BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Thursday, July 12, 2012

हमारे अनुभव से ही बनता है नाटक अरविंद गौड़ से आशीष कुमार ‘अंशु’ की बातचीत

http://raviwar.com/baatcheet/b47_interview-with-arvind-gaur-by-ashish-anshu.shtml

संवाद

 

हमारे अनुभव से ही बनता है नाटक

अरविंद गौड़ से आशीष कुमार 'अंशु' की बातचीत


हिन्दी थिएटर में रूचि रखने वालों के लिए अरविन्द गौड़ का नाम जाना पहचाना है. तुगलक (गिरिश कर्नाड), कोर्ट मार्शल (स्वदेश दीपक), हानूश (भीष्म साहनी) और धर्मवीर भारती की अंधा युग जैसे दर्जनों नाटकों के सैकड़ो शो उन्होंने किए हैं. 'कोर्ट मार्शल' का ही अब तक लगभग पांच सौ बार प्रदर्शन हो चुका है. पुलिस की कस्टडी में होने वाली मौत हो या पारिवारिक हिंसा, लड़कियों के साथ छेड़छाड़, यौन हिंसा हो या फिर घर के काम के लिए आदिवासी इलाकों से लाई जाने वाली महिलाओं का उत्पीड़न, ये सारे मुद्दे बार-बार अरविन्द गौड़ के नाटकों में प्रश्न बनकर सामने आते हैं. अरविन्द गौड़ के लिए थिएटर, मन विलास का साधन नहीं बल्कि परिवर्तन का टूल है. प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश.

अरविंद गौड़


 आपके नाटकों से और थिएटर एक्टिविज्म से आम तौर पर इसमें रूचि रखने वाले लोग परिचित हैं लेकिन आपके बचपन से कम लोगों का परिचय रहा होगा. बातचीत वहीं से शुरू करते हैं?

मेरा बैकग्राउन्ड थिएटर का नहीं था. इलेक्ट्रानिक कम्यूनिकेशन में इंजीनियरिंग कर रहा था. छोटी-मोटी चीजें लिख रहा था. कविताएं, संपादक के नाम पत्र लिख रहा था, यह मेरे शुरूआती दौड़ का लेखन था. मेरे आस पास के अनुभव ने मुझे लिखने पर मजबूर किया. मैं एक शिक्षक का बेटा था. मुझे सरकारी स्कूल और निजी स्कूल का अंतर साफ नजर आ रहा था. उन दिनों भी जब हम स्कूल में थे, निजी स्कूल में दाखिले के लिए डोनेशन देना होता था. 

आप सोचिए, कोई बच्चा छह साल का हो और उसे पता चले कि उसका फलां स्कूल में दाखिला सिर्फ इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उसके पिता के पास देने के लिए डोनेशन नहीं था. स्कूल को पंखा या अलमारी नहीं दे सकते. घर वाले यह सब नहीं दे सकते, इसलिए सरकारी स्कूल में दाखिला लेना होगा. जब यह बात जाने अनजाने में एक स्कूल जाने वाला बच्चा समझने लगता है, तो पहले दिन से ही उसके अंदर एक आक्रोश पनपता है. पास के ही पब्लिक स्कूल में दाखिला नहीं हुआ और फिर सरकारी स्कूल में दाखिल हुए. 

यह आक्रोश हमारे सीनियरों में भी था. यह द्वन्द्व अक्सर चलता था. वे अभिजात्य हैं, अच्छे कपड़े, अच्छे जूते और अच्छी गाड़ी... हम सफेद शर्ट और खाकी निक्कर वाले थे. जूते मिल गए तो पहने नहीं तो आम तौर पर बिना जूते के ही स्कूल गए. इसका नतीजा हमारी लड़ाइयों से निकलता था. हम आपस में भीड़ते थे. बचपन में इन लड़ाइयों का अर्थ समझ नहीं आया. बच्चों की दुनिया ही अलग होती है. पब्लिक स्कूल वाले स्टील की अटैची लेकर आते थे और हम सरकारी स्कूल वाले पुराने कपड़े का बैग इस्तेमाल करते थे. 

• सरकारी स्कूल में पढ़ाई और आवारगी दोनों में अव्वल रहने का सिलसिला कब तक चला?

उन दिनों रोहतास नगर, गली न. दो का हमारा स्कूल बदमाशी में चर्चित था. बाद में अपना स्कूल बदला. उसी दौरान लगा कि कुछ है अंदर. सबसे अलग. उस दिन मैं किताब पढ़ रहा था क्लास में और टीचर ने छूटते ही कहा- तुम नहीं पढ़ सकते. तुम स्पष्ट नहीं पढ़ते. मैं पढ़ने में अच्छा था. नंबर अच्छे आते थे. पढ़ने में होशियार था फिर किताब क्यों ना पढ़ूं? मेरी टीचर से बहस हुई. उन्होंने थप्पड़ मारा और क्लास से बाहर कर दिया. मैंने क्लास रूम का दरवाजा पीटा तो उन्होंने फिर पिटाई की. यह मेरा पहला विद्रोह था. गलत कभी बर्दाश्त नहीं किया मैंने. मेरे स्वर ठीक नहीं हैं. मैं ठीक से पढ़ नहीं पाता. इसके लिए मुझे सारे बच्चों से अलग-थलग करना कहां तक ठीक था? यदि स्पीच इम्पीयर्ड है तो स्कूल में उसे सुधारा जाना चाहिए. बच्चा स्कूल में आता ही है, अपनी कमियों को सुधारने के लिए. किसी स्कूल द्वारा अपने सभी बच्चों को उनकी कमियों के साथ स्वीकारा जाना चाहिए. इस स्कूल में बिताए गए तीन साल महत्वपूर्ण थे. यहीं पहली बार इंकलाब शब्द जाना. 

स्कूल में हम जमीन पर बैठते थे. बाहर से कोई जांच के लिए आया तो दरियां बाहर निकाली जाती थीं. सातवीं क्लास में दरी के लिए पहली हड़ताल की. प्रिंसपल ने यह सब देखा तो गुस्से में एक बच्चे को थप्पड़ मार दिया. फिर स्कूल बंद हुआ और अंततः टाट-पट्टी बच्चों को मिली. इस जीत से हम सब बच्चों का हौसला बढ़ा. फिर मैंने अपने उच्चारण और भाषा पर काम किया. गलतियों को सुधार कर अपने पढ़ने की गति बढ़ाई. भगत सिंह को पढ़ना शुरू किया. उसी दौरान दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी का सदस्य बना. पढ़ने का सिलसिला बना तो लिखने का भी सिलसिला शुरू हुआ. 

• आप इंजीनियरिंग के छात्र थे, फिर वह कैसे छूटा?

मेरी इंजीनियरिंग चल रही थी, लेकिन रूझान लिखने-पढ़ने की तरफ था. छट्ठे सेमेस्टर में आकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई मैंने छोड़ दी. परिवार और रिश्तेदारों की तरफ से विरोध हुआ. बाद में सबने मेरे निर्णय को स्वीकार भी कर लिया. उसी दौरान मैं थोड़ा उलझन में था कि क्या करना चाहिए? मेरे एक दोस्त के पिता ने स्टोरकीपर की नौकरी दिलाई. वहां तीन-चार महीने काम किया. वहां कारखाने के मजदूरों की जिन्दगी को करीब से देखने का मौका मिला. जो चीजें मैं परिवार में रहकर समझ नहीं पाया था, उसे मजदूरों के बीच रहकर समझा. फिर एक दिन नौकरी छोड़ दी और मजदूरों के बीच काम करने लगा. उस दौरान लिखना और थिएटर दोनों साथ साथ चल रहे थे.
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