BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Wednesday, July 11, 2012

84 लाख योनि और 87 लाख जीवन प्रजातियां

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84 लाख योनि और 87 लाख जीवन प्रजातियां

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ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान भारत में स्थापित धारणाओं, मान्यताओं को मिथक बनाकर खारिज करने का एक लंबा और सुनियोजित सिलसिला चला था. लेकिन आश्चर्य देखिए वही मिथक और धारणाएं पश्चिमी विज्ञान की खोज का नतीजा बनकर नये दौर में सामने आ रहे हैं. एक ब्रिटिश जर्नल प्लोस बायोलॉजी ने ब्रिटिश वैज्ञानिक राबर्ट एम मे के हवाले से एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया है जिसमें राबर्ट ने दावा किया है कि दुनिया में 87 लाख प्रजातियां हैं.

हालांकि यह अध्ययन दुनिया में खत्म होती प्रजातियों के बारे में शुरू किया गया था लेकिन अपने अध्ययन के दौरान राबर्ट ने इस बात का पता लगाने की कोशिश की है कि आखिर दुनिया में जीव की कुल कितनी प्रजातियां हैं? उनका अनुमान है कि कीट, पतंगा, पशु, पक्षी, पौधा-पादप, जलचर, थलचर सब मिलाकर जीव की 87 लाख प्रजातियां हैं. राबर्ट एम मे संभावना जताते हैं कि इसमें करीब 2.2 लाख प्रजातियां जलचर हैं, बाकी सभी प्रजातियां जमीन पर पाई जाती हैं. उनकी यह नई खोज उस धारणा को भी उलट देती है कि समुद्र में जमीन से ज्यादा जीव की प्रजातियां मौजूद हैं. राबर्ट का मानना है कि धरती पर समुद्र से ज्यादा जीवन प्रजातियां हैं.

राबर्ट के इस अध्ययन से पहले पश्चिमी विज्ञान ने धरती पर मौजूद जीवों का जो आंकलन किया है वह 20 लाख से 100 लाख के बीच का रहा है. लेकिन इस व्यापक संभावना के बीच पहली बार राबर्ट ने नये अध्ययनों के सहारे इतनी सटीक संख्या के आस पास जीवों के धरती पर मौजूद होने की संभावना जताई है. 87 लाख जीवों के होने की यह संभावना राबर्ट ने वर्तमान में हो रहे अध्ययनों के आधार पर निकाली हैं. वर्तमान में हर साल विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में करीब 15 हजार जीव की नयी प्रजातियों को चिन्हित किया जाता है. अगर इसी रफ्तार से हम जीवों की पहचान करते रहे तो भी धरती पर मौजूद सभी जीवों की पहचान और उनका वर्गीकरण करने में करीब 480 साल लग जाएंगे.

उधर दूसरी ओर जरा भारत की ओर नजर दौड़ाएं तो पहले से शास्त्र के हवाले से यहां के "पोंगापंथी" चौरासी लाख योनियों में भटकने की कहावते कहते रहे हैं. तो क्या प्राचीन भारत में आधुनिक पश्चिम से भी अधिक उन्नत विधि से जीवों का अध्ययन और वर्गीकरण किया गया था जिसके कारण 84 लाख योनियों (प्रजातियों) में जीव के विचरण करने की बात कही गई. ऐसा हो सकता है. लेकिन ऐसा होने के साथ ही एक सवाल और भी खड़ा होता है कि समय के अंतराल में जीव की प्रजातियां घटने की बजाय बढ़ कैसे गई क्योंकि हमारी धारणा तो यही है कि धरती से लगातार जीवन खत्म हो रहा है, प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं? इसके दो उत्तर हो सकते हैं जो राबर्ट के अध्ययन के हवाले से पाया जा सकता है. पहला कि अभी भी पश्चिम के लिए 87 लाख प्रजातियों के आंकड़े में 90 प्रतिशत अनुमानित है क्योंकि वैज्ञानिक रूप से अध्ययन पूरा होने में करीब पांच सौ साल और लगेंगे, इसलिए वे आंकलन कर रहे हैं. लेकिन दूसरा उत्तर यह भी है जो राबर्ट ही कहते हैं कि "इस बात की बहुत चिंता करने की जरूरत नहीं है कि प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं." इसका मतलब है कि मनुष्य की सोच के उलट धरती पर जीव की प्रजातियों के विलुप्त होने की बजाय नई प्रजातियों का उद्भव और विकास हो रहा है. जितनी प्रजातियां नष्ट हो रही हैं उससे अधिक प्रजातियों का धरती पर आगमन हो रहा है.

राबर्ट के इस अध्ययन के नजरिये से भारत के "पोंगापंथ" और "मिथकीय" समझ को भी समझने की जरूरत है. पश्चिम के पैसे से चलनेवाले भारतीय अध्ययन केन्द्रों ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खत्म होने के बाद भी उनके द्वारा शुरू किये गये काम को जारी रखा है. इन तथाकथित अध्ययन केन्द्रों और शोध संस्थानों ने हमेशा वेद, पुराण, उपनिषद और स्मृतियों को खारिज करने और उन्हें कूड़ेदान में डालना ही अपना शोध समझा. पहली बात तो यह समझ लें कि ये चारो प्रकार है, साहित्य नहीं. मसलन वेद एक विधा है, कोई ग्रंथ नहीं. पुराण एक विधा है, कोई ग्रंथ नहीं. इसी तरह उपनिषद और स्मृतियां भी अध्ययन की विधाएं हैं, ग्रंथ नहीं. ठीक वैसे ही जैसे इतिहास, भूगोल, विज्ञान और समाज शास्त्र होते हैं. लेकिन यह बात सही है कि समय के साथ इन विधाओं के तहत अध्ययन और विकास रुक गया. एक समय के बाद न वेद आगे बढ़े, न नये पुराण लिखे गये, न उपनिषद बने और स्मृति का भी पूरी तरह से लोप ही हो गया. जो कुछ खोह कंदराओं में बचा भी रहा, उसे आधुनिक समाज देखते ही गोली मार देना चाहता है. ऐसे में राबर्ट का यह अध्ययन निश्चित रूप से भारत की उस स्मृति को नया बल प्रदान करता है जिसका अध्ययन सैकड़ों साल पहले से रुका हुआ है. शोध एक निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है जो भारत में न जाने कब से रुकी हुई है. अगर अपने यहां भारत में भारतीय विधाओं के तहत शोध की प्रक्रिया जारी रहती तो शायद आज हम ज्यादा सटीक तरीके से यह बताने की स्थिति में होते कि धरती पर चौरासी लाख योनियां हैं या फिर 87 लाख प्रजातियां? दुर्भाग्य, हम तो विचार करने लायक समझ भी गंवा चुके हैं.

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