BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, October 17, 2011

फांसी की सजा और सियासत

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/2801-2011-10-17-06-11-44

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अनिल चमड़िया
जनसत्ता, 17 अक्तूबर, 2011 : जंगम भूमैया और गुनाल किस्टा गौड़ को 5 जनवरी 1972 को फांसी की सजा सुनाई गई थी। तब हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका 'दिनमान' ने लिखा था कि भारत में अंग्रेजों के जाने के बाद राजनीतिक अपराधियों को फांसी देने की यह पहली घटना होगी। भूमैया और किस्टा के खिलाफ एक तो 24 अप्रैल 1970 को अदिलाबाद जिले के जिन्नेधरी गांव के लच्छू पटेल की हत्या का मामला चला था। दूसरा आरोप यह भी था कि वे जब पटेल की हत्या करने के बाद माधवी अंबाराव के साथ लौट रहे थे तो उन लोगों ने बैलगाड़ी पर सवार गोयल गांव के जमींदार बोदिकांता मलय्या की भी हत्या कर दी। माधवी अंबाराव को फांसी की सजा नहीं हुई।
तब फांसी की सजा के विरोध में देश में जो आंदोलन हुआ वह बेमिसाल था। लेकिन यह लगभग तय था कि इन साम्यवादी कार्यकर्ताओं को किसी भी कीमत पर फांसी की सजा दी जाएगी। राष्ट्रपति के यहां उनकी तीसरी दया याचिका खारिज होने की जानकारी भी उन्हें नहीं दी गई और दस मई की रात तीन बजे फांसी देने की तैयारी कर ली गई। उनके फंदे के नाप लिए गए और उनके लिए नए कपडेÞ सिलाए गए। बहरहाल, उन्हें आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वेंगलराव के हस्तेक्षप के कारण उस समय फांसी नहीं दी गई, लेकिन अंतत: आपातकाल के दौरान वे फांसी पर चढ़ा दिए गए।
इस फांसी की चर्चा इसलिए की गई, क्योंकि तब से मृत्युदंड के खिलाफ- खासतौर से जिनमें राजनीतिक प्रश्न गुंथे होते हैं- आंदोलन चलते रहे हैं। क्या यह सजा राजनीतिक अपराधियों के खिलाफ होती है या फिर फांसी के राजनीतिक फैसले होते हैं? कई देशों में यह सजा खत्म कर दी गई है। इसे खत्म करने की मांग एक राजनीतिक मांग भी रही है और इसकी एक पृष्ठभूमि है। भारत में तो इस सजा को खत्म करने की मांग को एक राजनीतिक आंदोलन के तौर पर ही देखा जा सकता है। हमारे देश में उत्पीड़न के कई तरह के मध्यकालीन तरीके भी अपनाए जाते हैं। सामाजिक स्तर पर यह अब भी कई घटनाओं में दिखाई देता है। आधुनिक राज्य व्यवस्थाएं भी वैसे नृशंस तरीकों का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन एक फर्क यह आया है कि उनकी नृशंसता और हिंसात्मक रूपों को आधुनिक रूपों में ढंक दिया जाता है।
दरअसल, पूरी राज्य-व्यवस्था और समाज-व्यवस्था के राजनीतिक विचारों में कोई बुनियादी भेद नहीं होता। भारत में उत्पीड़न के औजार मौटे तौर पर समाज के दबे-कुचले लोगों के खिलाफ ही इस्तेमाल होते रहे हैं। उनकी पहचान जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर भी की जा सकती है। यह कहने का एक आधुनिक तरीका है कि कानून तोड़ने वालों के खिलाफ राज्य-व्यवस्था द्वारा निर्धारित सजाएं दी जाती हैं। कानून-व्यवस्था के नियमों और शर्तों के उल्लंघन की सजाएं वर्ग, जाति, धर्म के आधार पर बुरी तरह विभाजित समाज में कई बार समान नहीं होतीं। सजा के फैसलों के साथ कई बार सामाजिक और राजनीतिक पहचान पृष्ठभूमि में होती है। आधुनिक राज्य-व्यवस्था में संवाद और संप्रेषण के जो तरीके ईजाद किए गए हैं उनके जरिए भी इस बात को ढंका या छिपाया नहीं जा सकता।
कहने को फांसी की सजा निष्पक्ष न्यायालयों ने दी है और संविधान के रक्षक राष्ट्रपति ने ही फांसी की सजा पाने वालों की दया याचिकाएं स्वीकार की हैं या फिर खारिज की हैं। लेकिन यह तथ्य भी गौरतलब है कि देश में अब तक जितने लोगों को फांसी दी गई है उनमें से अधिकतर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर उत्पीड़ित ही रहे हैं। पत्रकार प्रभात कुमार शांडिल्य ने बिहार में फांसी पर लटकाए जाने वालों की सूची के आधार पर एक अध्ययन के जरिए इस तथ्य को उजागर किया है। दरअसल, कानून-व्यवस्था की रक्षा के जो प्रावधान बनाए जाते हैं उन्हें उत्पीड़न के औजारों में तब्दील करने की भी गुंजाइश बनी रहती है।
भूमैया और किस्टा गौड़ की फांसी की सजा के खिलाफ मानवतावादी थे, गरीबों के पक्षधर थे, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी थे जो उस फैसले को लोकतंत्र के लिए एक बडेÞ खतरे के रूप में देख रहे थे। अगर उस समय की राजनीतिक परिस्थतियों को सामने रख कर उस फैसले को नहीं देखा जाएगा तो इसके राजनीतिक आयामों को समझना मुश्किल होगा। वह दौर था जब पहली बार कांग्रेस सरकारें आठ राज्यों से बेदखल हो गर्इं। समान समाज बनाने का सपना टूट गया था। तब इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। किसान और मजदूर विद्रोह का झंडा उठा रहे थे। इसीलिए साम्यवाद के लिए लड़ने वाले जुझारू नेताओं को फांसी दिए जाने के फैसले को आखिर तक बरकरार रखा गया।
अदालती फैसलों की समीक्षा करने की सुविधा आमतौर पर नहीं है। फैसलों की जो खबरें आती हैं उन्हें ही समीक्षा का आधार बनाया जाता है। किस्टा गौड़ और भूमैया को जिस आधार पर फांसी दी गई उसे स्वीकार न करने वालों में वकीलों की तादाद इतनी थी कि उन लोगों ने ही बचाव समिति का गठन किया।
फांसी का जो विरोध चलता रहा है उसकी कड़ी 2011 से भी जुड़ रही है। लेकिन कुछ काबिलेगौर फर्क है। विरोध की मुहिम के पीछे वकीलों


से ज्यादा विद्यार्थियों और युवा जनवादी संगठनों की सक्रियता है। कुछ वामपंथी, लोकतांत्रिक और बहुजन छात्र संगठनों द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में इस महीने की पहली तारीख को एक सम्मेलन किया। वकीलों के बीच यह नई प्रवृति विकसित हुई है कि पुलिस द्वारा आरोपित को अदालती फैसले से भी पहले आतंकवादी मान कर उसका मुकदमा लड़ने से वे इनकार कर देते हैं। अदालत परिसर में वे ऐसे आरोपितों पर हमले भी   करते हैं। राजनीतिक पार्टियां सीधे तौर पर विरोध के कार्यक्रम नहीं बना रही हैं बल्कि उनके कुछेक नेता एनजीओ और सामाजिक संगठनों के कार्यक्रमों में अपने लोकतांत्रिक और मानवीय होने का प्रमाणपत्र लेने जाते हैं।
विधानसभाओं में फांसी की सजा पाने वालों के पक्ष में इसलिए प्रस्ताव पारित किए जा रहे हैं क्योंकि सजायाफ्ता उन्हीं प्रदेशों के हैं। इसके क्या अर्थ निकाले जाएं? अफजल गुरु पर आरोप है कि तेरह दिसंबर 2001 को संसद परिसर में हुई आतंकवादी घटना के षड्यंत्र में उसकी भूमिका थी। मतलब कि हमलावरों में वह सीधे शामिल नहीं था। हमलावर पाकिस्तानी कह कर दफना दिए गए। अफजल पहले सरकार के लिए गुप्तचरी का काम करता था।
दरअसल, अदालत ने कहा कि अफजल को फांसी की सजा उसने इसलिए सुनाई क्योंकि इससे देश की जनता की भावना संतुष्ट होगी। इसी तरह से देविंदर सिंह भुल्लर को नौ लोगों के हत्याकांड में शामिल होने और राजीव गांधी की हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप में ए जी पेरारिवलन, सोथानथीरा और श्रीहरन को फांसी की सजा सुनाई गई है। प्रसंगवश, बिहार के नोखा में बढ़ई जाति के एक परिवार के नौ सदस्यों की हत्या करने वाले सिंह भाइयों की फांसी की सजा माफ कर दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में कहा था कि गिने-चुने मामलों में ही फांसी की सजा दी जानी चाहिए। लेकिन उसके बाद देश के राजनीतिक हालात इस तरह के हुए कि कई मामलों में फांसी की सजा सुनाई गई। वैसे मामलों की तादाद ज्यादा है जो राजनीतिक मसलों से जुड़े हुए थे। गौरतलब मीडिया द्वारा फांसी की सजा दिए जाने की सूचना की भाषा है।
यह लिखा या बताया जाता है कि तीन व्यक्तियों को राजीव गांधी हत्याकांड में शामिल होने और अफजल को संसद पर हमले के मामले में फांसी की सजा दी गई है। इसका अर्थ यह होता है कि अदालत के फैसले जिन आधारों पर होते हैं वे सूचना से गायब होते हैं, बल्कि कांड के नामों को फैसले के आधार के रूप में प्रचारित किया जाता है। गिने-चुने मामलों में फांसी की सजा ऐसे नामों के कारण दी गई, न कि सजा के पीछे कोई तकनीकी और न्यायिक-तार्किक आधार तैयार किए गए। न्यायालयों में समान रूप से यह आधार हर जगह लागू नहीं होता कि किसी भी तरह के हत्याकांड में जो षड्यंत्रकारी पाया जाएगा उसे ऐसी ही सजा दी जाएगी। शंकर गुहा नियोगी की हत्या के षड्यंत्रकारियों को कितनी सजा मिली?
दरअसल, कुछ मामलों में षड्यंत्र के आरोप ही ऐसी सजा के लिए पर्याप्त मान लिए जाते हैं तो इसका मतलब है कि न्यायालय की नजरों में कांडों को देखने के मामले में अंतर रहता है। यह तब निरपेक्ष नहीं सापेक्ष नजरिया हो जाता है। तब जाहिर है कि दया याचिकाओं पर भी उसी तरह से विचार होगा। भूमैया और किस्टा को फांसी की सजा के विरोध में लंबे समय तक आंदोलन हुए, लेकिन राज्य-व्यवस्था ने उनकी फांसी मुकर्रर कर दी थी।
अब वही राज्य-व्यवस्था यह कहती है कि फांसी के लिए लोगों की भावनाओं का दबाव है। ये लोग कौन हैं? क्या यह अदालती भाषा हो सकती है? लोगों के दबाव का आकलन कैसे होता है? सत्ता द्वारा जन की मान्यता किसे मिली हुई है?
राज्य-व्यवस्था ने एक नई ताकत मीडिया के रूप में अर्जित की है। एक घटना पेश है। झारखंड में जीतन मांझी को फांसी की सजा सुनाई गई है। जीतन मांझी तब तक वह जीतन मांझी नहीं था जिसे कानून-व्यवस्था कई हत्याओं के लिए जिम्मेदार मान रही थी। लेकिन जिस दिन जीतन मांझी के नाम के साथ मीडिया में एक तस्वीर छप गई तब से जो तस्वीर छपी वही जीतन मांझी उन हत्याओं के लिए जन की नजरों में कसूरवार हो गया। वह जीतन मांझी लोगों की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा के खिलाफ लड़ने वाला संस्कृतिकर्मी है। मीडिया ने जीतन मांझी की पहचान बताई। दरअसल जीतन मांझी का मामला जन-भावनाओं को उत्पीड़न के एक राजनीतिक औजार के रूप में खड़ा करने का उदाहरण हो सकता है।
अदालतों का रुख फांसी के मामलों में सामयिक राजनीतिक स्थितियों से भी किसी हद तक प्रभावित होता है। राष्ट्रपति के समक्ष जाने वाली दया याचिकाओं के साथ भी यही बात लागू होती है। मौजूदा परिस्थितियों में उत्पीड़न को लेकर एक राजनीतिक सहमति बनी हुई है। यह मसला सत्ता के केंद्रीकरण से जुड़ा हुआ है। यह अकारण नहीं है कि 2002 में तेईस, 2005 में सतहत्तर, 2006 में चालीस, 2007 में सौ फैसले फांसी की सजा के हुए हैं। फांसी के कुछ फैसलों के खिलाफ विभिन्न विधानसभाओं में पारित प्रस्ताव दरअसल महज सत्ता के दबाव हैं। पार्टियों के नजरिए से फांसी की सजा समाप्त नहीं होगी, क्योंकि यह उनकी राजनीति के काम आती है।

 
Palash Biswas
Pl Read:
http://nandigramunited-banga.blogspot.com/

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