, बशेश्वर,गुरु नानक,गाडगे महाराज जैसे संत आंदोलन के पुरोधाओं नें कर्मकांड और पुरोहित तंत्र को खारिज करके मनुष्यता को धर्म कर्म  का आधार साबित किया है,जिसका आधुनिकीकरण लिंगायत आंदोलन,मतुआ आंदोलन,आर्यसमाज आंदोलन,ब्रह्मसमाज आंदोलन में देखा जा सकता है।

इसी ब्राह्मणधर्म और पुरोहित तंत्र के खिलाफ बौद्ध,जैन सिख धर्मो की निरंतरता बहुजन आंदोलन है जो हमारी लोकसंस्कृति की विरासत पर आधारित है और जिसका बुनियादी लक्ष्य समता,न्याय और पितृसत्ता से मुक्त स्त्री अस्मिता के साथ साथ जल जंगल जमीन और आजीविका,नागरिकता के हकहकूक है।



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Saturday, October 15, 2016

ভয় পাচ্ছি, বাংলার অন্যতম শ্রেষ্ঠ জ্ঞানচর্চা আর প্রগতিশীলতার কেন্দ্র যাদবপুরের তথাকথিত আধুনিক ছাত্রী হয়েও মিতা ডোমেস্টিক ভায়োলেন্সের শিকার হল দেখে।

শারদ্বত মান্না

মিতাকে আমি ভাল করে চিনতাম না। আমিও, ওরই মত, যাদবপুরে বাংলা পড়তাম। ক্লাস করে ফেরার সময় সিঁড়িতে দেখা হত কখনো-সখনো। একই ব্যাচ, একই বিভাগ, বিষয়ও এক, কিন্তু এরকম হয়েই থাকে, আমার বন্ধুমহল আর ওর বন্ধুমহল আলাদা ছিল। আলাপ হয়েছিল রি-ইউনিয়নে। আমার ওপর দায়িত্ব পড়েছিল ডিপার্টমেন্ট সাজানোর, আর আমাকে সাহায্য করার জন্য ছিল আরো দশ-বারোজন, তাদের মধ্যে মিতাও ছিল। টানা চার-পাঁচদিন শোলা কেটে রঙ করে আঠা দিয়ে ঘর সাজাতে সাজাতে রি-ইউনিয়নের আগের দিন খুব ক্লান্ত হয়ে ও বলেছিল, 'এত খাটলাম, কিছু খাওয়াবি না?' অগত্যা সবাই মিলে ঝালমুড়ি, যার যা রেস্ত। ওইটুকুই। পাশ করে যাওয়ার পরে কনভোকেশনেও দেখা, ওই, হাই-হ্যালো। তারপর অভীক-সমন্বিতা-দিব্যর ফেসবুক ওয়াল থেকে জানতে পারলাম, মিতা বিয়ে করেছে। লাইক, কনগ্র্যাচুলেশনের কমেন্ট, যোগাযোগ শেষ।

অবশ্য ও চলে যাওয়ার পর ওর বাড়ি গিয়ে, বন্ধুদের সঙ্গে মিতার কথা তুলে এনে যা যা জানা গেল, সেগুলো জানা থাকলে লড়াই কাকে বলে, তাও জানা হত। মিতার বাড়ি গড়িয়ার শান্তিনগরে। কাঠের পুল দিয়ে নালা পেরিয়ে যে গলির মধ্যে ওর বাড়ি, তার রাস্তার চারপাশে এখনো নবমীর বৃষ্টির থই থই জল। মিতার বাড়িতে টালির চাল, দরমার দেওয়াল। বাবার আয়ের কোনো ঠিকঠিকানা নেই। দিন গেলে ১৫০-২০০ টাকা। দুই দাদার একমাত্র বোন মিতা যাদবপুরে পড়ার সময় বইখাতার খরচ আর হাত খরচ তুলত সেলাই করে, পাড়ার কিছু বাচ্চা ছেলেমেয়েকে টিউশন পড়িয়ে। মা বাড়ি বাড়ি কাজ করে ছেলেমেয়ের পড়ার খরচ যুগিয়েছেন। সেলাইয়ের খুব ভাল কাজ জানত, বন্ধুদেরও টুকটাক ব্লাউজ-কুর্তি বানিয়ে দিয়েছে ও। এত কষ্টের পরিবেশেও কী একটা মনে পড়াতে শিঞ্জিনী হাসতে হাসতে বলছিল, 'ভাব, ব্যাগ থেকে ফিতে বার করে ক্লাসরুমেই আমার মাপ নিয়েছিল'... এই মেয়ে যে এত লড়াই করে যাদবপুরে পড়তে এসেছে, সেটা যাদবপুরের সৌভাগ্য। আমরা মধ্যবিত্তরা জীবনযুদ্ধের কীই বা জানি?

মিতা টাকাপয়সা নিয়ে খুব খুঁতখুঁতে ছিল, পাই-পয়সা ধার রাখত না বন্ধুদের কাছে। ওর বিয়ের পর যাদবপুরের বন্ধুদের সঙ্গে ওর দেখা হয় এমফিল পরীক্ষার দিন। শ্বশুরবাড়ির সুখ্যাতি করেছিল বেশ কয়েকবার। কোনো একবার চায়ের দামের পাঁচটাকা দিতে না পারায় যখন খুব লজ্জিত, তখন দিব্য-অভীক বলেছিল, 'সাধ'-এ তো মেয়েদের ডাকবি। আমরা তো ডাক পাব সেই তোর বাচ্চার অন্নপ্রাশনে, তখন পাঁচটাকা কেটে রেখে গিফট দেব। রসিকতার পাত্রী লজ্জায় লাল হয়ে যাচ্ছে- এরকম ইয়ার্কি আমরা দিয়েই থাকি, কিন্তু আমরা কিংবা মিতার বাড়ির মানুষরা, কেউই জানতাম না কত কিছু মিতা লুকিয়ে যাচ্ছে আমাদের সবার কাছে। মিতা বাপের বাড়ির সবার কাছে লুকিয়ে গেছে, যে বিয়ের আগে অনেকদিনের সম্পর্কই ছিল ওর আর রানার। যেমন, মিতার কাছে রানা চেপে গেছে তার মদের নেশার কথা। একবার, মাত্র একবারই বিয়ের পর বাপের বাড়িতে মিতা বলেছিল, বর খুব মদ খায়। বন্ধুদের কাছেও বলেনি এ কথা। শুধু বৌদিকে একবার বলেছিল, ক'দিন আগে, ওর অনেক কথা জমে আছে, বলার মত। পুজোয় বাপের বাড়ি এলে বৌদিকে বলবে সব। চতুর্থীতে মিতা বাপের বাড়ি আসে, সপ্তমীর দিন রানা ওকে শ্বশুরবাড়ি ফিরিয়ে নিয়ে যায়। তার পরের ঘটনাগুলো আমরা সোশ্যাল মিডিয়া আর পেপারে পড়েছি।

মিতা যাদবপুরে বাংলা এম.এ.তে আমাদের সঙ্গেই ভর্তি হয় ২০১৩ সালের জুলাই মাসে। ২০১৫র ডিসেম্বরে আমাদের কনভোকেশন হয়ে যায়। মিতা বিয়ে করে ২২শে এপ্রিল ২০১৬। দশমীর বিকেল-সন্ধ্যে নাগাদ অনলাইন মিডিয়ায় আমরা খবর পাই, আমাদের মিতা মারা গেছে, রিপোর্টে 'আত্মহত্যা' নয়, সরাসরি 'গলা টিপে ঝুলিয়ে দেওয়া'র কথা উল্লেখ করা আছে।

মিতার বাড়িতে রানার ফোন আসে দশমীর দিন, ১১ই অক্টোবর ভোরে, ৫.০০-৫.৩০ নাগাদ। রানা ফোনে বলে, 'আপনাদের মেয়ে সুইসাইড করার চেষ্টা করেছে।' তার ১৫ মিনিট পরেই আবার ফোন করে বলে, 'আপনাদের মেয়ে মারা গেছে।' পাড়া থেকে কোনোমতে গাড়িভাড়া করে মিতার বাড়ির লোকজন সঞ্জীবন নার্সিং হোমে পৌঁছলে মিতার মৃতদেহের কাছে তার বাড়ির কোনো মানুষকে দেখা যায় না, রানা কোথাও নেই। মিতার শ্বশুরবাড়ির সবারই কেমন যেন আক্রমনাত্মক ভাব। যে মেয়ে আত্মহত্যা করে, তার স্বামীর তো শোকে বিহবল হওয়ার কথা, সে কেন নিখোঁজ? মিতার কাকাশ্বশুর বলে, 'আপনাদের মেয়ে সুইসাইড নোট লিখে গেছে'। সুইসাইড নোট কোথায়, এই প্রশ্ন করতেই সে ভিড়ের মধ্যে দিয়ে প্রায় পালিয়ে যায় কেন? এরকম অনেক প্রশ্নের উত্তর মেলে মিতার নিথর দেহ দেখে। এমনই আত্মহত্যা করেছে মিতা, যাতে তার নাক-কান দিয়ে প্রচণ্ড রক্ত পড়েছে। রক্তের ধারায় মুখ ভেসে চুল পর্যন্ত চাপ চাপ রক্তে ভরে গেছে। কান দিয়ে রক্ত গড়িয়ে পড়েছে অনেকটা। গলায় আর ঘাড়ে আঁচড়ের গভীর ক্ষত। একটা কানের লতি ছিঁড়ে গেছে। বাহুতে আঙুলের ছাপ পড়ে কালশিটে পড়ে গেছে। গলায় গভীর কালো দাগ, তা আঙুলে হতে পারে, দড়িতেও হতে পারে, আবার দুটোই, মানে, আঙুলের পরে দড়ি ব্যবহার করেও হতে পারে। মিতার হাতের শাঁখা-পলা, হাতের মেহেন্দি, পায়ের আলতা, দাম্পত্যের সবকিছুর চিহ্ন তখনও রয়ে গেছে। আত্মহত্যাই, কারণ রানার বাড়ির লোকজন এই ঘটনাকে খুব 'স্বাভাবিক-মৃত্যু' 'আত্মহত্যা' বলে তার মৃতদেহ খুব তাড়াতাড়ি দাহ করার চেষ্টা করছিল।

মিতা যে ঘরে 'আত্মহত্যা' করেছে, তার খাট এত উঁচুতে, আর সিলিং এতই নিচুতে, সে ঘরে খাটের ওপর দাঁড়ালে পাখার ব্লেড মিতার গলায় লাগার কথা – মিতার ছোড়দার থেকে এমনই জানা গেল। ঝোলার স্থান নেই যেখানে, সেখানে ফ্যানে ঝুলে পড়ে সে 'আত্মহত্যা' করল? এত আঘাত তাহলে সে কখন পেল? সঞ্জীবন নার্সিংহোম, যেখানে চাকরি করে মিতার স্বামী রানা, সেখানকার রিপোর্টে কেন লেখা হল আঘাত কেবলমাত্র গলার চারপাশে? মৃত্যুর কারণ কেন লেখা হল, ঝুলে পড়ার জন্য দম আটকে মৃত্যু হয়েছে তার? ডাক্তাররা কি রক্ত চেনেন না? আঁচড়ের দাগ চেনেন না? ব্রেনে হ্যামারেজ না হলেও, এমনি এমনিই নাক কান দিয়ে ভলকে ভলকে রক্ত বেরিয়ে আসা খুব স্বাভাবিক ঘটনা- এমনটাই কি মনে হয়েছিল সঞ্জীবন নার্সিংহোমের ডাক্তারদের? আমরা সত্যিই জানি না, কেবল শুনেছি, উড়ো কথাও হতে পারে, যে জমিতে সঞ্জীবন হাসপাতাল তৈরি হয়েছে তার বেশ কিছুটার প্রাক্তন মালিক রানার পরিবার। ওই হাসপাতালে তার পরিবারের দাপট আছে, রানার ওই হাসপাতালের টেকনিশিয়ানের চাকরিও সেখানেই পাওয়া। যেখানে মিতার মৃত্যু হয়েছে, পুলিশ সেই ঘরটিকে সিল করেনি এখনও। প্রমাণ লোপাট হতেই পারে, খাটের অবস্থান বদলে দিলেই মিতার 'আত্মহত্যা'র পক্ষে যুক্তি সাজাতে পারবে খুনিরা। মিতার স্বামী-শ্বশুর ধরা পড়লেও দেওর-শাশুড়ি এখনও পলাতক। হ্যাঁ, মিতার খুন হওয়ার সময় তারা সেই বাড়িতেই উপস্থিত ছিল। খুন হওয়া মেয়ের পরিজনকে নার্সিংহোমে ঢোকার মুখে মিতার শাশুড়ি বলেছিল, 'আপনার মেয়ের খুব জেদ।' তখনও ভয় পায়নি সে। কুশবেড়িয়ার মণ্ডলপাড়ায় মিতার শ্বশুরবাড়ি, সেখানে সমস্ত মানুষই রানাদের আত্মীয়, সরাসরি না হলেও জ্ঞাতি তো বটেই। তাই খুন হওয়া মিতার বাড়ির মানুষ যখন নার্সিংহোমে, হাসপাতালের মর্গে, থানায় দৌড়াদৌড়ি করছেন, সব জায়গায় তাঁদের প্রত্যাখ্যাত হতে হয়েছে। পুলিশ এফআইআর নিতে চায়নি, অনেকক্ষণ অপেক্ষা করতে হয়েছে তাঁদের। শেষে পরিস্থিতি এতটাই উত্তপ্ত হয়ে ওঠে, দুশ-আড়াইশ লোকের হাত থেকে মিতার আত্মীয়-পরিজনকে বাঁচানোর জন্য র‍্যাফ দিয়ে প্রোটেকশন দিয়ে হাওড়া পর্যন্ত তাঁদের এগিয়ে দিয়ে যেতে বাধ্য হয় পুলিশ।

এর সঙ্গে আরো অনেকগুলো ছোট-ছোট আপাত-বিচ্ছিন্ন ঘটনা ঘটেছিল, যেগুলো জুড়লে,ব্যাপারটা আর অনেকটা পরিষ্কার হয়। মিতা চতুর্থীর দিন বাড়িতে এসে বলে, ও বি.এড. পড়তে চায়, তার অনেক খরচ। শ্বশুরবাড়ি থেকে অল্প কিছু টাকাই পাওয়া যাবে, বাকিটার জন্য বাবার কাছ থেকে ওর একলাখ টাকার দরকার। আর, খুন হওয়ার মাসদুয়েক আগে আমাদেরই সহপাঠী, ওর ঘনিষ্ঠ বান্ধবীকে জানায়, ও কনসিভ করেছিল, তারপর সদ্য অ্যাবরশন করতে হয়েছে ওকে। এই বিশেষ বিশেষ ঘটনাগুলো কি আমাদের খুব চেনা ছকের মধ্যে পড়ে যাচ্ছে না?

খুব পরিষ্কার বোঝা যাচ্ছে, ঘটনা কী, কিন্তু আমাদের দেশে আইনের শাসন এমনই হাস্যকর যে, বহু মানুষের সমর্থন না পেলে তা বলবৎ হয় না। আমরা, মিতার বন্ধুরা ভয় পাচ্ছি, মিতা সুবিচার পাবে না। কারণ, মিতার পরিবারের লোকবল নেই, অর্থবল নেই, দক্ষ আইনজীবী নিয়োগের সামর্থ্য নেই। আমরা ভয় পাচ্ছি, বাংলার অন্যতম শ্রেষ্ঠ জ্ঞানচর্চা আর প্রগতিশীলতার কেন্দ্র যাদবপুরের তথাকথিত আধুনিক ছাত্রী হয়েও মিতা ডোমেস্টিক ভায়োলেন্সের শিকার হল দেখে। আমরা, মিতার বন্ধুরা আর আত্মীয় পরিজনরা এখনো জানি না কী ভাবে এগবো, জানি না, এই লড়াই কীভাবে টেনে নিয়ে যাওয়া যাবে। আপনারা, যাঁরা এই লেখাটি পড়ছেন, তাঁরা সবাই মিতার পাশে, মিতার পরিবারের পাশে এসে না দাঁড়ালে মিতার সুবিচার নিশ্চিত করা যাবে না।

#justiceformita
#abolishdomesticviolence

পুনশ্চঃ যাঁরা রক্তে ভেসে যাওয়ার ছবি, পোস্ট-মর্টেম হওয়ার পরের ছবি সহ্য করতে পারেন না, তাঁদের বিনীতভাবে জানাই, আমিও এরকম দৃশ্য সহ্য করতে পারি না। কিন্তু বাধ্য হয়েই করতে হচ্ছে, যাতে পরিকল্পিত হত্যাটা 'আত্মহত্যা' না বানানো হয়। আমার-আপনার রুচিশীলতা মিতার সুবিচার পাওয়ার রাস্তায় বাধা হয়ে দাঁড়াবে, এটা চাই না।

Yashodhara Ray Chaudhuri 

দশমীর দিন চলে যেতে হয় এক লক্ষ্মীকে... আর আমাদের লক্ষ্মীপুজোর শোরগোলের মধ্যে, প্রশ্নগুলো থেকেই যায়...



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Nityanand Gayenआपकी 35 साल के शासनकाल में बंगाल में दुर्गापूजा और बाकी धार्मिक कार्यक्रम मजबूत से मजबूत होता गया और पहले ममता आई और अब भाजपा जैसी धार्मिक पार्टी को भी वहां वोट मिलने लगा है | क्या आपने सोचा इस मुद्दे पर ? दिवंगत कमुनिस्ट नेता और पूर्व परिवहनमंत्री सुभाष चक्रबर्ती ने सरेआम कहा कि वह पहले एक ब्राह्मण हैं फिर कमुनिस्ट |

Nityanand Gayen
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बंगाल में एक समय पर जो लोग सीपीएम और वामपंथी दलों के लिए निचले स्तर (जमीनीस्तर नहीं कह सकता, क्योंकि जो जमीनी स्तर पर काम करते हैं उन्हें पार्टी में कोई पूछता नहीं था) काम करते थे , वे सभी सत्ता बदलने के साथ ही ममता के साथ हो लिए | खुद मेरा गाँव सीपीएम का गढ़ हुआ करता था कभी अब वहां के सभी बुजुर्ग ममता को पसंद करते हैं | सुंदरवन के सीपीएम सांसद कांति गांगुली ने अपने कार्यकाल में उस क्षेत्र के लिए बहुत काम किया था , मौली नदी पर ब्रिज बनवाया था पहले नदी पार करने के लिए घंटो ज्वार का इंतज़ार करना पड़ता था किन्तु पुल बनने के बाद लोगों को बहुत आसानी हुई फिर भी वहां के लोगों ने चुनाव के वक्त तृणमूल उम्मीदवार को चुना ! 
मेरे होश में मुझे याद है कि हमारे घर से कभी भाजपा को किसी ने वोट दिया हो ऐसा कभी नहीं हुआ , किन्तु खुद वामपंथ पार्टी के लोगों ने कांग्रेस को वोट देने के लिए कहा जरुर | 
सीपीएम के शासन काल में बंगाल में राशन व्यवस्था बहुत बढ़िया था , किन्तु अब उससे भी बेहतर है और वामपंथी दलों की दिक्कत यह है कि उन्हें बर्दस्त नहीं कि उनके कार्य शैली पर कोई सवाल करें ! तो भाजपा और अन्य पार्टियों से कैसे अलग हुए आप ? 
आपकी 35 साल के शासनकाल में बंगाल में दुर्गापूजा और बाकी धार्मिक कार्यक्रम मजबूत से मजबूत होता गया और पहले ममता आई और अब भाजपा जैसी धार्मिक पार्टी को भी वहां वोट मिलने लगा है | क्या आपने सोचा इस मुद्दे पर ? दिवंगत कमुनिस्ट नेता और पूर्व परिवहनमंत्री सुभाष चक्रबर्ती ने सरेआम कहा कि वह पहले एक ब्राह्मण हैं फिर कमुनिस्ट | क्यों महान नेता ज्योति बसु देश के पहले कमुनिस्ट प्रधानमंत्री बनने से रह गये ? क्यों सोमनाथ चैटर्जी को पार्टी से अलग होना पड़ा था ? क्यों पार्टी का पत्र (स्वाधीनता) शारदीय विशेषाकं निकालता है ? 
ऐसे अनेक सवाल है | क्यों मानिक सरकार को कभी राष्ट्रीय फ्रंट पर आगे नहीं किया गया ?
यदि ये सवाल करना गलत है , तो मैं गलत ही होना पसंद करूँगा , मुझ पर आप संदेह बे-झिझक कर सकते हैं , यह आपका लोकतांत्रिक अधिकार है | मैं समय और मुहर्त देख कर सवाल नहीं करता |

मैं कमुनिस्ट मानता हूँ खुद को, और यही मानता रहूँगा | पर आपकी आलोचना के डर से सवाल करना नहीं छोडूंगा |


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