| Thursday, 12 July 2012 11:32 |
स्वामी आनंदस्वरूप गंगा में प्रदूषण और बढ़ता गया। आज स्थितियां आप सबके सामने हैं। बावजूद इसके कुछ नई योजनाएं गंगा को निर्मल करने के नाम पर बना कर अरबों रुपए खर्च करने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। यह भी कहीं पैसे की बंदरबांट और राष्ट्रीय धरोहर की लूट का मामला बन कर ही न रह जाए। हम बिजली और सिंचाई के नाम पर पर्यावरण, जैव विविधता, हिमालय, जल स्रोतों और सांस्कृतिक धरोहरों पर हमले कब तक बर्दाश्त करेंगे? अब समय आ गया है जब हमें हिमालय की रक्षा और गंगा के अविरल और नैसर्गिक वेग के लिए निर्णायक कदम उठाने होंगे। गंगा के प्राकृतिक स्वरूप से कम हमें कुछ भी मंजूर नहीं। इसके लिए यह जरूरी है कि हिमालय क्षेत्र में और गंगा पर कोई सुरंग आधारित बड़ा बांध न हो और जो हैं उनकी समीक्षा कर उन्हें शीघ्र हटाने के प्रयास किए जाएं। जहां तक बिजली उत्पादन और हिमालय क्षेत्र में रोजगार के अवसरों का सवाल है, उसके लिए इकोफ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल विकल्प मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, केवल उत्तराखंड में पंद्रह हजार सात सौ बारह बडेÞ जल स्रोत हैं, जहां आधे से एक मेगावाट के 'घराट' लगा कर छह हजार मेगावाट ऊर्जा पैदा की जा सकती है। यही नहीं, इससे लगभग छब्बीस लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। साथ ही हिमालय और गंगा को बचाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त बड़ी परियोजनाओं के लिए विदेशी बाजार या अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त होने वाले अरबों रुपए के कर्जों के बोझ से भी देश को बचाया जा सकेगा। इसी के साथ-साथ भीमगौड़ा बैराज सहित सभी बड़ी सिंचाई नहरों की समीक्षा करने की जरूरत है। अब यह जरूरी लगने लगा है कि नहरों की नई संरचना बनाई जाए, जिसमें गंगा के प्राकृतिक प्रवाह का पचीस प्रतिशत से अधिक जल नहरों द्वारा न निकाला जाए। दो नहरों की निकासी के बीच कम से कम दो सौ किलोमीटर की दूरी सुनिश्चित की जाए। इस प्रकार कुल बारह बड़ी नहरें सिंचाई के लिए गंगा नदी से निकाली जा सकती हैं, जो सिंचाई के लिए पर्याप्त होंगी। मल-निर्गम को गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिरने से पूरी तरह रोक दिया जाए। इस अपशिष्ट का मूल स्रोत पर ही विकेंद्रित पद्धति से शोधन कर पुन: उपयोग किया जाना चाहिए। यह गंगा की अविरलता और निर्मलता को अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है। इसी के साथ यह भी जरूरी है कि गंगा और उसके सहायक नदी-नालों से अतिक्रमण हटाया जाए। फरवरी, 2009 में, जब लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए थे, यूपीए सरकार को लगा कि गंगा एक बड़ा मुद्दा बन सकती है। लिहाजा, सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके गंगा की सफाई के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 2006 के तहत प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण के गठन की घोषणा कर दी। इसमें कुछ गैरसरकारी सदस्य भी शामिल किए गए। पर जल्दी ही यह साफ हो गया सरकार द्वारा लिए जाने वाले अहम निर्णयों में उनकी कोई भूमिका नहीं है। दरअसल, ऐन आम चुनाव से पहले इस प्राधिकरण के गठन की घोषणा एक प्रतीकात्मक कदम थी और खुद सरकार के भीतर इसको लेकर कोई गंभीरता नहीं थी। गंगा स्वच्छता की पहले की योजनाओं की नाकामी की तह में जाने और नदी के प्रबंधन से जुड़े असल मुद्दों पर विचार करने की कोई जरूरत महसूस नहीं की गई। ऐसे लोग मिल जाएंगे जो नदियों के प्रदूषण को आधुनिक विकास के दौर में नियति मान बैठे हैं। संभव है हमारे योजनाकार और नीति नियंता भी किसी हद इस मानसिकता से ग्रस्त हों। पर प्रदूषित हो चुकी नदियों को फिर से निर्मल बनाने के दुनिया में कई उदाहरण मौजूद हैं। ब्रिटेन में 1963 में टेम्स नदी पर निगरानी रखने और सीवेज की गंदगी को नदी में गिरने से रोकने का क्रम शुरू हुआ और अब उसके पानी की गुणवत्ता काफी हद तक सुधर चुकी है। अमेरिका ने उद्योगों पर प्रदूषण संबंधी नियमन और जल-मल के शोधन की व्यापक व्यवस्था करके अपनी नदियों को बचाने की गंभीर कोशिश की है। इन उदाहरणों से हमें सीखने की जरूरत है। |
BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7
Published on 10 Mar 2013
ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH.
http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM
http://youtu.be/oLL-n6MrcoM
Thursday, July 12, 2012
गंगा के गुनहगार
गंगा के गुनहगार
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