| अनिल चमड़िया विधानसभाओं में फांसी की सजा पाने वालों के पक्ष में इसलिए प्रस्ताव पारित किए जा रहे हैं क्योंकि सजायाफ्ता उन्हीं प्रदेशों के हैं। इसके क्या अर्थ निकाले जाएं? अफजल गुरु पर आरोप है कि तेरह दिसंबर 2001 को संसद परिसर में हुई आतंकवादी घटना के षड्यंत्र में उसकी भूमिका थी। मतलब कि हमलावरों में वह सीधे शामिल नहीं था। हमलावर पाकिस्तानी कह कर दफना दिए गए। अफजल पहले सरकार के लिए गुप्तचरी का काम करता था। दरअसल, अदालत ने कहा कि अफजल को फांसी की सजा उसने इसलिए सुनाई क्योंकि इससे देश की जनता की भावना संतुष्ट होगी। इसी तरह से देविंदर सिंह भुल्लर को नौ लोगों के हत्याकांड में शामिल होने और राजीव गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में ए जी पेरारिवलन, सोथानथीरा और श्रीहरन को फांसी की सजा सुनाई गई है। प्रसंगवश, बिहार के नोखा में बढ़ई जाति के एक परिवार के नौ सदस्यों की हत्या करने वाले सिंह भाइयों की फांसी की सजा माफ कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में कहा था कि गिने-चुने मामलों में ही फांसी की सजा दी जानी चाहिए। लेकिन उसके बाद देश के राजनीतिक हालात इस तरह के हुए कि कई मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई। वैसे मामलों की तादाद ज्यादा है जो राजनीतिक मसलों से जुड़े हुए थे। गौरतलब मीडिया द्वारा फांसी की सजा दिए जाने की सूचना की भाषा है। यह लिखा या बताया जाता है कि तीन व्यक्तियों को राजीव गांधी हत्याकांड में शामिल होने और अफजल को संसद पर हमले के मामले में फांसी की सजा दी गई है। इसका अर्थ यह होता है कि अदालत के फैसले जिन आधारों पर होते हैं वे सूचना से गायब होते हैं, बल्कि कांड के नामों को फैसले के आधार के रूप में प्रचारित किया जाता है। गिने-चुने मामलों में फांसी की सजा ऐसे नामों के कारण दी गई, न कि सजा के पीछे कोई तकनीकी और न्यायिक-तार्किक आधार तैयार किए गए। न्यायालयों में समान रूप से यह आधार हर जगह लागू नहीं होता कि किसी भी तरह के हत्याकांड में जो षड्यंत्रकारी पाया जाएगा उसे ऐसी ही सजा दी जाएगी। शंकर गुहा नियोगी की हत्या के षड्यंत्रकारियों को कितनी सजा मिली? दरअसल, कुछ मामलों में षड्यंत्र के आरोप ही ऐसी सजा के लिए पर्याप्त मान लिए जाते हैं तो इसका मतलब है कि न्यायालय की नजरों में कांडों को देखने के मामले में अंतर रहता है। यह तब निरपेक्ष नहीं सापेक्ष नजरिया हो जाता है। तब जाहिर है कि दया याचिकाओं पर भी उसी तरह से विचार होगा। भूमैया और किस्टा को फांसी की सजा के विरोध में लंबे समय तक आंदोलन हुए, लेकिन राज्य-व्यवस्था ने उनकी फांसी मुकर्रर कर दी थी। अब वही राज्य-व्यवस्था यह कहती है कि फांसी के लिए लोगों की भावनाओं का दबाव है। ये लोग कौन हैं? क्या यह अदालती भाषा हो सकती है? लोगों के दबाव का आकलन कैसे होता है? सत्ता द्वारा जन की मान्यता किसे मिली हुई है? राज्य-व्यवस्था ने एक नई ताकत मीडिया के रूप में अर्जित की है। एक घटना पेश है। झारखंड में जीतन मांझी को फांसी की सजा सुनाई गई है। जीतन मांझी तब तक वह जीतन मांझी नहीं था जिसे कानून-व्यवस्था कई हत्याओं के लिए जिम्मेदार मान रही थी। लेकिन जिस दिन जीतन मांझी के नाम के साथ मीडिया में एक तस्वीर छप गई तब से जो तस्वीर छपी वही जीतन मांझी उन हत्याओं के लिए जन की नजरों में कसूरवार हो गया। वह जीतन मांझी लोगों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा के खिलाफ लड़ने वाला संस्कृतिकर्मी है। मीडिया ने जीतन मांझी की पहचान बताई। दरअसल जीतन मांझी का मामला जन-भावनाओं को उत्पीड़न के एक राजनीतिक औजार के रूप में खड़ा करने का उदाहरण हो सकता है। अदालतों का रुख फांसी के मामलों में सामयिक राजनीतिक स्थितियों से भी किसी हद तक प्रभावित होता है। राष्ट्रपति के समक्ष जाने वाली दया याचिकाओं के साथ भी यही बात लागू होती है। मौजूदा परिस्थितियों में उत्पीड़न को लेकर एक राजनीतिक सहमति बनी हुई है। यह मसला सत्ता के केंद्रीकरण से जुड़ा हुआ है। यह अकारण नहीं है कि 2002 में तेईस, 2005 में सतहत्तर, 2006 में चालीस, 2007 में सौ फैसले फांसी की सजा के हुए हैं। फांसी के कुछ फैसलों के खिलाफ विभिन्न विधानसभाओं में पारित प्रस्ताव दरअसल महज सत्ता के दबाव हैं। पार्टियों के नजरिए से फांसी की सजा समाप्त नहीं होगी, क्योंकि यह उनकी राजनीति के काम आती है। |
Palash Biswas
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