BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Thursday, July 12, 2012

क्‍या जगह-जगह हुए धमाकों में चिदंबरम की भूमिका थी?

http://mohallalive.com/2012/07/11/a-report-on-supreme-court-direction-to-the-govt-on-fashih-mahmud-case/

संघर्ष

क्‍या जगह-जगह हुए धमाकों में चिदंबरम की भूमिका थी?

11 JULY 2012 NO COMMENT

खुफिया एजेंसियों के फांसे में लोकतंत्र

♦ राजीव यादव


फसीह महमूद


निकहत परवीन (फसीह महमूद की बीवी)

तील सिद्दीकी की खुफिया एजेंसियों द्वारा पुणे की यर्वदा जेल में की गयी हत्या को एक महीने हो गये हैं और 13 मई को सउदी से उठाये गये बाढ़ समेला (दरभंगा) के ही फसीह महमूद के अपहरण को भी दो महीने होने जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में पड़े हैबियस कार्पस पर डेट पर डेट देकर न्यायालय ने भी इस राज्य प्रायोजित आतंकी माहौल में अपनी पक्षधरता को हमारे सामने रख दिया है।

कोर्ट में 9 मई को सरकारी पक्ष ने कहा कि फसीह महमूद सउदी में हैं, जिस पर कोर्ट ने उन्हें 21 दिन में हलफनामा देने के लिए कहा। सवाल एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में एक व्यक्ति के जीवन का है। पर हम जानते हैं कि न्यायालय ने यह मोहलत आतंकी खुफिया एजेंसियों को फर्जी सबूत गढ़ने के लिए दिया है। सवाल है कि अगर दो महीने से फसीह महमूद को रखा गया है, तो उसे अब तक भारत क्यों नहीं लाया गया। किस आधार पर सउदी में उसे रखा गया है, और फसीह के परिजनों के बार-बार पूछे जाने पर यह क्यों कहा गया कि सरकार को मालूम नहीं है। यह बात देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने प्रेस वार्ता में कही थी। अगर भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है, तो उसे सउदी से अपहरण किये गये अपने देश के नागरिक के अपहरणकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। फसीह के खिलाफ अगर कोई सुबूत था, तो उसे उठाने के बाद ही क्यों नहीं पेश किया गया? किसी को भी गिरफ्तार करने के बाद पेश किया जाता है, पर जो किया जा रहा है वह आतंकी राज्य की कार्यनीति है।

निखत परवीन का एक मेल एक लेख के जवाब में जब मिला, तो हमारा हौसला बुलंद हुआ। निखत परवीन फसीह महमूद की पत्नी हैं, पर आज जब उन्होंने मेल किया कि आपको हाल की कुछ और बातें भी याद करनी चाहिए और उन्होंने कतील की जेल में हुई हत्या पर कई सवाल किये, तो ऐसा लगा कि निखत अब सिर्फ अपने शौहर की ही नहीं उन तमाम बेगुनाहों की आवाज बन गयी हैं, जिसे राज्य न्याय से वंचित रखना चाहता है। इशरत जहां की वालदा शमीमा कौशर की बातें और उनका चेहरा हमारे सामने आ गया कि जब भी हमने विभिन्न सम्मेलनों में उन्हें बुलाया तो वो आती हैं, और पिछली बार जब बाटला हाउस की तीसरी बरसी पर आजमगढ़ के संजरपुर में उन्हें बुलाया गया तो वे सिर्फ आयीं ही नहीं बल्कि कई दिनों तक रुक कर और पीड़ित परिवारों के साथ दुख-दर्द साझा किया। जाते-जाते यह भी कहा कि जब भी बताना, हम हर मौके पर मौजूद रहेंगे इस लड़ाई में।

पुणे की जिस यर्वदा जेल में कतील की हत्या की गयी, इसी जेल में गुलामी के दौर में गांधी जी भी थे। 2002 में यहां गांधीवादी मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए संकल्प लिया गया। इसके तहत एक साल का एक कोर्स चलाया जाता है, जिसमें हर कोई अपनी मर्जी से दाखिला ले सकता है। एक सर्वे में पाया गया कि इस अभियान का असर यह रहा कि 94 फीसदी लोग गांधीवादी आदर्शों के प्रति सम्मान का भाव रखने लगे, 77 फीसदी लोग मानने लगे कि दोस्ती से सामाजिक परिवर्तन और 66 फीसदी लोगों ने उन परिवरों से माफी मांगने की इच्छा जाहिर की, जिनके लोगों के साथ उन्होंने हिंसा की थी। पर गांधी के आदर्शों पर चलने वाले इस देश के तंत्र ने कतील की सिर्फ हत्या नहीं की बल्कि एक आदर्श समाज का खाका तैयार करने वाली नस्लों में खौफ का बीजारोपण किया।

निखत बताती हैं कि कतील की चार्जशीट न तो तीन महीने में आयी और न ही 6 महीने में, जो कि कानूनी तौर पर आ जानी चाहिए थी। जब कतील की मौत हुई, तो उस सेल में सिर्फ 2 सुरक्षाकर्मी थे? जबकि तीस होने चाहिए थे। आगे वो मीडिया रिपोर्ट के आधार पर कहती हैं कि कतील का मर्डर दो कैदियों ने किया। जबकि उन दोनों कैदियों की सेल और कतील की स्पेशल सेल में काफी दूरी है, जैसा एक चाय वाले का बयान आया कि चाय देते वक्त उन दो कैदियों का सेल खुला रह गया था तो क्यों उसी वक्त कतील के स्पेशल हाई सिक्‍योरिटी सेल का भी दरवाजा खोल दिया गया था? अगर हां तो यह एक षड्यंत्र था और सवाल उन सुरक्षाकर्मियों का भी है कि जब कतील को मारा जा रहा था तो वे कहां थे? और क्या उन लोगों ने कतील के नाखूनों को भी निकाल दिया था? क्योंकि उसके नाखून गायब थे। सच तो यह है कि उन लोगों ने उसे यातना देकर मार डाला। कतील की मौत से दो दिन पहले उसके भाई को पुलिस वालों ने बताया था कि उन्हें कतील दो-तीन दिनों में घर पर मिलेगा और ठीक दो दिन बाद कतील की मौत की खबर आयी। तो क्या ये पुलिस वाले भविष्यवाणी भी करने लगे हैं? या फिर वो दो दिनों में उसे रिहा करने वाले थे?

निखत बड़ी आशा और व्यवस्थागत खामियों की तकनीकियों को समझाते हुए कहती हैं कि कतील के घर वालों को पांच करोड़ का मुआवजा मिलना चाहिए, जो कि उनका कानूनी हक बनता है। उन तमाम पुलिस एजेंसियों पर मुकदमा करना चाहिए, शायद मुकदमा हार भी जाएं पर जब तक मुकदमा चलेगा वो लोग निलंबित रहेंगे?

बचते-बचाते अब चिदंबरम और सीबीआई भी कहने लगे हैं कि फसीह सउदी में है। एनआईए के डीआईजी ने लिखित रूप में कहा कि फसीह पर उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। पर सवाल उठता है कि अगर फसीह के 13 मई से सउदी से गायब होने की सूचना तमाम मीडिया माध्यमों और यहां तक कि न्यायालय तक को दी गयी, तो क्या भारतीय राज्य ने उसे खोजने की कोशिश नहीं की? क्या एक लोकतांत्रिक गणतंत्र में राज्य इस जिम्मेदारी से बच सकता है। अगर ऐसा है, तो अब वो क्यों कभी अबू जिंदाल तो कभी उसे तलहा अब्दाली से जोड़ने की फर्जी सूचनाओं को मीडिया माध्यमों से प्रसारित करवा रहा है। जरूरत तो आज इस बात की है कि चिदंबरम से अबू जिंदाल, तलहा अब्दाली, यासीन भटकल और न जाने कौन-कौन के क्या संबंध हैं, इसकी जांच करवायी जाए। क्योंकि…

ह कोई संयोग नहीं है कि जब-जब चिदंबरम टूजी से लेकर दूसरे घोटालों में फंसते नजर आये, तब-तब धमाके हुए। हमें याद रखना चाहिए कि 7 दिसंबर 2010 को दश्वाश्वमेध वाराणसी धमाका, 13 फरवरी 2010 को पुणे जर्मन बेकरी, 17 अप्रैल 2010 को चिन्नास्वामी स्टेडियम, 13 जुलाई 2011 को दादर, ओपेरा और झावेरी हो या फिर 7 सितम्बर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट धमाका, इन सब धमाकों से पहले टूजी को लेकर खूब बहस हो रही थी। पर धमाकों के शोर में यह बहस कमजोर हो गयी। इसे संयोग नहीं माना जा सकता। यह एक राज्य प्रायोजित आतंकी षड्यंत्र था। याद कीजिए जब मुंबई में पिछले साल धमाका हुआ, तो चिदंबरम ने भगवा आतंक का नाम लिया था। भगवा आतंक का नाम लेते ही भाजपा चुप्पी साध गयी। हिंदुत्ववादी आतंकी गुटों की भूमिका को लेकर चिदंबरम ने कहा था कि मैं जानता हूं कि ये लोग बम बनाते ही नहीं हैं, बल्कि फोड़ते भी हैं। हिंदुत्वादी राजनीति द्वारा टूजी घोटाले पर मौन साधते ही चिदंबरम ने भी उन्हें 'बख्श' दिया। याद कीजिए की इसी वक्त टूजी घोटाले में बंद ए राजा ने प्रधानमंत्री और चिदंबरम का भी नाम लिया था।


इन बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि आतंक की यह राजनीति भ्रष्टाचार और मूल मुद्दों से भटकाने के लिए की जा रही है। इसमें खुफिया एजेंसियां सम्मिलित हैं, जो न सिर्फ निर्दोषों को फंसाती हैं बल्कि इन आतंकी वारदातों को भी अंजाम देती हैं, जिससे कि सत्ता पक्ष आराम से अपनी जनविरोधी नीतियों को लागू कर सके।

बहरहाल, निखत कहती हैं कि कहा जा रहा है कि 31 मई के बाद फसीह को उठाया गया। ऐसा इसलिए कि 13 से 31 मई के बीच के वक्त को वे मैनेज कर सकें, पर यह बात किसी से छुपी नहीं है कि उन्हें 13 मई को उठाया गया था। यह बात बड़े आत्मविश्वास के साथ कहते हुए निखत कहती हैं कि इसे प्रमाणित किया जा सकता है। वो कहती हैं कि उन्होंने 19 मई को मुझे और पापा को फोन किया था। वे बहुत परेशान थे, रो-रो कर कह रहे थे कि कि मैंने कुछ नहीं किया, इंशा अल्लाह मैं जल्दी छूट जाऊंगा।

निखत का सवाल लाजमी है कि प्रत्यर्पण संधि के कुछ नियम-कायदे हाते हैं, जिसके मुताबिक उचित दस्तावेज जमा करने चाहिए। सब जानते हैं कि वारंट और रेड कार्नर नोटिस मेरे सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद जारी हुआ और उन्हें उठाया पहले गया था। अब तक फसीह के खिलाफ कोई सुबूत सउदी सरकार को नहीं दिया जा सका है। इसी वजह से उन्हें लाया भी नहीं जा सका है। भारतीय एजेंसियों की गलती छुपाने के लिए, झूठे दस्तावेज तैयार करने के लिए दो महीने का पूरा मौका दिया गया ताकि सउदी को वे दिखाकर फसीह को यहां ला सकें।

पिछले दिनों संचार माध्यमों में आयी खबरों में कहा गया कि फसीह पाकिस्तानी पासपोर्ट पर सउदी गया था। पर मुझे याद है कि जब शाईन बाग दिल्ली में निखत परवीन से मुलाकात हुई, तो उन्होंने बताया था कि किस तरह शादी के बाद वे सउदी गयीं और फसीह भी भारतीय पासपोर्ट पर सउदी गये थे। दरअसल भारतीय एजेंसियां इस पूरे मामले को पाकिस्तान से जोड़कर अपने ऊपर उठ रहे सवालों को पाकिस्तान विरोध पर टिके राष्ट्रवाद के सहारे हल करना चाह रही हैं। जिससे नयी कहानी बनाने में मदद मिल सके। और इन दिनों जो अबू जिंदाल की गिरफ्तारी हुई है, जिसे आतंकवाद के मसले के कई जानकार लोग यासीन भटकल की ही तरह भारतीय एजेंसियों का प्लांटेड आदमी बताते हैं, से उसे जोड़ सकें। फसीह महमूद बैंग्लोर के अंजुमन कालेज में पढ़ते थे और जांच एजेंसियों की थ्योरी अब यह प्लांट करने की कोशिश कर रही है कि यहीं से इनके आतंकवादी लिंक हैं। जो भी हो, पर जांच एजेंसियों की थ्योरी में अगर कोई सच्चाई होती तो वे 13 मई को सउदी से उठाने के बाद ही उसे पेश कर देते। अब जो भी थ्योरी है, वो प्लांटेड है। क्योंकि जिस इंडियन मुजाहिदीन नाम के आतंकी संगठन से जोड़ कर दरभंगा से गिरफ्तारियां की गयीं, वो संगठन ही खुफिया एजेंसियों द्वारा संचालित संगठन है। जिस यासीन भटकल उर्फ शाहरुख, इमरान और न जाने कौन-कौन से नाम हैं उसके, वो दरअसल खुफिया एजेंसियों का प्लांटेड आदमी है। दरभंगा के लोग कहते हैं कि यहां के एसपी विकास वैभव के एनआईए में जाने के बाद से ही इंडियन मुजाहिदीन के नाम पर गिरफ्तारियों का यह सिलसिला शुरू हुआ। दरअसल विकास ने अपने एसपी रहते हुए यहां लोकल पुलिस और खुफिया की मदद से यहां के लोगों को फर्जी तौर से फंसाने का खाका तैयार किया था।

निखत कहती हैं कि बस अब अगली सुनवाई का इंतजार है। देखते हैं, सरकार क्या कहानी पेश करती है?

(राजीव यादव। पीयूसीएल यूपी के प्रदेश संगठन सचिव। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद अपने प्रदेश में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्टिंग में रम गये। वाम प्रतिबद्धता वाले युवा पत्रकारों के संगठन जेयूसीएस (जर्नलिस्‍ट यूनियन फॉर सिविल सोसाइटी) से भी जुड़े हैं। उनसे rajeev.pucl@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


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