BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Thursday, October 13, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख रंगभेदी अभियान में प्रियंका चोपड़ा भी शामिल?

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख रंगभेदी अभियान में प्रियंका चोपड़ा भी शामिल?

हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें


Recent Posts


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख ट्विटर पर अखिलेश यादव को पछाड़ दिया मायावती के खास रहे नवनीत सहगल ने


हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें

Recent Posts


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

বিয়ের রাতে ধর্ষিতা। পেশায় পরিচারিকা। তবু আজ বিশ্ববিখ্যাত লেখিকা এই বাঙালিনী---------

বিয়ের রাতে ধর্ষিতা। পেশায় পরিচারিকা। তবু আজ বিশ্ববিখ্যাত লেখিকা এই বাঙালিনী---------

Sarker Lipi added 8 new photos.

মোট ২১টি ভাষায় অনূদিত হয়েছে তাঁর লেখা বই, যার মধ্যে রয়েছে ১৩টি বিদেশি ভাষা। ফ্রান্স, জার্মানি এবং জাপানে রয়েছেন তাঁর বইয়ের পাঠক-পাঠিকা। সারা দেশে বিভিন্ন সাহিত্য উৎসবে তিনি আমন্ত্রিত হন তাঁর লেখা পাঠের জন্য।
এক দুঃস্বপ্নময় শৈশব কেটেছে তাঁর। কাজ করেছেন পরিচারিকা হিসেবে। সত্যি বলতে কী, এখনও পেশাগত পরিচয়ে তিনি একজন পরিচারিকাই। কিন্তু এটাই তাঁর একমাত্র পরিচয় নয়। তিনি একজন স্বনামধন্য লেখিকা। নিজের বই নিয়ে তিনি হাজির হয়েছেন প্যারিস, ফ্রাঙ্কফুর্ট বা হংকং-এর মতো শহরে। মোট ২১টি ভাষায় অনূদিত হয়েছে তাঁর লেখা বই, যার মধ্যে রয়েছে ১৩টি বিদেশি ভাষা। ফ্রান্স, জার্মানি এবং জাপানে রয়েছেন তাঁর বইয়ের পাঠক-পাঠিকা। সারা দেশে বিভিন্ন সাহিত্য উৎসবে তিনি আমন্ত্রিত হন তাঁর লেখা পাঠের জন্য। তিনি বেবি হালদার। 
বর্তমানে ৪১ বছর বয়সি বেবির জন্ম হয় কাশ্মীরে। বাবা পেশায় ছিলেন গাড়ি চালক, মদের নেশায় চুর হয়ে থাকা ছিল তাঁর স্বভাব। এই মদ্যপানের অভ্যাসের কারণেই বেবির মা স্বামী ও সন্তানকে ছেড়ে চলে যান। বেবির বয়স তখন মাত্র ৪ বছর। দ্বিতীয় বিয়ে করেন বেবির বাবা। বেবিকে নিয়ে তাঁরা চলে আসেন মুর্শিদাবাদে, তারপর বসত গড়েন দুর্গাপুরে। মদ্যপ বাবা ও সৎ মায়ের হাতে ছোটবেলায় অনেক নির্যাতন সয়েছেন বেবি। মেয়ের বয়স যখন ১২, তখনই এক ২৬ বছর বয়সি পুরুষের সঙ্গে বেবির বিয়ে দিয়ে দেন বেবির বাবা। বিয়ের রাত্রেই স্বামীর হাতে ধর্ষিতা হন কিশোরী বেবি। ১৩ বছর বয়সে বেবির প্রথম সন্তানের জন্ম হয়। পরবর্তী কয়েক বছরের মধ্যে আরও দু'টি সন্তানের জন্ম দেন বেবি। 
স্বামীগৃহে নিয়মিত মারধর ও যৌন নির্যাতন সহ্য করতে না পেরে ২৫ বছর বয়সে তিন সন্তানকে নিয়ে বেবি চড়ে বসেন দিল্লির ট্রেনে। কিন্তু দিল্লিতে নিজের পেট চালানো সহজ ছিল না। বাধ্য হয়ে পরিচারিকার কাজ নেন তিনি। কিন্তু সেখানেও জোটে অসম্মান। যাঁর বাড়িতে কাজ করতেন তাঁর কাছ থেকে আসতে থাকে অশালীন প্রস্তাব। কাজ ছেড়ে দেন বেবি। নতুন কাজ নেন গুরগাঁও নিবাসী প্রবোধ কুমারের বাড়িতে। এর পরেই নতুন বাঁক নেয় বেবির জীবন। 
প্রবোধ কুমার শুধু প্রখ্যাত হিন্দি সাহিত্যিক মুন্সি প্রেমচাঁদের নাতি নন, তিনি নিজেও একজন সাহিত্যরসজ্ঞ। তিনি লক্ষ্য করেছিলেন, মাঝেমধ্যেই নিজের কাজ থামিয়ে কৌতূহলী দৃষ্টিতে বেবি তাকিয়ে থাকেন প্রবোধের বইয়ের আলমারিগুলির দিকে। প্রবোধ বুঝতে পারেন, বইয়ের প্রতি টান রয়েছে বেবির। প্রবোধের আলমারিতে বাংলা বইয়ের সংখ্যাও নেহাৎ কম ছিল না। প্রবোধ সেই বইগুলি একটি একটি করে তুলে দিতে থাকেন বেবির হাতে। বেবি আগ্রহভরে পড়ে ফেলতে শুরু করেন প্রতিটি বই। স্কুলে ক্লাস সেভেন পর্যন্ত পড়াশোনা করা বেবিকে আরও ভাল করে লেখাপড়াও শেখান প্রবোধ। 
কিন্তু প্রবোধের মনে হয়েছিল, বেবির মধ্যে সুপ্ত রয়েছে এক লেখিকা সত্তা। সেই সত্তাকে উদ্বোধিত করতে চেয়েই একদিন বেবির হাতে খাতা-কলম তুলে দেন প্রবোধ। বলেন, নিজের কাহিনি লিপিবদ্ধ করতে। লেখার কথায় প্রথমটা একটু ঘাবড়েই গিয়েছিলেন বেবি। কিন্তু তারপর তসলিমা নাসরিন, আনা ফ্রাঙ্ক, ঝুম্পা লাহিড়ির লেখার ভক্ত বেবির মনে হয়, তাঁর লেখাই হয়ে উঠতে পারে তাঁর ভিতরে জমে থাকা যন্ত্রণা প্রকাশের মাধ্যম। ২০০২ সালে প্রকাশিত হয় তাঁর আত্মজীবনীর প্রথম খণ্ড 'আলো আঁধারি'। ২০০৬ সালে প্রবোধের উদ্যোগে সেই বইয়ের ইংরেজি অনুবাদ প্রকাশ পায় 'আ লাইফ লেস অর্ডিনারি: আ মেমোয়ার' নামে। প্রকাশের সঙ্গে সঙ্গে সাড়া ফেলে দেয় বইটি। কয়েক বছর পরে প্রকাশিত হয় বেবির আত্মকাহিনির পরবর্তী খণ্ড— 'ঈষৎ রূপান্তর'। বই দু'টি লেখিকা হিসেবে প্রতিষ্ঠা দেয় বেবিকে। 
আজ বেবি স্বনামধন্য লেখিকা। তাঁর আত্মকাহিনি প্রশংসা কুড়িয়েছে বহু পাঠক ও সমালোচকের। কিন্তু এখনও প্রবোধের বাড়িতে পরিচারিকার কাজই করেন বেবি। তাঁর বক্তব্য, 'প্রবোধবাবু আমার নিজের বাবার মতোই। তাঁর বাড়িতে কাজ করতে আমার ভালো লাগে। তাঁকে ছেড়ে চলে যাওয়ার কথা আমি ভাবতেই পারি না।' শুধু তাই নয়, বেবিকে কেউ 'লেখিকা' বললে তিনি বরং বিব্রতই বোধ করেন। বেবি বলেন, 'আমি সামান্য পরিচারিকা মাত্র'।
সে তিনি যা-ই বলুন, পাঠক তাঁকে চেনে এক অসামান্য আত্মকাহিনির লেখিকা হিসেবেই। নিজের প্রথম জীবনে অজস্র যন্ত্রণা সহ্য করতে হয়েছে তাঁকে। কিন্তু এখন পাঠক আর সমালোচকদের ভালবাসা আর শ্রদ্ধায় পরিপূর্ণ তাঁর বেঁচে থাকা। নিজের জীবনকে কীভাবে সৎ প্রচেষ্টার মাধ্যমে দুর্ভাগ্যের অন্ধকার থেকে আলোর দিকে নিয়ে যাওয়া যায়, তারই এক জীবন্ত দৃষ্টান্ত বেবি হালদার। সেই সঙ্গে বহু মানুষের অনুপ্রেরণাও তিনি। 
কুর্নিশ তাঁকে।


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

निषिद्ध होने लगा शरणार्थी,रंगभेदी अभियान में प्रियंका चोपड़ा भी शामिल? इसके उलट डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेद के खिलाफ छह नोबेल विजेताओं ने जारी किया बयान Amid debate, all 2016 American Nobel laureates are immigrants पलाश विश्वास


निषिद्ध होने लगा शरणार्थी,रंगभेदी अभियान में प्रियंका चोपड़ा भी शामिल?

इसके उलट डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेद के खिलाफ छह नोबेल विजेताओं ने जारी किया बयान

Amid debate, all 2016 American Nobel laureates are immigrants

पलाश विश्वास

डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेदी चुनाव अभियान में आप्रवासियों,शरणार्थियों और बाहरी लोगों के खिलाफ जारी घृणा अभियान के खिलाफ 2016 के अमेरिका के सभी छह नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने बयान जारी किया है ,जिनमें से किसी का जन्म अमेरिका में नहीं हुआ है।गौरतलब है कि अमेरिका में सन 2000 से लेकर जिन 71 लोगों ने नोबेल पुरस्कार जीते,उनमें से चालीस ऐसे हैं,जिनका जन्म अमेरिका में नहीं हुआ है।

इन छह नोबेल विजेताओं के मुताबिक आप्रवासी नहीं होते तो अमेरिका बनता ही नहीं है।गौरतलब है कि अमेरिका और लातिन अमेरिका में मूलनिवासियों के ध्वंस पर इंग्लैंड से भगाये गये अपराधिक तत्वों ने कोलबंस के जलदस्युओं की फौज द्वारा इंका और माया सभ्यताओं के विनाश के बाद अश्वेतों को गुलाम बना लिया और रंगभेदी श्वेत वर्चस्व का सत्ता वर्ग खुद बाहरी होते हुए मूलतः अश्वेतों को आप्रवासी,बाहरी और शरणार्थी करार दे रहा है।

The Hill ने इस सिलसिले में खबर ब्यौरे वार छापी हैः

In a year in which Republican presidential nominee Donald Trump is proposing a crackdown on immigration, all six of the 2016 American Nobel laureates announced to date are immigrants.

"I think the resounding message that should go out all around the world is that science is global," Sir J. Fraser Stoddart, one of three laureates in chemistry, told The Hill on Monday.

Stoddart, born in Scotland, credited American openness with bringing top scientists to the country. He added, however, that the American scientific establishment will only remain strong "as long as we don't enter an era where we turn our back on immigration."

Stoddart said the United States should be "welcoming people from all over the world, including the Middle East."

Stoddart naturalized as a U.S. citizen in 2011, but said he would likely not vote on Nov. 8.

"I find it very difficult to handle the situation and certainly don't have much time to think about it between now and December when I go to Stockholm," said Stoddart, a researcher at Northwestern University, who won the prize in chemistry in collaboration with Jean-Pierre Sauvage and Bernard Feringa, French and Dutch researchers. They won their prize for "for the design and synthesis of molecular machines."

Trump has focused his campaign on immigration and the revocation of free trade deals, targeting globalization as a movement that "has left millions of our workers with nothing but poverty and heartache." The billionaire has proposed strengthening immigration laws and "extreme vetting" of potential immigrants from countries with a history of terrorism.

"It's particularly pertinent to have these discussions in view of the political climate on both sides of the pond at the moment," said Stoddart. "I think the United States is what it is today largely because of open borders."

Stoddart added that political leaders today are not "people of the times."


साभारः http://thehill.com/latino/300237-all-american-2016-nobel-prize-honorees-are-immigrants



यही किस्सा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का है।पूरे अफ्रीका और लातिन अमेरिका,मध्य अमेरिका का है।

भारत विभाजन करने वाले लोग भारत में भी शरणार्थियों का सफाया करने में लगे हैं तो सीमापार से कहीं ज्यादा शरणार्थी जल जंगल जमीन से बेदखल इस देश के आदिवासी,दलित और पिछड़ों के साथ आम जनता है और यही मुक्त बाजार के सबसे अच्छे दिन हैं।

दक्षिण अफ्रीका के इस रंगभेद के खिलाफ अश्वेत जनता ने दशकों से आंदोलन जारी रखकर आजादी हासिल की है।

भारत में भी रंगभेदी वर्चस्व कुल मिलाकर विदेशी वर्चस्व है,जिसके तहत आम जनता को आजादी अभी हासिल नहीं हुई है और भारत में भी जल जंगल जमीन, आजीविका और नागरिकता से मूलनिवासी बहुसंख्य अश्वेत जनता बेदखल होते जा रहे हैं।शरणार्थी भारत में भी निषिद्ध हैं।

इसी बीच बालीवूड की तरह हालीवूड में धूम मचाने वाली हमारी प्यारी अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा में ने हाल में एक बड़ा धमाका कर दिया है।

एक प्रमुख लाइफस्टाइल मैगजीन के कवर पर वह जो टाप पहनकर प्रगट हुई हैं,उस पर चार शब्द लिखे हैं।शरणार्थी,आप्रवासी,बाहरी और सैलानी।सैलानी शब्द को छोड़कर बाकी तीनों शब्द लाल स्याही से काट दिये गये हैं।

प्रियंका ने Conde Nast Traveller के कवर पर छपी यह त्सवीर सोशल मीडिया पर शेयर किया है।गौरतलब है कि अमेरिका और ब्रिटेन में ये तीनों शब्द निषिद्ध होने को हैं तो भारत में भी शरणार्थी शब्द को निषिद्ध माना जाता है।

डोनाल्ड ट्रंप के रंगभेदी चुनाव अभियान के अलावा यह अमेरिका और इंग्लैंड में रंगभेदी श्वेत प्रभुत्ववाद के पक्ष में जा री एक कु क्लाक्स अभियान है,जिसमें प्रियंका जाने अनजाने शामिल हो गयी हैं।

ट्विटर पर यह तस्वीर जारी करने के बाद प्रियंका को बड़ी संख्या में लोग इलीटिस्ट,आफेनसिव और इनसेनसिटिव कह रहे हैं।

दरअसल शरणार्थियों के खिलाफ यह रंगभेदी कुलीनत्व,आक्रामक रवैया और संवेदनहीनता दुनियाभर में सामंती और साम्राज्यवादी रंगभेदी सत्ता वर्चस्व का चरित्र है,जो पहले युद्ध,गृहयुद्ध और आतंकवाद के जरिये शरणार्थी पैदा करता है और फिर उनके सफाये को लिए कोई कसर नहीं छोड़ता।

अब प्रियंका की सफाई आने से पहले उस पत्रिका की ओर से कहा गया है कि वह दरअसल इन तीन शब्दों को लेकर मचे बवाल के उलट सीमाओं की सारी दीवारें तोड़ने की मुहिम में शामिल हैं।

गौरतलब है कि सीमाओं को खत्म करना मार्क्सवादी एजंडा रहा है तो राष्ट्र व्यवस्था को सर्वशक्तिमान करके नागरिकता, मनुष्यता और प्रकृति को तहस नहस करके,उत्पादन प्रणालियों और अर्थ व्यवस्थाओं पर काबिज वैश्विक मुक्तबाजार भी सीमाएं नहीं चाहता,बाजार पर राष्ट्र का नियंत्रण नहीं चाहता,संविधान और कानून का राज नहीं चाहता,क्रय क्षमता ही इस मुक्तबाजारी उदारवाद के लिए न्याय और समता है।

गौरतलब है कि  अपने चुनाव अभियान की शुरुआत से ही ट्रंप मुसलमानों और सीरियाई शरणार्थियों के अमेरिका में प्रवेश पर पाबंदी की मांग करते रहे हैं।अमेरिका के राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन दावेदार डोनाल्ड ट्रंप के बेटेडोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने सोमवार रात एक तस्वीर ट्वीट किया, जिसमें सीरियाईशरणार्थियों की तुलना स्किटल्स (फलों के स्वाद वाली कैंडी) से की गई है।

गौरतलब है कि अमेरिकी चुनाव के पहले राष्‍ट्रपति पद के उम्‍मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प और हिलेरी क्लिंटन के बीच दूसरी टीवी डिबेट समाप्त हो चुकी है। इस डिबेट में ट्रंप और हिलेरी ने एक दूसरे को ई-मेल्स, सेक्स कांड, सीरिया, रूस और आईएस जैसे मुद्दों पर जमकर घेरा। सेंट लुईस की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में डिबेट शुरू होने से पहले जब दोनों नेता मंच पर आए तो उस वक्‍त दोनों ने हाथ तक नहीं मिलाया। ट्रंप ने अपनी भाषण की शुरुआत करते ही कहा कि हिलेरी के दिल में उनके लिए हद से ज्यादा नफरत है। वहीं हिलेरी ने भी ट्रंप को लेकर कहा कि वो राष्‍ट्रपति बनने लायक नहीं है।

ट्रंप ने मांग की कि हिलेरी 33000 ईमेल डिलीट कर देने पर माफी मांगें। हिलेरी पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2009-2013 के दौरान ओबामा की प्रमुख राजनयिक रहते हुए निजी ईमेल का इस्तेमाल किया और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला। कुल 90 मिनट की बहस में हिलेरी ने जोर देकर कहा कि उन्होंने ईमेल के मुद्दे पर गलती की है और वह इसकी जिम्मेदारी लेती हैं। इसके अलावा, राष्ट्रपति पद की डेमोकेट्रिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिका में मुस्लिमों का प्रवेश प्रतिबंधित करने की डोनाल्ड ट्रंप की योजना को लेकर आज उन्हें आड़े हाथों लिया और कहा कि (मुस्लिम) समुदाय के बारे में उनकी 'भड़काऊ भाषणबाजी' में उलझना 'अदूरदर्शी' और 'खतरनाक' होगा।

मैडम हिलेरी ने कहा कि राष्ट्रपति बनने पर वह ऐसे किसी व्यक्ति को देश में नहीं रहने देंगी, जो उनके हिसाब से अमेरिका के लिए खतरा होगा लेकिन बहुत से शरणार्थियों को…जिनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे होते हैं…उन्हें सिर्फ इस आधार पर अमेरिका में प्रवेश देने से इंकार नहीं किया जा सकता कि वे मुस्लिम हैं। उन्होंने कहा, 'लेकिन हम जांच करवाएंगे। हमारे पेशेवरों, खुफिया जानकारी के विशेषज्ञों और अन्य की ओर से इस जांच को जितना कड़ा करने की जरूरत होगी, इसे किया जाएगा।


अमेरिका सीमाओं के आर पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ है और  पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर भारत की सर्जिकल स्ट्राइक को अमेरिकी विदेश विभाग जायज बता रहा है।तो पाकिस्तान ने अमेरिकाको पतनशील साम्राज्यवाद कहा है।इस कूटनीतिक लड़ाई में अमेरिका किस हद तक भारत का साथ देगा,यह समझने वाली बात है।

अमेरिकी विदेश विभाग के हालिया बयान भारत पाक युद्ध परिस्थितियों को युद्धोन्माद में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।दुनियाभर में अमेरिकी की इस पुलिसिया विदेश नीति की असली वजह उसकी युद्धक अर्थव्यवस्था है,जो संकट में है और दुनियाभर में हथियारों के बाजार में कड़ी प्रतिद्वंद्विता से अमेरिका मंदी की चपेट से अभी निकला नहीं है।उसकी अर्थव्यवस्था अभी तेलकुंओं में फंसी है।

अब हम उनके आर्थिक हितों के लिए उनकी मर्जी से अपने पड़ोसी के साथ सीधे युद्ध शुरु करें तो भारत पाक युद्ध का नतीजा चाहे कुछ हो,उससे अमेरिका को सबसे ज्यादा फायदा होना है।

अमेरिकी विदेश नीति भी उसकी अर्थ व्यवस्था की तरह युद्धक है,जो दुनियाभर में शरणार्थी समस्या की असल वजह है।

मजे की बात है कि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा वहां की शरणार्थी आबादी है तो यूरोपीय समुदाय से बाहर निकलने के लिए ब्रिटेन के ब्रेक्सिट का विकल्प अपनाने के पीछे भी इंग्लैंड समेत समूचे यूरोप में शरणार्थी सैलाब है।

डोनाल्ड ट्रंप जीते या फिर मैडम हिलेरी,अमेरिका में आप्रवासी जनता के खिलाफ रंगभेदी हिंसा का सिलसिला तेज होना है तो इंग्लैंड के यूरोपीय समुदाय से बाहर निकलने के बाद दुनियाभर में तमाम सीमाएं शरणार्थियों के लिए सीलबंद होना है।

दूसरी तरफ,इन्हीं ब्रिटेन और अमेरिका की अगुवाई में समूचे मध्यपूर्व,दक्षिण पूर्व एशिया,मध्य और लातिन अमेरिका,अफ्रीका,पूर्व और पश्चिम एशिया में युद्ध और गृहयुद्ध के खेल और कारोबार का वैश्विक मुक्तबाजारी वसंत की वजह से दुनियाभर की तमाम देशों में सीमाओं के आर पार नक्शों में भारी उथल पुथल,बंटवारा,विखंडन और प्राकृतिक संसाधनों की अबाध लूटपाट और इस विध्वंस को अंजाम देने के लिए दुनियाभर में अमेरिकी सुनियोजित आतंकवादी हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ युद्ध की अबाध पूंजी प्रवाह से पल दर पल मनुष्यता शरणार्थी में तब्दील हो रही है।

जाहिर है,तमाम देशों में शरणार्थियों के लिए सीमाएं सीलबंद कर देने से शरणार्थी समस्या सुलझने वाली नहीं है।बेदखली,लूटपाट,आतंकवाद,युद्ध और गृहयुद्ध का कारोबार अब विश्वव्यवस्था है तो जब जब प्रकृति का विध्वंस होना है,जब जब मनुष्यता सीमाओं के आर पार लहूलुहान होनी है,शरणार्थी सुनामी तेज होनी है,जिससे अब अमेरिका और इंग्लैंड की भी रिहाई असंभव है।


--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

Wednesday, October 12, 2016

দৈনিক যুগসঙ্খ পত্রিকায় নিখিল.ভারত বাঙালি.উদ্বাস্তু সমন্বয়.সমিতির সংবাদ। ১৩/১০/২০১৬ Thanks Bangla dainik Jugasankha which is echoing the voices of Indian Bengali Refugees countrywide continuously!Refugees have no space elsewhere in Bangla Print or Electronic media. Nikhil Bharat Udvastu Samanyaya Samiti .thus,urges all refugees to read Jugasankha daily. Thanks Jugashankha editor,editorial and reporting team for this long waited support from any Bengali Media.Thanks Raktim Dash,our brother!

দৈনিক যুগসঙ্খ পত্রিকায় নিখিল.ভারত বাঙালি.উদ্বাস্তু সমন্বয়.সমিতির সংবাদ। ১৩/১০/২০১৬

Thanks Bangla dainik  Jugasankha which is echoing the voices of Indian Bengali Refugees countrywide continuously!Refugees have no space elsewhere in Bangla Print or Electronic media. Nikhil Bharat Udvastu Samanyaya Samiti .thus,urges all refugees to read Jugasankha daily.

Thanks Jugashankha editor,editorial and reporting team for this long waited support from any Bengali Media.Thanks Raktim Dash,our brother!



নিখিল ভারতের আন্দোলনের ফলে আসামের ভাষা শহীদদের সম্মানে কর্ণাটকে এবং ছত্তীশগড়ে বাংলা ভাষার অধিকার ছিনিয়ে নিল ভিটেহারা বাঙালিরা! মাতৃভাষার অধিকার থেকে যারা বন্চিত, তাঁরা হিন্দীতে বললে,লিখলেই কুলাঙার- যারা হিন্দি সিনেমা, সিরিয়ালে গানের সঙ্গ যুক্ত তাঁরা কি? যারা স্বভাব ইংরেজ তাঁরা? আমি চাই ভারতবর্ষের বাইশিটি রাজ্যের উদ্বাস্তু সন্তানদের মাতৃভাষার জন্য আমরণ লড়াই যার ফলে অন্�

নিখিল ভারতের আন্দোলনের ফলে আসামের ভাষা শহীদদের সম্মানে কর্ণাটকে এবং ছত্তীশগড়ে বাংলা ভাষার অধিকার ছিনিয়ে নিল ভিটেহারা বাঙালিরা!
মাতৃভাষার অধিকার থেকে যারা বন্চিত, তাঁরা হিন্দীতে বললে,লিখলেই কুলাঙার- যারা হিন্দি সিনেমা, সিরিয়ালে গানের সঙ্গ যুক্ত তাঁরা কি? যারা স্বভাব ইংরেজ তাঁরা?
আমি চাই ভারতবর্ষের বাইশিটি রাজ্যের উদ্বাস্তু সন্তানদের মাতৃভাষার জন্য আমরণ লড়াই যার ফলে অন্ততঃ আমার মত কুলাঙার তাঁদের যাতে না হতে হয়।
পলাশ বিশ্বাস
ভারত ভাগের বলি বাঙালিরা কতটা বাঙালি,তা আমার জানার কথা নয়।দেশ ভাগ তাঁদের শুধু ভিটেছাডা়,দেশ ছাড়া,নাগরিকত্ব ছাড়া করেনি,তাঁদের বাঙালিত্বও ছিনিয়ে নিতেও তেমন কসুর করেনি।দেশভাগের ফলে প্রথমতঃ পূব বাংলা থেকে উত্খাত হওয়ার পর পরই পশ্চিম বঙ্গ থেকে বিতাড়িত হওয়ার পর ভিটে মাটি নাগরিকত্ব,পরিচয়ের সঙ্গে সঙ্গে তাঁদের মাতৃভাষা আ মরি বাংলাভাষার অধিকারও ছিনিয়ে নেওয়া হয়েছে।যদিও তাঁরা আসামে এবং ত্রিপুরায় প্রথম থেকেই মাতৃভাষায় লেখাপড়া করার অধিকার পেয়েছে।ত্রিপুরায় তাঁরা বহুসংখ্য কিন্তু আসামে মাতৃভাষার অধিকারের জন্য রাজপথে রাঙিয়ে যে বাঙালিরা বাংলাদেশের ভাষা আন্দোলনের চাইতে কোনো অংশে কিছু কম মাতৃভাষা প্রেম প্রমাণিত করন নি,সেই আসামে এবং ত্রিপুরায় বাংলা ভাষা চর্চার কতটা স্বীকৃতি পশ্চিম বঙ্গ অথবা বাংলাভাষা দিয়ে থাকে,তার উল্লেখ না করেই বলতে পারি,বাংলাভাগের অনেক আগে থাকতেই সংযুক্ত বিহারে রাতিমত বাংলাভাষার চর্চা ছিল।শুধু তাই নয়,শরত্ চন্দ্র, বিভুতিভূষণ বন্দোপাধ্যায়, বিধান রায়, সুবোধ রায়, বনফূলসহ অনেক বরেণ্য বাঙালিরা বিহার থেকেই বাংলা সাহিত্যে,বাংলা সংস্কৃতিতে এবং বাংলার রাজনীতিতে গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা গ্রহণ করেছেন।সে সুযোগ বাংলার ইতিহাস ভূগোল থেকে বহিস্কৃত উদ্বাস্তু বাঙালিদের নেই।
বাংলার বাইরের বাঙালিদের বাঙালিত্ব বোঝাতে গেলে একটি উদাহরণই বোধ হয় যথেষ্ট, বিধান রায় বিহার থেকে বাংলায় এসে বাংলার যশশ্বী মুখ্যমন্ত্রী হয়েছিলেন,অথচ দন্ডকারণ্য থেকে বাংলা মায়ের ডাক শুনে পশ্চিমবঙ্গে এসে সুন্দরবনের মরিচঝাঁপিতে তাঁদের উদ্বাস্তু বাঙালিদের  বাঙালি আধিপাত্যবাদের বলি হতে হল গুলি খেয়ে,বাঘের খাদ্য হয়ে।সেই গণসংহারের আঝ অবধি কোনো তদন্ত হয় নি।বিচারের বাণী নিভৃতে শুধু কাঁদে।
শিশুদের পানীয় জলে এই বাঙালিত্বের শাসকেরা সেদিন বিষ মিশিয়ে দিয়েছিল।
তাঁদের মৃতদেহ বাদাবনের নদীবক্ষে ভাসিয়ে বাঘ ও কুমিরের খাদ্যে পরিণত করেছিল।
নন্দীগ্রাম অথবা সিঙ্গুর অথবা জঙ্গলমহলের অনেক আগে হার্মাদবাহিনী  সেই গণ সংহারের বোধন উত্সবে উদ্বাস্তু মায়েদের ঠিক তেমন করেই আবার ধর্ষিতা করে দিয়েছিল,বেইজ্জত করেছিল.যেমনটা দেশভাগের আগে ও পরে সীমান্তের ওপারে হতে হয়েছিল এবং হতে হয়।যার কোনো প্রতিকার .বিচটার কোনোদিন হয়নি,হয়না।
বাঙালি উদ্বাস্তুদের নিয়তি বিপর্যয়ের আরেকটি উদাহরণ দিতেই হয়,ভারত ভাগের বলি হয়ে জেনারেল মুশার্রফ যেমন নয়া দিল্লী থেকে মুহাজির পরিচয় বহন করে পাকিস্তানের রাষ্ট্রপতি হয়েছেন,তেমনিই কোনো এক ডঃ মনমোহনসিং ভারতের প্রধানমন্ত্রী হয়েছেন পাকিস্তান থেকে আগত শরণার্থী পরিবারের সন্তান হয়েও।কোনো এক লালকৃষ্ণ আদবাণী ভারতের উপ প্রধানমন্ত্রী হয়েছেন এবং এখনো তিনি ভারতবর্ষের প্রধানমন্ত্রী বা রাষ্ট্রপতি হলেও হতে পারেন।
অথচ বাংলাদেশ এবং পশ্চিমবঙ্গ থেকে বাইরে ভারতবর্ষের মোট বাইশটি রাজ্যে আসাম এব ত্রিপুরা বাদে কোথাও এই উদ্বাস্তু বাঙালিদের একজন এমএলএ বা একজন এমপি হয় না।জনসংখ্যা অনুপাতে তাঁদের কোনো রাজনৈতিক প্রতিনিধিতত্ব যেমন পশ্চিম বঙ্গে নেই তেমনি সারা ভারতে তাঁদের ভোটে তাঁদের কোনো জন প্রতিনিধি নির্বাচিত হয় না।
দন্ডকারণ্যে এবং উত্তরাখন্ডের একটি দুটি সীটে তাঁরা যখন একতাবদ্ধ হয়ে নিজেদের এমএলএ নির্বাচিত করতে পারলেন ,তখন সেই সীটগুলিতে বাঙালি ভোট ভাগ করে দেওয়া হল নূতন বিন্যাসে।উড়াষ্যার মালকানগিরি ও ছত্তিশগড়ের পাখানজোড়ে আশি শতাংশ বাঙালি ভোট থাকা সত্বেও সেই সীটগুলি আদিবাসীদের জন্য সংরক্ষিত করা হল উদ্বাস্তু বাঙালিদের বিধানসভায় ঢোকা নিষিদ্ধ করতে।
বলা বাহুল্য,আসাম,ত্রিপুরা এবং উড়ীষ্যা ছাড়া বাংলাদেশ ও পশ্চিমবঙ্গের বাইরে বাঙালি উদ্বাস্তুদের বাংলায় লেখা পড়ার সুযোগ ছিল না বা নেই।আসামে কাছাড়ের ভাষা শহীদদের মাতৃভাষা আন্দোলনের ফলে বাংলা ভাষার অধিকার স্বীকৃত হয়।কিন্তু ত্রিপুরা,উড়ীষ্যা ছাড়া অন্য কোথাও সেই অধিকার বাঙালি উদ্বাস্তুদের নেই।কিন্তু মাতৃভাষার দাবি নিয়ে তাঁদের আন্দোলন কোনো দিনও থামেনি।কিন্তু সেই দাবি আদায়ের সাগঠনিক ক্ষমতা উদ্বাস্তুদের হয়নি।
এখন হয়েছে।ইতিমধ্যে নিখিল ভারত উদ্বাস্তু সমন্বয় সমিতির আন্দোলনে বাইশটি রাজ্যে বাঙালি উদ্বাস্তুরা সংগঠিত হয়েছে।তাই কর্নাটকে রক্ত না ঝরিয়েও বাংলা এখন দ্বিতীয রাজভাষা।ছত্তিশগড়ের পাখানজোড়ে নিখিল ভারতের নেতৃত্বে লাখোলাখ উদ্বাস্তু বাঙালিদের আন্দোলন এবং আমরণ অনশনের ফলে আগামী সেশান থেকে বাংলা পড়ার অধিকার মিলছে।তাঁরা এখন অন্যান্য অধিকারও আদায় করে নেবে,আমার দৃঢ় বিশ্বাস।
বাংলায় বা বাংলাদেশে ঔ ভিটেছাড়া বাঙালিরা এসে যখন তাঁদের রক্তে মেশা বাংলা ভাষায় কথা বলেন,তখন তাঁদের ভিন রাজ্যের ভিন ভাষার টান নিয়ে সমালোচনা হয়। প্রথাগত শিক্ষা না থাকার ফলে নিজের রাজ্যে বাংলা ভাষা চর্চা করলেও সেই বাংলার স্বীকৃতি বাংলাদেশ এবং পশ্চিমবঙ্গ দেয় নি।এমনকি আসাম এবং ত্রিপুরার বাংলাভাষা চর্চা সম্পর্কে বাংলাদেশ বা পশ্চিমবঙ্গে আজ অবধি কোনো গবেষণার কথা আমার জানা নেই।
আমরা বিভিন্ন রাজ্যে ভিন ভিন ভাষার মাধ্যমে পড়াশুনা করেছি।হিন্দি ও ইংরেজি মাধ্যমে সবচেয়ে বেশি।যে বিহারের, ঝাড়খন্ডের অবদান বাংলা সাহিত্যে সব চেয়ে বেশি স্বীকৃত, সেখানেও উদ্বাস্তু ছেলেমেযেদের বাংলা শেখার সুযোগ নেই।আজ পশ্চিম বঙ্গেও চাকরি ও জীবিকার প্রয়োজনে মাতৃভাষা ছেড়ে ইংরেজি ও হিন্দী মাধ্যমে পড়াশুনা কম হচ্ছে না।কিন্তু পশ্চিমবঙ্গের ক্ষেত্রে স্বেচ্ছায মাতৃভাষা ববহলা ও অসম্মান মেধা বিকাশের পরিচয়,অথচ বাংলার বাইরে মাতৃভাষার অধিকার থেকে বন্চিত মানুষরা যে ভাষা জানেন,সেই ভাষায় কথা বললে বা লিখলেই মাতৃভাষার অবহেলা ও অসম্মান ঘটে। দেশভাগের দায়ী যারা ,তাঁরাই বাঙালিত্বের সর্বশ্রেষ্ঠ সন্তান,অথচ দেশ ভাগের বলি যারা,দেশভাগের ফলে তাঁদের এই ভাষা বিপর্যয়ের দজন্য তাঁরাই কুলাঙার।আমদার বাংলা লেখার সুযোগ হযনি,তাই বলে কি নিজেদের কথা অন্য ভাষায় বলা বা লেখা আমদাদের অপরাধ,তাহলে সেই অপরাধকর্মই আমার জীবন ও জীবিকা।
আমরা বাংলা ভাষায় লেখা পড়ার সুযোগ পাইনি।যে রাজ্যে আমাদের জন্ম সেই রাজ্যের ভাষা আমাদের শিখতে হয়েছে এবং জীবনজীবিকার যাবতীয সমস্যা নিয়ে সেই সব ভাষায় কথা বলতে হয়েছে,লিখতে হয়েছে,কিন্তু আমরা মাতৃভাষাকে অবজ্ঞা যেমন করিনি, অবহেলাও তেমনি করিনি।
বাইশটি রাজ্যের সবকটি বাঙালি উপনিবেশে কম বেশি বাংলা চর্চা প্রথাগত শিক্ষা ছাড়া ভারত ভাগের পর থেকেই চলছে এবং সেখানে যারা থাকেন তাঁরা বাংলা ভাষা এবং বাংলা সংস্কৃতি ভোলেননি।জাত পাঁতে বা ধর্মে নয়,বাঙালিত্বেই তাঁদের পরিচয়।যদি বাঙালিত্বর শিকড় কোথাও খুঁজতে হয,তা আছে এই সমস্ত ভিটেহারা মানুষদের জীবনে, জীবিকায়, জীবন যন্ত্রণায়।তাঁদের মধ্যে একবার কষ্ট করে গিয়ে দেখতে পারেন।
প্রথাগত শিক্ষা না থাকার ফলে মাইকেল মধুসূদন দত্ত.ড.অশোক মিত্র বা নীরদ সি চৌধুরির সমকক্ষ হয়ে অন্নান্য ভাষায় শিক্ষা সত্বেও বাংলায় লিখে সাডা় ফলার ক্ষমতা বা প্রতিভা আমাদের নেই।অন্ততঃ আমার নেই।আমি মাইকেলের মত রাতারাতি ইতিহাশ ভাঙা ভাষায়.ছন্দে ,ভঙ্গিমায় কোনো কাল লিখতে পারব না।এখন সে সুযোগ যেমন নেই,সময়ও আমার নেই।আমাকে জীবিকার প্রয়োজনে নিযমিত হিন্দী ও ইংরেজিতে লিখতেই হবে।শখের বাংলা লেখার সুযোগ ও সময় আমার নেই।আমি যা পারি তাই দিয়েই আমি আমারা মানুষদের জন্য আমৃত্যু লড়ে যাব।যে কোনো ভাষাই আমার মাতৃভাষা,সব ভাষাকেই আমি সম্মান করি এবং সব ভাষাতেই আমি লেখা পড়া করতে চাই,যদিও সেই মেধা,শিক্ষা,দক্ষতা বা ক্ষমতা কোনটাই আমার নেই ।তবু আমি যেমন করেই পারব,সবাই আমার সঙ্গে বিচ্ছেদ করলেও আমি আমার মানুষদের কথা বলা,লেখা বন্ধ করছি না।
তাছাড়া,সারা পৃথীবীর বাঙালিদের সঙ্গে নাড়ীর টান থাকলেও সারা ভারতে ছড়িয়ে ছিটিয়ে থাকা,এমনকি এই পশ্চিম বঙ্গেও খালধারে বিলধারে রেলধারে বাদাবনে বসতি করে থাকা পূব বাংলার ভিটেহারা ভারতভাগের বলি,পোকা মাকড়ের মত বেঁচে থাকতে বাধ্য  মানুষদের জীবন যন্ত্রণার কোনো খবর বাংলা কাগজে হয় না,জীবনের কোনো ক্ষেত্রেই তাঁদের প্রতিনিধিত্ব নেই এমনকি রাজনীতিতেও নেই।
ইদানীং যুগশঙ্খে নিযমিত বাংলা ও বাংলার বাইরের ভিটেহারা আখ্যান প্রকাশিত হচ্ছে।অন্যত্র কোথাও নয়।
আমি একজন সাংবাদিক।নৈনীতালে আমার জন্ম।আমি ইন্ডিয়ান এক্সপ্রেসের মত কাগজে পচিঁশ বছর সম্পাদকীয় বিভাগে কাজ করেছি।বলা বাহুল্য,সারা ভারতের উদ্বাস্তু সন্তানদের মত বাংলা ভাষায় আমার প্রথাগত শিক্ষা বা দক্ষতা কোনটাই নেই।সেই অর্থে  আমার মত অতি সাধারণ মেধার মানুষের পক্ষে বাংলায় পচিঁশ বছর বসবাসা করার পরও বাংলা পড়ার যথেষ্ট সুযোগ থাকা সত্বেও বাংলায় লেখার কোনো সুযোগ আদৌ হয়নি।
আমি হাইস্কুল পর্যন্ত হিন্দী ও তারপর ইংরেজী মাধ্যমে পড়াশুনা করেছে।1973 সাল থেকে আমি সংবাদপত্রে নিযমিত লিখে চলেছি হিন্দিতে এবং ইংলিশে।
আমার হিন্দী ও ইংলিশে লেখা সিংহভাগ লেখাই উদ্বাস্তু সমাজ নিযে,যা বাংলা সাহিত্যে ,সিনেমায় বা সাংবাদিকতায় রীতিমত নিষিদ্ধ বিষয়।এই অপরাধে ঋত্বিক ঘটকের মত অসামান্য একজন মানুষ বাংলা থেকে বিতাড়িত।উদ্বাস্তুদের জীবন,জীবিকা,সংস্কৃতি, ইতিহাস নিয়ে।বিভিন্ন রাজ্যে তাঁদের সমস্যা ও তাঁদের আন্দোলন নিয়ে।যেমনটা লেখার কোনো সুযোগ আমরা মাতৃভাষা বাংলায় আমি পাইনি।আজ অবধি পাইনি।লিটিল ম্যাগেও নয়।তাহলে যারাআমার লেখা পড়ে,যে ভাষায় পড়ে ,তাঁদের সঙ্গে সেই ভাষায় যোগাযোগ বন্ধ করা আমার পক্ষে একেবারই সম্ভব নয়।
অন্য ভাবে বললে বলতে হয়,হিন্দী বা ইংরেজিতে না লিখলে আমার মানুষদের জীবন যন্ত্রণা নিয়ে কোথাও কিছু লেখা অন্ততঃ আমার পক্ষে সম্ভব ছিল না।এখনো সম্ভব নয়।
তাছাড়া,হিন্দী ও ইংরেজি জানার জন্য আমি চত্রিশ বছর বিভিন্ন  প্রথম শ্রেণীর কাগ্জে সারা ভারতবর্ষে কাজ করেছি এবং সারা ভারতবর্ষে আমার সেই পরিচিতি আছে।উপরন্তু সাংবাদিকতা আজও আমরা জীবিকা।
বাংলা ভাষায় সংবাদিকতায় আমার জীবিকার কোনো সুযোগ নেই। আমি যদি হিন্দীতে লেখা বন্ধ করি,তাহলে আমাকে আমার জীবিকা থেকে বন্চিত হতে হয় এবং উদ্বাস্তুদের জন্য আমি যে দীর্ঘ তেতাল্লিশ বছর লাগাতার লিখথে আসছি, তাও বন্ধ করতে হয়।বাংলা ভাষা তেমন না জনতে পারি,যে ভাষায় আমার লেখা নিয়মতি দৈনিক সংবাদপত্রে এবং সাহিত্যপত্রিকাতেও সারা দেশে প্রকাশিত হয়,সে ভাষায় লেখা বন্ধ করলে আমি আমার মানুষদের ব্যথা কথা সর্বসমক্ষে কিভাবে তুলব,আমি জানিনা।
হিন্দিতে লিখলে দোষ,কিন্তু যারা ইংরেজিতে লেখেন,তাঁরা কি ধোয়া তুলসী পাতা?
হিন্দিতে সাহিত্যচর্চা বা সাংবাদিকতা দোষের,কিন্তি যারা সারা জীবন হিন্দি সিনেমায় কাজ করেন এবং বাংলা বলেনও না,তাঁরাই আবার বাঙালি সংস্কৃতির গৌরব,হিন্দি সিনেমা ও হিন্দী সীরিয়াল বা হিন্দী গান আমাদের প্রাণ,অথচ হিন্দিতে লিখলেই কুলাঙার?
আমিও মনে করি ,সত্যি সত্যিই আমি কুলাঙার যেহেতু আমি ঔ রকম বিশুদ্ধ ঝরঝরে বাংলা লিখতে পারিনা,যেমনটা পশ্চিম বঙ্গ বা বাংলাদেশের বাঙালিরা পারেন।

আমি চাই ভারতবর্ষের বাইশিটি রাজ্যের উদ্বাস্তু সন্তানদের মাতৃভাষার জন্য আমরণ লড়াই যার ফলে অন্ততঃ আমার মত কুলাঙার তাঁদের যাতে না হতে হয়।

--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...