BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Sunday, October 12, 2014

हम अपनी अपनी अस्मिता के नस्लभेदी वर्णवर्चस्वी झंडेवरदार हैं,भारत देश का नागरिक कोई नहीं। वरना मुट्ठीभर दुश्चरित्र धनपशु बाहुबली सांढ़ों की क्या मजाल की भारतमां की अस्मत से खेलें! इस देश में राष्ट्रद्रोही जो तबका है,देशभक्ति उनका सबसे बड़ा कारोबर है।मुनाफाखोर जो पूंजी है,छनछनाता विकास बूंद बूंद आखिरी शख्स तक पहुंचाने का ठेका उसीका है। संविधान खत्म है।लोक गणराज्य लापता है।न लोक है और न लोक गणराज्य। सिर्फ परलोक है और परलोक का धर्म कर्म।न कानून का राज है और न लोकतंत्र है। राष्ट्र और राष्ट्रतंत्र का फर्क खत्म है कर दिया है उन्होंने।राष्ट्र की हत्या करके लाश गायब कर दी है।जो बचा है वह फासिस्ट राष्ट्रतंत्र है और इसका विरोध जो करें,वे ही राष्ट्रद्रोही। पलाश विश्वास

हम अपनी अपनी अस्मिता के नस्लभेदी वर्णवर्चस्वी झंडेवरदार हैं,भारत देश का नागरिक कोई नहीं।
वरना मुट्ठीभर दुश्चरित्र धनपशु बाहुबली सांढ़ों की क्या मजाल की भारतमां की अस्मत से खेलें!
इस देश में राष्ट्रद्रोही जो तबका है,देशभक्ति उनका सबसे बड़ा कारोबर है।मुनाफाखोर जो पूंजी है,छनछनाता विकास बूंद बूंद आखिरी शख्स तक पहुंचाने का ठेका उसीका है।

संविधान खत्म है।लोक गणराज्य लापता है।न लोक है और न लोक गणराज्य। सिर्फ परलोक है और परलोक का धर्म कर्म।न कानून का राज है और न लोकतंत्र है।
राष्ट्र और राष्ट्रतंत्र का फर्क खत्म है कर दिया है उन्होंने।राष्ट्र की हत्या करके लाश गायब कर दी है।जो बचा है वह फासिस्ट राष्ट्रतंत्र है और इसका विरोध जो करें,वे ही राष्ट्रद्रोही।
पलाश विश्वास
हम अपनी अपनी अस्मिता के नस्लभेदी वर्णवर्चस्वी झंडेवरदार हैं,भारत देश का नागरिक कोई नहीं।
वरना मुट्ठीभर दुश्चरित्र धनपशु बाहुबली सांढ़ो की क्या मजाल की भारतमां की अस्मत से खेलें!

आपने बतौर सभ्यता के अनुरुप बहुविवाह,सती प्रथा,बाल विवाह,नरबलि  और पशुबलि का भी परित्याग कर दिया तो असुरों की हत्या की यह रस्म खत्म क्यों नहीं कर सकते,यक्ष प्रश्न यही है और जबाव यह कि कानून के मुताबिक बाध्य नहीं हैं आप।

अगर नरेंद्र भाई मोदी बतौर देश के लोकतात्रिक प्रधानमंत्री यह नरसंहार उत्सव कानूनन बंद करवा दें तो भी क्या आप इसे जारी रख पायेंगे,यकीनन नहीं।

हम भारत देश के लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री से आवेदन करेंगे कि वह फौरन इस कुप्रथा पर रोक लगायें और आवेदन करेंगे कि बाकायदा लोकतंत्र समर्थक इसके लिए कानूनी पहल करें,हस्ताक्षऱ अभियान चलायें।


मित्रों और अमित्रों,माननीय खुशवंत सिंह जी का कालम आपको याद होगा,जिसका शीर्षक हुआ करता था,न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।हमारे सूफी संत बाउल परंपरा का मुहावरा है,बात करुं मैं खरी खरी।

हम इतना बड़ा दावा करने की हैसियत में नहीं हैं।

मेरा ब्लाग लेखन कामर्शियल नहीं है,इसे आप हद से हद रोजनामचा कह सकते हैं।जो न पत्रकारिता है और न साहित्य और न इसकी कोई विशिष्ट विधा है और न ही सीमाबद्ध भाषा।मेरा प्रयास भाषा से भाषांतर होकर देशभर के अपने आत्मीयजनों का संबोधित करने का होता है,मित्रों को और अमित्रों को भी।

धुँआधार गालीगलौज की सौगात बाटने वालों को भी मैं मित्रता से खारिज नहीं करता, बल्कि उनकी असहमति का सम्मान करता हूं।

संयमित अभिव्यक्ति एक कठिन तपस्या का मामला है,आस्थावान और विद्वान हो जाने के बावजूद वह संयम हर किसी से सधता नहीं है।

शब्दों का कोई दोष नहीं होता।इसलिए हर शब्द का सम्मान होना चाहिए।शब्दों का दमन अतंतः विचारधारा की पराजय है। दमन के बाद शब्द फिर शब्द नहीं रहता,एटम बम बन जाता है,जो व्यवस्था की बुनियाद तहस नहस कर देता है।अभिव्यक्ति निषिद्ध करके राजकाज का एक प्रयोग आपातकाल में हो चुका है,और जिन्हें दुर्गावतार कहा गया है,उनका रावण जैसा हश्र भी हुआ है।

राजकाज कायदे से चलाना है तो शासक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने ही हित में सबसे पहले सुनिश्चित करनी चाहिए।आपातकाल का सबक यह है।

संघ परिवार आपातकाल में निषिद्ध रहा है और आपातकाल के बाद संघ परिवार का कायाकल्प हिंदुत्व के पुनरूत्थान में हुआ है जो अब देश दुनिया में ग्लोबल पद्म प्रलय है।आदमघोर बाघ जंगल के कानून की परवाह नहीं करता और प्रकृति के नियम भी तोड़ता है।

सत्ता के दंभ में संघ परिवार का भी हाल आदमखोर बाघ जैसा है।

मसल महिषासुर विवाद है।यह विवाद जेएनयू से शुरु हुआ और इसे जेएनयू तक ही सीमित रह जाना था।लेकिन संघी बजरंगियों के अतिुत्साह से यह विवाद बी ग्लोबल हिंदुत्व की तरह ही ग्लोबल हो गया है।

सुर असुर प्रकरण को भाषा विज्ञान के आलोक में देखें तो यह आर्य अनार्य मामला ही है।नृतात्विक दृष्टि से भी इस देश के मूलनिवासी और शासक तबके के शक्तिशाली लोग भिन्न गोत्र भिन्न नस्ल के हैं।

महिषासुर और दुर्गावतार का किसी भी वैदिकी साहित्य में कोई ब्यौरा हमें नहीं मालूम है।यह महाकाव्यिक आख्यान है या प्रक्षेपण मात्र है।

धर्म से इस मिथक का दूर दूर तक का कोई रिश्ता नहीं है।

अनार्य शिव,अनार्य चंडी जैसे देवदेवियों की तरह दुर्गावतार कोई वैदिकी प्रतिमा नहीं है।

यहीं नहीं,विशुद्ध वैदिकी पद्धति में तो धार्मिक क्रयाकर्म में मूर्ति पूजा को काई इतिहास ही नहीं है।यज्ञ और होम की परंपरा रही है।

मूर्तियों का निर्माण तो हमीं लोगो ने अपने अपने अस्मिता और वर्म वर्चस्व के दावे मजबूत करने के लिए बनाये हैं,जो सिलासिला अब भी जारी है।

लोग अपनी सत्ता के लिए जीते जी अपनी मूर्ति सरकारी पैसा खर्च करके लगवा रहे हैं।

गांधी,अंबेडकर की मूर्तियां तो हैं ही,समता और सामाजिक न्याय के कर्मदूत गौतम बुद्ध से लेकर किसान विद्रोह के नेता बीरसा मुंडा और हरिचांद ठाकुर की मूर्तियां भी हमने बना ली हैं।

हम मूर्ति पूजक नहीं हैं।

हम जन्मजात हिंदू हैं और धर्म के बुनियादी तंत्र चूंकि एक ही है तो धर्म का विकल्प धर्म को मानते भी नहीं हैं।

धर्म अगर निरर्थक है और अगर धर्म सार्थक भी है तो यह निजी मामला है आस्था का।नहीं होता तो हिमालय देवभूमि नहीं बनता और तपस्वी हिमालय के उत्तुंग शिखरों में तपस्या नहीं कर रहे होते,बल्कि बाबाओं की तरह सार्वजनिक प्रवचन से लाखों लाक कमा रहे होते।

हम दुर्गावतार को भंग करके महिषासुर की मूर्ति गढ़ने के खिलाफ रहे हैं और मनते हैं कि इस नये सुरासुर संग्राम से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

चूंकि हम आस्था आधारित नहीं,वर्गीय ध्रूवीकरण को ही मुक्तबाजारी युद्धक अर्थव्यवस्था के सैन्य राष्ट्रतंत्र के तिलिस्म को तोड़ने का एकमात्र रास्ता मानते हैं।

बंगाल में लेकिन दुर्गापूजा विशुद्ध अस्पृश्यता और नस्ली नरसंहार का मामला है और हम इसका पहले भी विरोध करते रहे हैं।

हाल में हुए दुर्गोत्सव में पूजा परिक्रमा में बी बनेदी बाड़ीर पूजो पोकस पर थी और बाकी पुजाओं में कहीं मूर्ति ,कहीं आलोकसज्जा तो कहीं विचित्र पंडाल की परिक्रमा थी।

मुख्यमंत्री ने न सिर्फ देवी को चक्षुदान किया बल्कि सर्वश्रेष्ठ दोवियों को पुरस्कार भी बांटे कंगाल हुए राजकोष से।विशषज्ञों को भुगतान अलग से।

ये बनेदी बाड़ी क्या है,इस पर गौर करना जरुरी है।

ये राजपरिवारों और जमींदारों के वंशजों के उत्तराधिकारियों के महल हैं,जलसाघर की सामंतशाही के अवशेष हैं और महफिलें जजाने के अलावा दुर्गापूजा उनके राजकीय पुरखों ने  ही बौद्धमय बंगाल के अवसान पर राजतंत्र और जमींदारी के तहत निरंकुश नस्ली प्रजा उत्पीड़न के तहत शुरु किया,जिसकी अनिवार्य रस्म नरबलि थी।

अब भी नारियल फोड़कर नरबलि की रस्म निभायी जाती है तो कर्म कांड में गैर ब्राह्मणों को कोई प्रवेश नहीं है।

अब आप इसे कैसे वैदिकी परंपरा बताते हैं जो बंगाल में इस्लाम मनसबदारों ने शुरु किया और बंगाल से लेकर आंध्र,तमिलनाडु,महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश के विध्यांचल तक शूद्र आदिवासी राजाओं को जीत के विजया का उत्सव बना दिया इसे।

किसी वैदिकी साहित्य या सनातन हिंदू धर्म ने नहीं बल्कि शासकीय हित ने पराजित राजाओं को असुर दानव दैत्य राक्षस इत्यादि नाम दिये और श्रीराम के महाकाव्यिक मनुस्मृति कथा के उपाख्यान बतौर दुर्गापूजा को प्रक्षेपित कर दिया।

पराजितों का भी इतिहास होता है।


शासकों के मिथक होते हैं तो प्रजाजनों के मिथक भी होंगे।

मह मिथकों को एकाककार नहीं करते।हम दुर्गावतार के ब्राह्मणी राजवड़िया मिथक और महिषासुर के मिथक को एकाकर नहीं करते।

लेकिन सत्य यह है कि असुर जाति के लोग बंगाल में भी हैं औरदेस काआदिवासी भूगोल तो असुरों का ही है।बंगाल का नाम ही बंगासुर के नाम पर हुआ।

दुर्गोत्सव के दौरान ये लोग उत्सव नहीं,मातम मनाते हैं।

आपने दुर्गा का मिथ बनाया तो इसके तोड़ बतौर वे महिषासुर का मितक बनायेंगे ही।आप दुर्गा की मूर्ति बनाके रहे सदियों से तो वे महिषासुर की पूजा करेंगे ही।महिषासुर को आप जैसे नस्ली भेदभाव से हत्या करते हैं तो वे अपने नजरिये से दुर्गा को पेश करेंगे ही।

फिर वही सुरासुर संग्राम है।

लोकतंत्र और आधुनिक मानवतावादी सभ्यता के तकाजे से आप नरबलि कर नहीं सकते, करेंगे तो कानून के तहत हत्यारा बनकर खुद बलिप्रदत्त हो जायेंगे।

आपने बतौर सभ्यता के अनुरुप बहुविवाह,सती प्रथा,बाल विवाह,नरबलि  और पशुबलि का भी परित्याग कर दिया तो असुरों की हत्या की यह रस्म खत्म क्यों नहीं कर सकते,यक्ष प्रश्न यही है और जबाव यह कि कानून के मुताबिक बाध्य नहीं हैं आप।

अगर नरेंद्र भाई मोदी बतौर देश के लोकतात्रिक प्रधानमंत्री यह नरसंहार उत्सव कानूनन बंद करवा दें तो भी क्या आप इसे जारी रख पायेंगे,यकीनन नहीं।
हम भारत देश के लोकतांत्रिक प्रदानमंत्री से आवेदन करेंगे कि वह फौरन इस कुप्रथा पर रोक लगायें और आवेदन करेंगे कि बाकायदा लोकतंत्र समर्थक इसके लिए कानूनी पहल करें,हस्ताक्षऱ अभियान चलायें।

तो देश में अगर लोकतंत्र है,अगर कानून का राज है,तो बहुसंक्यअसुर समुदायों के नरसंहार के उत्सव को अपना धर्म बताकर आप कैसे हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना बना रहे हैं,यह आपका सरदर्द है,आपका समावेशी डायवर्सिटी है,इसपर हम टिप्पणी नहीं कर सकते

।अगर आपको अपनी आस्था के मुताबिक नरसंहार उत्सव मनाने का हक है तो असुरों को महिषासुर की कथा बंचने से कैसे रोक सकते हैं आप।

हम धर्म अधर्म के पचड़े में नहीं पड़ते और न हम आस्था के कारोबारी हैं।

अस्मिता और भावनाओं से भी इस नर्क को स्वर्ग बनाने का दिवास्वप्न हम देखते नहीं हैं।

हम दुर्गापूजा में नरसंहार संस्कृति के खिलाफ पहले भी लिखते बोलते रहे हैं,लेकिन दुर्गा के मुकाबले महिषासुर के मिथक और उसकी मूर्ति पूजा के बी हम उतने ही विरोधी हैं।

लेकिन जेएनयू में महिषासुर पर्व से पहले जिसतरह फारवर्ड प्रेस पर छापा मारा गया,वह न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है ,बल्कि यह निर्लज्ज,निरंकुश सत्ता के आपातकाल का नस्ली कायाकल्प है और असुर आदिवासी जनता के खिलाफ सैन्य राष्ट्रतंत्र का एक और हमला है।

इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं और ऐसे तमाम भारतीय नागरिक जिनका सुरासुर विवाद से कोई लेना देना नहीं है,वे भी इस संघी फासिज्म का विरोध करने को मजबूर हैं।

जो हमें वाम धर्मनिरपेक्ष खेमे से जोड़कर गरियाते हैं,उलसे विनम्र निवेदन है कि हम मलाला के समर्थक हैं तो भारत में भी किसी को मलाला बानाने की इजाजत नहीं दे सकते।हम घर बाहर स्त्री उत्पीड़न के खिलाफ हैं ,स्त्री अधिकारों के अंध समर्थक हैं

जो हमें वाम धर्मनिरपेक्ष खेमे से जोड़कर गरियाते हैं,उलसे विनम्र निवेदन है कि हम हिंदू राष्ट्रवाद के खिलाफ उसीतरह हैं ,जैसे इस्लमी राष्ट्रवाद के खिलाफ साहबाग के साथ मोर्चाबंद हैं।

जो हमें वाम धर्मनिरपेक्ष खेमे से जोड़कर गरियाते हैं,उलसे विनम्र निवेदन है कि हमने तसलिमा के भारते आने के बाद,उनके निर्वाचित कालम प्रकाळित होने के बाद,लज्जा पर रोक और बांग्लादेश से निष्कासन के पहले से उनके मानवता वादी पुरुषतंत्रविरोधी धर्मविरोधी विचारों के समर्थन को कभी वापस नहीं लिया है और न लेेंगे।

जो हमें वाम धर्मनिरपेक्ष खेमे से जोड़कर गरियाते हैं,उनसे विनम्र निवेदन है कि हम वोटबैंक की राजनीति नहीं करते।और हम पार्टीबद्ध नहीं हैं।हम आजाद देश के आजाद नागरिक की आवाज बुलंद करते रहेगेषनाकाहू से बैर ,न काहू से दोस्ती।

संघ परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे,सबसे अनुशासित,सबसे निष्ठावान ,सबसे प्रतिबद्ध कार्यकर्ता है,धर्मोन्मादी हिंदूराष्ट्र के बजाय वे सही मायने में समाता सामाजिक न्याय के जाकि विहीव वर्गविहीन भार निर्माण का संकल्प लें तो इस देस का भविष्य कुछ और हो नहो,देश बेचो संप्रादाय का खात्मा समझो।

मैं 14 अक्तूबर को कोलकाता से अपने गांव बसंतीपुर जा रहा हूं करीब सात साल के अंतराल के बाद।दिल्ली होकर कोलकाता लौटना होगा पहली नवंबर को।देहरादून जाना चाहता था लेकिन लगता है कि वहां मेरा कोई मित्र है नहीं तो जाने से क्या फायदा।

कमल जोशी अगर कोटद्वार होेंगे,तो वहा जाकर अस्कोट आरोकाट यात्रा का अनुभव उनकी जुबानी सुनने की इच्छा है।

राजीव नयन बहुगुणा से सात के दशक में नैनीताल में मुलाकात हुई थी,लेकिन उनके सुर्खाव के पर तब तक खुले नहीं थे।

उनके पिता हमारे भी बहुत कुछ लगते हैं।

मेरे पिता तो रहे नहीं हैं,उनके पिता के दर्शन की इच्छा भी है।

हो सकता है कि इसी बहाने देहरादून चला भी जाऊं।उनके संगीतज्ञ चरित्र सविता को बहुत अच्छा लगेगा,क्योंक सुर ताल वही समझती हैं।लेकिन सत्ता के साथ अपने नयन दाज्यू के जो संबंध हैं,वैसे संबंध मेरे लिए मुनासिब नहीं है तो थोड़ी हिचक है।

सत्तर के दशक में कब तक सहती रहेगी तराई की वजह से बंगाली इलाकों दिनेशपुर और शक्तिफार्म से मुझे तडिपार होना पड़ा था।अब वे इलाके बजरंगियों के मजबूत गढ़ हैं।

देशभर के संघी मुझे दुश्मन मानने लगे हैं अकारण और इसलिए थोड़ा डर रहा हूं कि कुछ ज्यादा ही बूढाने लगा हूं और पिटने पाटने की नौबत आ गयी तो तेज भागकर शायद ही जान बचा सकूं।

वैसे भी उत्तराखंड में उत्तराखंडी जो थे ,अब ज्यादातर संघी हो गये हैं और उनमें से ज्यादातर बजरंगी है।

नैनीताल भी केसरिया है।डरना तो पड़ता ही है।

इस हिसाब से तो हमारे जैसे लोग कहीं भी सुरक्षित बच नहीं सकते।

हुसैन की तरह नामी भी नहीं हूं कि विदेश भाग जाऊं या दूसरे बड़े लोगों की तरह कोई चुनौतीभरा बयान देकर मीडिया पर छा जाऊं और फिर सरकार सुरक्षा का इंतजाम करें।

तो क्या इस देश में बतौर नागरिक हम कुछ भी कह लिखने को स्वतंत्र नहीं हैं.यह आज का सबसे बड़ा ज्वलंत सवाल है।

फारवर्ड प्रेस की गतिविधियों में मैं शामिल नहीं हूं।जेएनयू केद्रित असिमता युद्ध में हमारा कोई पक्ष नहीं है और न हमारे सरोकार जेएनयू से शुरु या खत्म होते हैं।लेकिन नये नये अस्मिताओं के आविस्कार बजरिये अस्मिताओं में बंटे देश को और ज्यादा बांटने के लिए जेएनयू जैसे तमाम मठों और मठाधीशों को मैंने कभी बख्शा भी नहीं है।

अस्मिताओं को तोड़ने में किसी भी तरह का अस्मिता उन्माद बाधक है।

भावनाओं के विस्फोट से सामाजिक यथार्थ बदलते नहीं है।
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के,सबसे बड़े लोक गणराज्य के स्वतंत्र और संप्रभु नागरिक हैं।

हमारा संविधान सबसे अच्छा है हालांकि अब भी हम इस संविधान के मुख्य कारीगर बाबासाहेब डा. अंबेडकर अब भी अश्पृश्य मानते हैं और आरक्षण के लिए,जातिबद्ध राजनीति के लिए उन्हें जिम्मेदार मानने से परहेज नहीं करते और कुछ दुकानदारों को भारत के संविधान निर्माता के नाम खुल्ला खेल फर्रुखाबाद की इजाजत देते हैं क्योंकि हम भी मानते हैं कि बाबासाहेब सिर्फ दलितों के मसीहा है,जैसे अंबेडकरी नेतागण कहते अघाते नहीं और इसी जुगत से बाबा के एटीएम के दखलदार बने हुए हैं और वे तमाम लोग मजे मजे में हिंदूराष्ट्र के राम श्याम बलराम बरंगबली है।

ब्राह्मण वर्णवर्चस्वी हजारों साल के संस्कार की वजह से है और राष्ट्रतंत्र के मौजूदा नस्ली चरित्र की वजह से भी है।लेकिन बहुजन राम श्याम बलराम बजरंगियों से वे कुछ ज्यादा समझदार हैं क्योंकि वे अमूमन शिक्षित होते हैं और भाषा,ज्ञान और संवाद के हुनर उनमें हैं और आत्मनियंत्रण का संयम भी है।

उनमें संस्कार तोड़ने की क्षमता भी है।हजारों साल से शिक्षा और दूसरी बुनियादी हक हकूक से वंचित जो बहुजन बहिस्कृत जनता है,हिंदुत्व की पैदल सेना बन जाने की वजह से वे ही ज्यादा ज्यादा बजरंगवली हैं।

इस देश में राष्ट्रद्रोही जो तबका है,देशभक्ति उनका सबसे बड़ा कारोबर है।मुनाफाखोर जो पूंजी है,छनछनाता विकास बूंद बूंद आखिरी शख्स तक पहुंचाने का ठेका उसीका है।

संविधान खत्म है।लोक गणराज्य लापता है।न लोक है और न लोक गणराज्य। सिर्फ परलोक है और परलोक का धर्म कर्म।न कानून का राज है और न लोकतंत्र है।

हम अपनी अपनी अस्मिता के नस्लभेदी वर्णवर्चस्वी झंडेवरदार हैं,भारत देश का नागरिक कोई नहीं।वरना मुट्ठीभर दुश्चरित्र धनपशु बाहुबली सांढ़ो की क्या मजाल की भारतमां की अस्मत से खेलें!

राष्ट्र और राष्ट्रतंत्र का फर्क खत्म है कर दिया है उन्होंने।राष्ट्र की हत्या करके लाश गायब कर दी है।जो बचा है वह फासिस्ट राष्ट्रतंत्र है और इसका विरोध जो करें,वे ङी राष्ट्रद्रोही।

Saturday, October 11, 2014

एक अधूरा संवादः मेरठ की भूली बिसरी यादें

एक अधूरा संवादः मेरठ की भूली बिसरी यादें
पलाश विश्वास
मेरठ की ऋचा अग्रवाल ने इस संवाद की शुरुआत की थी और उन्होंने ही इसे अधूरा छोड़ दिया।मेरठ में हम 1984 से 190 तक रहे।कोलकाता आने के बाद एक बार गये मेरठ,फिर जाना नहीं हो सका।अब हमें यह नहीं मालूम कि मेरठ के मित्र कहां किस हाल में हैं।गलती से मेरठ पहुंच गये तो कहां ठहरना होगा,इसका अंदाजा भी नहीं है।


मेरठ, मुरादाबाद, बुलंदशहर,अलीगढ़ और मुजफ्परनगर इस देश के संपन्न किसानों के इलाके रहे  हैं।अब वे इलाके कितने संपन्न हैया नहीं हैं,इसका अंदाजा नहीं है।

मुजफ्परनगर तो अस्सी के दशक में सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला जिला रहा है,जो अब दंगों के लिए याद किया जाता रहा।

मेरठ 1857 की पहली क्रांति के लिए अब कम याद किया जाता है।

मेरठ में शायद अब चौधरी चरण सिंह नाम के देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री और शायद अब तक किसानों के सबसे बड़े नेता को भुला चुका होगा।

महेंद्रसिंह टिकैत नाम के खाप पंचायतों के नेता ने जो राजधानी दिल्ली का घेरा डाला था,उसकी यादें भी अब धूमिल होने लगी है।

जाट आरक्षण आंदोलन का केंद्र बना मेरठ गाजियाबाद भी अब हाशिये पर है।

कपड़ा और चीनी उद्योगों के लिए कभी मशहूर रहा पश्चिम उत्तरप्रदेश की संपन्नता के पीछे खेती का जितना योगदान रहा है,उससे कम कुटीर उद्योगो का योगदान नहीं है।

हापुड़ की मंडी के क्या हाल हैं बता नहीं सकते।चीनी मिलों की चर्चा तो बकाया भुगतान के सिलिसिले में होती है।

मेरठ के हथकरघे शायद अब शांत होगे।

कभी मुरादाबाद और नजीबाबाद के सर्राफ देश में अव्वल होते थे,अब मुरादाबाद की पहचान पीतल नगरी के बजायरामलीलामंडलियों के नगर बतौर या फिर प्रियंका गांधी के ससुराल के लिहाज से ज्यादा होती है।

फिरोजाबाद तक हुनर के अलग अलग उद्योग थे।हमें नहीं मालूम कि अब उन पीछे छूट गये शहरों और गांवों का क्या हाल है।

धर्मोन्माद का जलवा हमने सबसे पहले इसी मेरठ में देखा था।मेरठ में ही मलियाना और हाशिमपुरा से घिरे हुए थे हम।

हम देखते रह गये कि कैसे जनपदों की तबाही की इबारत लिखी जाती रही है और कैसे खुशहाल किसान दंगाई भीड़ में तब्दील कर दिये जाते हैं और कैसे कुटीर उद्योगों के खात्मे के साथ कापोरेट विकास की इमारते तामीर की जाती है।

पश्चिम उत्तरप्रदेश के इलाके हमारे लिए दंगाग्रस्त इंसानी बसेरे नहीं रहे कभी,वे तबाह होते हुए इस देश के संपन्न जनपद हैं।

मेरी यादों में अब भी उनजनपदों की खुशबू बाकी है।

पिछले दिनों अमर उजाला में हमारे साथी रहे हरिशंकर द्विवेदी की पत्नी से लिंकड इन पर बातों का जो सिलसिला चल पड़ा,वह निहायत निजी है और है भी नहीं।

हम उस वक्त की यादों को साझा कर रहे थे,जो दूसरों का वक्त भी रहा है।यादे तेजी से पिर दस्तक देने लगी थीं कि ऋचा यकबयक खामोश हो गयी।

आज इस अधूरे संवाद को हूबहू आप से साझा करके उस खामोशी को तोड़ने की कोशिश कर रहा हूं।

चाहताहूं कि ऋचा जोर से चिल्लाएं कि मैंने ऐसा करके गलत किया और शायद इसी तरह संवाद की बंद खिड़कियां खुले और अंधेरे बियावां से कुछ और आवाजें साथियों की बह निकले कि वह वक्त तो कुछ और ही था।

माननीय पलाश जी,
आप अपना फोन या मोबाइल नंबर भेज देते तो कूरियर पहुंचने में आसानी होती। पीडीएफ के लिये अपना ईमेल भेजियेगा।
शेष फिर

सादर

ऋचा

On 08/15/14 8:50 AM, Palash Biswas wrote:
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तसल्ली वास्ते चूंकि सविता घनघोर पाठक भी है और तुर्रम आलोचक भी और सात ही मेरठ से उसकी संवेदनाओं के तार भी जुड़े हैं,इसलिए हार्डकापी भेज दें तो बेहतर।
पिछले दिनों सविता कह रही थी कि मेरठजायें तो कौन पहचानेगा,लगता है कि यह पहेली अब सुलझ गयी होगी।
मेरा पता हैः
गोस्टोकानन,सोदपुर,कोलकाता-700110
सविता का फोन नंबर 858...है।बातें करेंगी तो मेरठ फिर जी उठेगा।मेरा सेल नंबर 9903717833 है।
मेरा ईमेलः
palashbiswaskl@gmail.com

ऋतुजी,मेरी व्यस्तताएं बेहद बढ़ गयी हैं।मुझे इन दिनों सोलह सत्रह घंटे लगातार लिखने की जरुरत पड़ती है।वैसे आप जानती हू होगी कि कोई मुझे छापता नहीं है।मैंने वैकल्पिक स्पेस बनाया है,जहां कुछ पाठक देश भर के हैं और वे अपनी सामाजिक सक्रियता से इस पाठ को जोड़ते हैं।बांग्लादेश में ही मेरे एक लाख से ज्यादा पाठक हैं तो बांग्ला में भी नियमित लिखना होता है।मेरा बेटा मेरी तरह किसी की गुलामी नहीं करेगा और वह हमारी पुश्तैनी मुहिम में है।हमने अब इंगलिश लेखन उसके जिम्मे किया है।
वक्त बहुत कम है।गुजर बसर करते हुए सक्रिय रहने की मोहलत साल डेढ़ साल तक की है और रिटायर करने के बाद फुटपाथ पर आ जाने की नौबत है।चूंकि बेटा भी कमा नहीं रहा है।इसलिए इसी अवधि में जो कुछ कर सकते हैं,कर रहे हैं।
चूंकि यह आप हैं,इसलिए इतना लंबा लिख रहा हूं।अभी मुझे बांग्ला में अपडेट लगाने हैं।
मुझे थोड़ा बहुत स्मृतिभ्रम भी होने लगा है।मेरठ से पिछले पच्चीस साल तक कोई दस्तक न होने के कारण हाथीदांत में सजे चेहरे भी धूमिल हो गये हैं।
माफ कीजियेगा,मैं भूल गया कि आपसे मेरी मुलाकातें हैं।अब आपके याद दिलाने के बाद तस्वीरें साफ होने लगी हैं।
मुझे याद आया कि सूर्यकात से ऋतु की शादी हुई थी।बाकी दो बहनों की काबिलियत का अहसास होने से मुझे बेहद खुशी हुई है।
आपके संघर्ष की कथा मुझे बहुत याद है।शान शौकत कभी जिंदगी का मकसद होता नहीं है,जो हम हैं,उसे हमेशा सही साबित करने की चुनौती है।
बाकी जिंदगी से कुछ मत मांगिये,बहुत चैन मिलेगा यकीनन।
सुजाता भी याद आ गयी है।
अब पासवर्ड के झमेले में मत डालिए।पीडीएफ भेज दीजियेगा।
तसल्ली वास्ते चूंकि सविता घनघोर पाठक भी है और तुर्रम आलोचक भी और सात ही मेरठ से उसकी संवेदनाओं के तार भी जुड़े हैं,इसलिए हार्डकापी भेज दें तो बेहतर।
पिछले दिनों सविता कह रही थी कि मेरठजायें तो कौन पहचानेगा,लगता है कि यह पहेली अब सुलझ गयी होगी।
मेरा पता हैः
गोस्टोकानन,सोदपुर,कोलकाता-700110


माननीय पलाश जी,
मैने आपको अनेकानेक बार जागरण में देखा व नमस्‍कार हुई है। मुलाकात भी। हरि जी तो आपको अच्‍छे से जानते-बूझते हैं। वह आपके वैचारिक स्‍तर पर किये जा रहे मिशनरी कार्यों से भी अवगत हैं।
मेरी एक बहिन ऋतु मेरठ में है और उनके पति सूर्यकांत इन दिनों हिंदुस्‍तान के संपादक हैं। उससे छोटी बहिन इंडिया टीवी में और सबसे छोटी हिंदुस्‍तान के फीचर सेक्‍शन में मुख्‍य उप संपादक है।
मजदूरी से गुजर वसर चल रही है। आपको याद होगा कि मेरे पापा ने सुजाता पत्रिका का प्रकाशन शुरु किया था लेकिन वह उनकी बीमारी व देहावसान के बाद बंद हो गयी थी। हमने इस पत्रिका का पुनर्प्रकाशन शुरु किया है। आप पता भेजियेगा तो मैं प्रति भेजूंगी। वैसे पत्रिका मैगज्‍टर पर है। आप मुझे अपना ईमेल भेजिए तो मैं डिजीटल एडीशन को एक्‍सेस करने के लिये पासवर्ड भेज दूंगी।
सविता जी को मेरा नमस्‍कार कहियेगा। हांलाकि मेरी उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई लेकिन मैं उन्‍हें मेरठ याद रखने के लिये नमन करती हूं। परिवार में सभी को यथायोग्‍य अभिवादन।

सादर
ऋचा
On 08/15/14 5:16 AM, Palash Biswas wrote:
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ऋचा जी.धन्यवाद।
हमारा तो मेरठ से संपर्क सूत्र ही टूट गया है।हालांकि हम मेरठ और मेरठ वालों कोखूब याद करते हैं।सविता ने जोर देकर कहा था कि यह कोई महिला ही होगी,जो सच निकला ।मुझे तो आप सबकी खूब याद है।आपसे निजी तौर पर मिला नहीं हूं जैसे मेरी पत्नी सविता भी नहीं मिली,लेकिन आप दोनों बहनों और आपके पिता को हम लोग खूब जानते रहे हैं।हरि शंकर तो अतुल और दयाशंकर से लेकर अतुल माहेश्वरी और राजुल की तरह हमारे आत्मीयजनों में रहे हैं।इस हिसाब से आप हमारे परिजनों में शामिल हैं।
हम देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़ते टूटते रहे हैं,यह संजोग ही है।लेकिन मेरठ में पूरे छह साल बिता देने के बावजूद यह कचोटने वाली ही बात ही हुई कि जब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी, मणिपुर से लेकर कच्छ के रण तक हमारे निरंतर संपर्क बने हुए हैं,हमारी कथाओं में जब मेरठ का बोलबाला है,तो मेरठ से हमें कोई आवाज क्यों नहीं आती।
आपकी इस एक पंक्ति ने हमें बहुत ताकत दी है।सविता तो अब हर बात को दुबारा जीने लगी हैं।
इसका आभार।
हरिशंकर और अमर उजाला जागरण के दूसरे लोगों से अरसे से संपर्क नहीं बन पाया।
वैसे मैं विशुद्ध पत्रकार भी नहीं हूं।
कृपया बाकी परिजनों की खबर ब्यौरे के साथ दें ताकि पुराने मेरठ को हम दोबारा जी सकें।
On 08/15/14 4:13 AM, Editor Sujata wrote:
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जी, मेरा नाम ऋचा है और मेरे पति हरि शंकर जोशी अमर उजाला में लंबे समय तक रहे हैं। वह वहां फीचर एडीटर थे। आप जब जागरण में थे तो वहां मंगल जी से लेकर ओपी सक्‍सेना तक से नाता था। मेरे पिता जी स्‍वर्गीय वेद अग्रवाल फ्रीलांसर थे और मैं भी तब कविता के अतिरिक्‍त विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में लिखती थी। शायद आपको अब याद आ गया होगा।

सादर
ऋचा जोशी

On 08/11/14 9:01 AM, Palash Biswas wrote:
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Thanks.
Let me know whether you belong to our old friend circle.My wife Sabita is very anxious to know this as we left Meerut way back in 1989.We did not expect post modern Meerut would ever remember us.We assume that some friend may be kind enough to write this for a forgotten person.

On 08/11/14 3:23 AM, Editor Sujata wrote:
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मेरठ आपको बहुत याद करता है पलाश जी।

नोबेल शांति जनपदों को तो जनपदों की भी सुधि लें,वरना हिंदी संस्कृत हो जायेगी! पलाश विश्वास

नोबेल शांति जनपदों को तो जनपदों की भी सुधि लें,वरना हिंदी संस्कृत हो जायेगी!
पलाश विश्वास
वीरेनदा की कविता उद्धृत करने का एक और मौका।16 को बसंतीपुर पहुंच रहा हूं।वे लोग,जिनसे अस्मिताओं के आर पार,तराई और पहाड़ के गांव गांव में,हर परिवार में बेशुमार प्यार का तोहफा मिला है,उनमें से ज्यादातर लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं।कैंसर से जूझते जनपदों का एक कवि लेकिन अब भी कविता में सक्रिय है जो हमारे दिल का बेशकीमती हिस्सा हैं,और वे बेशक हमारे वीरेनदा हैं।

लेकिन यह वीरेनदा की कविता नहीं है। ये पंक्तियां मेरी हैः

बियाबां में कोई मकड़ी अकेली अपने भीतर से बुनती रहती जाल तूफान के मुकाबले।
बियाबां में कोई मकड़ी अकेली अपने भीतर से बुनती रहती जाल दावानल के खिलाफ।

रात का घना अंधेरा चीरकर बाती गरीब झोपड़ी में हर रात जलता है दिया।
रात का घना अंधेरा चीरकर अजीब से घुटन में मर मरकर जीता है जिया।

क्या पता,जिंदगी कितनी और मोहलत देगी इस धरती की सोंधी महक को।
क्या पता कि किस रंग से सराबोर जिंदगी कब बदल जाये सिरे से।

फिलवक्त लेकिन फिक्र है उस दुनिया जहां की,जो रोज बनती है और जिसे कातिलों का कारवां तबाह करने खातिर हर मोर्चे से बढ़त पर है और हम तो दोस्तों,

न तूफान के मुकाबले की तैयारी में कोई मकड़ी बनने काबिल रहे।
न दावानल के खिलाफ तनकर खड़ा होने का दम है।
न हम बूझने के लिए जलने को तैयार और न जलने के लिए बूझने को।
जिया जलाने को घुटन जीजी कर मरने को जी रहे हैं हम।

वीरेनदा कि बात चली,तो गिरदा याद आ जाते हैं।गिरदा की बात चली तो नवारुण दा याद आ जाते हैं।इनकी बात चली तो गोरख पांडे याद आ जाते हैं और दरवज्जे पर जबर्दस्त दस्तक देते हैं पाश कि ख्वाबों का मर जाना सबसे खतरनाक है।

खिड़कियों से कोई ब्रह्मराक्षस अंधेरे में खड़ा हांंकता है,
सबसे पहले तय करो कि किस ओर हो तुम और लिये लकुटिया सदियों से पसरा
घना अंधेरा चीरकर चीखता है कोई,कबीरा खड़ा बाजार में।

यही हमारा जनपद है।
यही हमारा मगध है।
यही हमारा गौड़ है।
यही हमारा मोहंजोदोड़ो हड़प्पा है।

उस जनपद से,उस मगध से,उस गौड़ से हम उसी तरह बेदखल होते रहे जैसे हम बेदखल हुए मोहंजोदोड़ो और हड़प्पा से तो यह किसका अपराध है,बूझो।

हिंदी समाज बाग बाग है कि विशुद्ध हिंदीवाला कोई नोबेलिया हुई गयो रे।

बंगालियों का नोबेल एकाधिकार तोड़ा हिंदी ने इसतरह कि बंगाल में भी हिंदी उपलब्धि पर जश्न का माहौल है।

दरअसल यह जनपदों को नोबेल शांति पुरस्कार है।

इस पुरस्कार की खासियत यह है कि पहलीबार पाकिस्तान और भारत के बीच बने अग्निवलय के कांटेदार तार रणभेरियों के धर्मोन्माद को धता बताकर फूल बनने लगे हैं।

उस गुलमोहर की छांव में लौटने के इंतजार में बिता दी सारी जिंदगी,जहां सुनहले ख्वाबों का साझा साया हुआ करता था।उस गुलमोहर के लाल रंग के आसरे बिता दी जिंदगी और जो बीत गया सो रीत गया।रेत की तरह फिसल रहा है वक्त।

दंगाबाज,दगाबाज,युद्धबाज सौदागरों के शिकंजे में हम स्मृतियों से भी बेदखल हो रहे हैं ठीक उसी तरह जैसे जनपदों से बेदखल हो रहे हैं हम और हमारी जो रूह है,वह दरअसल मलाला है।

उतनी ही कमसिन,उतनी ही खूबसूरत और उतनी ही लड़ाई की हिस्सेदार,जिसे कत्ल करते हैं हम मुक्त बाजार के इस डिजिटल बजरंगी देश में पल छिन पल छिन।

मेरा नाम कैलास रखा जाना था।जो मेरे दादाजी के बड़े बाई का नाम रहा है।दादी पूर्वी बंगाल के लोकरिवाज के मुताबिक अपने जेठ का नाम नहीं ले सकती थीं और चूंकि वंश में सबसे पहला बेटा था तो उनने वीटो दाग दिया कैलास नामकरण पर।

उस वक्त तराई घनघोर जंगल था।पिता ढिमरी ब्लाक जनविद्रोह के नेता थे उस वक्त।किसानसभा के नेता भी थे।चारों तरफ एक ही फूल खिल रहे थे जंगल में और जंगल की वह आग समेटकर मेरे वजूद के हिस्से में डाल दी हमारी ताई ने।मैं कैलास बनते बनते रह गया।

नोबेल पुरस्कार इस बार किसी एनजीओ को ही मिलना तय था। विश्वबैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष,यूनेस्को और यूरोपीय समुदाय की पूरी तैयारी थी।

मलाला को नोबेल देना भी आतंक के विरुद्ध,तालिबान के खिलाफ लड़ाई तेज करने के लिए अनिवार्य था।
हमें मालूम है कि किन मित्रों को कैलास जी को नोबेल मिलने से नोबेल मिलते मिलते हाथ मसोस कर रह जाना पड़ा।

शुरुआती सूची में उनका नाम तक नहीं था।जिनसे सारा बायोडाटा मंगवाया गया वे दौड़ में पिछड़ गये।

नोबेल राजनीति विचित्र किस्म की है।

गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार देने से इंकार करते हुए उन पर रंगभेदी होने का आरोप भी लगा दिया गया और विडंबना देखिये कि गांधी का रास्ता अख्तियार करने के लिए कैलास जी को यह पुरस्कार दे दिया गया।इमर्जेिग बाजार की विश्वसुंदरी खूबी यही है।

खास बात तो यह है कि दुनियाभर में मुक्त बाजार में बेरहम तरीके से छिने जा रहे वचपन के हक हकूक के लिए मालाला और कैलास सत्यार्थी को यह पुरस्कार साझा मिला।संजोग से स्वात घाटी में तालिबान से लड़ने वाली तालिबान के हमले से मौत के आगोश में सोते सोते जिंदा बच निकली मलाला और बजरंगियों के मु्क्तांचल बनी गायपट्टी के जनपद विदिशा से दुनियाभर में बचपन बचाओ का अलख जगाने वाले
कैलाश जी को यह पुरस्कार मिला है,जिन्हें निजी तौर पर मैं जानता नहीं हूं।

भारत में किसी और एनजीओ एक्टिविस्ट को चुना गया होता तो मैं शायद उनका नजदीकी मित्र निकलता। लेकिन जिस जनपद से शलभ श्रीराम सिंह का ताल्लुकात है,जिस विदिशा की निशा के साथ जीवनानांद दास की कविता जुड़ी है,उस जनपद को मिले इस सम्मान से मैं बेहद खुश हूं।

खासकर इस साझा शंति पुरस्कार का मायने यह सबसे बड़ा है कि सीमा पर युद्ध की तैयरियों में जो लोग लगे थे,उनके चेहरे पर कालिख पोतकर जनपदों के साझा चूल्हे में फिर अमन की आग सुलगा दी है नोबेल कमिटी ने।

तात्कालिक प्रतिक्रिया में मैंने तो बांग्ला में लिखा भी,युद्धेर दामामा थामा नराधाम।अमलेंदु ने बांग्ला हस्तक्षेप पर जिसे चस्पां भी कर दिया।

नराधाम की पहचान पहेली है।बाकी युद्ध का दामामा तो पूरा भारत पाक राजनीति है और कारपोरेट मीडिया है।

जंग की आग लीलती रही है जनपद।
तबाही के मंजर से घिरते रहे हैं जनपद लगातार लगातार युद्ध के सिलसिले से।
हमारे भीतर भी कोई स्वात घाटी है जहां हर रोज कुचल दी जाती है कोई न कोई मलाला।
गर्भ में ही तमाम मलालाएं खत्म कर दी जाती हैं और आनर किलिंग की शिकार बना दी जाती हैं मलालाएं।

हमारे भीतर भी कोई स्वात घाटी है,जो हमें तालिबान न सही रंग बिरंगे बजरंगियों में तब्दील कर रही है और हम लोग भी जाने अनजाने स्वातघाटी के तालिबान ब्रिगेड में शामिल हुए जाते हैं।

जिस तबके से हूं मैं,कामकाजी मेहनतकश लड़कियों और औरतों को जाना है खूब और परिवार समाज में उनकी सक्रिय साझेदारी का गवाह रहा हूं।

जनपदों से बाहर विश्वविद्यालयी कुलीन महिलाओं से थोड़ा बहुत वास्ता रहा है।
अंतरंग संबंध या दोस्ताना या अन्येतर संबंध परिवार से बाहर पहचान और वर्गीय अवस्थान के बाहर बने नहीं हैं।

तालिबानी जिहाद दरअसल स्त्री विरोधी है।
मलाला को स्त्री होने के कारण लड़कियों की शिक्षा की मुहिम चलाने की वजह से तालिबानी मृत्यु परवाना जारी हुआ,जो पुरुषतांत्रिक वर्चस्व का मामला है।
यह समझने का कोई कारण है नहीं कि तालिबानी भूगोल इस्लाम की जद में कैद है।
इसके उलट मनुस्मृति अनुशासन के तहत स्त्री विरोदी प्रावधान और जटिल और ज्यादा अभेद्य है।

मुक्त बाजार ने स्त्री के हाथों और पांवों की जंजीरें अभी तोड़ी नहीं हैं।

हालांकि सच यह भी है कि क्रमशःप्रबंधकीय सहजात कुशलता,जन्मजात करुणाभाव, गृहिणी सुलभ दक्षता, कुशलता, निष्ठा और नेतृत्व की बदौलत हर क्षेत्र में स्त्री लेकिन पुरुष वर्चस्व के खिलाफ चुनौती बनती जा रही है।

पुरुषतंत्र तिलमिला रहा है और हम संभव तरीके से स्त्री के जीवन में जहर घोलने की बाजारु मुहिम जारी है।इसी की चरमोत्कर्षपरिणति बाजारु साँढ़ सस्कृति,विकाससूत्र।

तसलिमा नसरीन अभी भारत में बेनागरिक जीवन बिता रही हैं तालिबानी संस्कृति के खिलाफ लगातार जिहाद रचती हुई और भारत बांग्लादेश में अब उनका लिखा छापा नहीं जाता इसी वजह से।बांग्ला हस्तक्षेप में उनकी आपबीती पढ़ लें।

हम भारत में विदेशी तसलिमा के इस्लामविरोधी दिखने वाले संघर्ष का भले ही साथ दें,लेकिन पुरुषतंत्र के खिलाफ, धर्म के खिलाफ उनके लिखे कहे को अराजक ही मानते रहे हैं।अश्लील भी। और बजरंगी कहकर उनको समझने से इंकार का वाम प्रगतिवाद भी दर्शाने से चूकते नहीं है।धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अततः तालिबान के साथ खड़े हो जाते हैं हम।

हिंदुत्व के खिलाफ,मनुस्मृति के खिलाफ कोई भारतीय मलाला और तसलिमा अभी प्रकाशित नहीं है और हमारी धर्मनिरपेक्षता सुरक्षित है।

लेकिन हकीकत यह है कि हम किसी तसलिमा या मलाला को अपने घर समाज में पपने का स्पेस देने लायक उदार नहीं हैं।

पिछले चालीस साल से अप्रिय लिखने कहने के लिए अलोकप्रिय इतना हूं कि किसी की तारीफ करुं तो भी तोक भाव से गालियां पड़ती हैं।इसका भी अभ्यस्त हो गया हूं।

कल तक अनजाने,अधजाने,उपेक्षित कैलास सत्यार्थी को मीडिया रातोंरात रवींद्र नाथ और मदर टेरेसा बनाने पर तुला है।उनका बचपन बचाओ आंदोलन अब मिथकीय है।

यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।
कोलकात इसका साक्षी है।

कोलकाता को तीन तीन नोबेल पुरस्कार मिले हैं।एक सदी पहले ब्रिटिश भारत में रवींंद्र नाथ जो कैलाश जी की ही तरह अनजाने,अधजाने और उपेक्षित थे।उन्हें बंगाल में कोई कवि मानने को तैयार न था।

नोबेल मिलने के बाद अब रवींद्र संगीत के अलावा बंगाल के जलवायु में कोई दूसरा सुर ताल संगीत है ही नहीं।जिस लालन फकीर की बाउल विरासत के मुताबिक बंगाल के रवींद्रनाथ विश्वकवि ,गुरुदेव बने,बंगाल ने बिना किसी औपचारिकता के उस सूफी संत बाउल साझा चूल्हे की विरासत को तिलांजलि दे दी है।जिन जनपदों में जड़ें थीं उनकी,वे जनपद अब अस्पृश्य हैं।

सीवी रमण और मदर टेरेसा को पुरस्कार मिलने पर बंगाल में वैज्ञानिक दृष्टि या मिशनरी सरोकार कितने बढ़े हैं,भयनक हुद हुदाते पद्मप्रलय में मेरे जैसे तुच्छ व्यक्ति के लिए उसका मूल्यांकन करना औकात से बाहर है।

बहरहाल बंगाल का दावा मलेरिया की चिकित्सा के लिए कोलकाता प्रवासी ब्रिटिश नागरिक को दिये गये पुरस्कार पर भी है।

कोलकाता तीन नहीं ,चार नोबेल का दावा करता है।
अब पांचवें पर मुझे अपना दावा ठोंक ही देना चाहिए।

किसी अस्पृश्य को भी तो मिलना चाहिए।

इस लिहाज से हिंदी पट्टी के विशुद्ध मध्यप्रदेशीय हिंदी भाषी कैलाश जी को मिला यह पुरस्कार ऐतिहासिक है।

यह दरअसल कैलास जी के व्यक्तित्व कृतित्व के महिमामंडन का मौका कम,बल्कि जनपदों की सुधि लेने का मौका है।

महिमा मंडन के लिए सारी दुनिया है।

जिस बचपन बचाओ को हम अब अपना गौरव समझते हैं,वह तो मुक्त बाजार के हवाले है।सर्वशिक्षा में सीमाबद्ध शिक्षा का अधिकार और अब भी खेतों से लेकर बाजार में बचपन बंधुआ मजदूर है।

इस हालात को बदले बिना कैलास जी की निजी उपलब्धि पर शायद इतराने का हक हमें नहीं है।

जिस मलाला के साथ यह शांति पुरस्कार है,उस मलाला का जिहाद लेकिन युद्धोन्माद और धर्मोन्माद के खिलाफ बराबर दावानल है।
क्या हम अपने अपने तालिबान के खिलाप उसी शिद्दत के साथ कोई मुकम्मल जंग लड़ने का माद्दा रखते हैं,खुद से यह पूछने का मौका है।

जनपदों की बात चली और हिंदी पट्टी की बात चली तो हिंदी पर बात की ही जानी है।

इस सिलसिले में अभी हाल में जो चेतावनी मास्को प्रवासी कवि अनिल जनविजय ने दी है और हस्तक्षेप पर जो चस्पां बी कर दी गयी,वह बेहद प्रासंगिक हैः

हिन्दी सिर्फ़ ब्राह्मणों की भाषा है?

2014/10/08  |   Filed under: बहस  |   Posted by: Amalendu Upadhyaya
अनिल जनविजय
उदयप्रकाश ने अपने उपन्यासिका ’पीली छतरी वाली लड़की’ में बड़ी शिद्दत से यह वर्णन किया है कि कैसे भारत में ’ब्राह्मणों’ ने हिन्दी की ठेकेदारी अपने नाम कर रखी है। भारत के ज़्यादातर विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों पर इन्हीं शुक्लाओं, मिश्रों, तिवारियों, पाण्डेयों और शर्माओं का कब्ज़ा है।
मास्को में क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन हो रहा है। उसमें भाग लेने के लिए भी सरकारी खर्चे पर जो प्रतिनिधिमण्डल भारत से आ रहा है, उसके सभी दस सदस्य ब्राह्मण हैं। ऐसा लग रहा है जैसे हिन्दी सिर्फ़ ब्राह्मणों की भाषा है।

इसपर आगे फिर चर्चा करते रहेंगे।

जो ताालिबान बजरंगी इस जहां में जहां भी है,उन्हें हमरा सर कलम करने का मुकम्मल हक है।जो न तालिबान है और न बजरंगी,वे हमारी बात पर गौर करें तो बड़ी कृपा होगी।

जिन युद्ध क्षेत्रीय आदिवासी जनपदों को हम  सैन्य शासन के लायक मानते हैं,वह भी दरअसल हिंदी समाज का अभिन्न अंग है।

अश्वमेधी संस्कृति की राजकाज भाषा और कर्मकांड, तंत्र मंत्र यंत्र और मुक्त बाजार की भाषा तक सीमित होकर हिंदी संस्कृत दशा की ओर तेजी से बढ़ने लगी है।
बंगीय महिमामंडन संस्कृति से बचते हुए हम सोचें तो फिर संवाद और विमर्श का माहौल बनेगा।फारवर्ड प्रेस पर छापा मारकर हिंदी का उद्धार असंभव है।

आदरणीय हिमांशु जी ने जो जनपदीय सामाजिक यथार्थ का ताजा नमूना पेश किया है,उस पर भी गौर कीजियेगाः

Himanshu Kumar
39 mins · Edited ·
दिल्ली में स्थित एक जर्मन टीवी चैनल से एक टीम कल दंतेवाड़ा गयी . उन्होंने सोनी सोरी का इंटरव्यू लिया .
कल रात में ही रात में ही पुलिस के आठ सिपाही बिना वर्दी और बिना नाम की पट्टी लगाए सोनी के घर में घुस गए .
पुलिस वाले सोनी से पत्रकारों के आने का मकसद और उनके आगे के इरादों के बारे में पूछते रहे .
देश में सभी पत्रकार कहीं भी जाकर लोगों से मिल सकते हैं .
किसी भी चैनल के बस्तर में आने और आदिवासियों से मिलने पर सोनी को किसी भी कानून के तहत परेशान नहीं किया जा सकता.
पुलिस की यह हरकत पूरी तरह गैरकानूनी और गुंडागर्दी की है .
कुछ सप्ताह पहले सोनी सोरी अपने एक सहायक की मोटर साईकिल पर कहीं जा रही थी . पुलिस की गाड़ी ने आकर मोटर साईकिल को टक्कर मार कर सोनी की जान लेने की कोशिश करी .
मोटर साईकिल चलाने वाले लड़के ने मोटर साईकिल को सड़क से उतार कर जंगल के भीतर भगा दिया और गाड़ी की टक्कर से बच निकले . इसके बाद पुलिस की गाड़ी भाग गयी .
बस्तर के आईजी कल्लूरी ने सोनी को फोन कर के अपने आफिस में बुलाया और बताया कि मुख्यमंत्री जी ने कहा है कि अगर सोनी दंतेवाडा में किसी आदिवासी के मरने या आदिवासी को जेल में डालने के मुद्दे पर चुप रहेगी तो सरकार सोनी के ऊपर बचे एक एक केस को खत्म करवा देगी .
लेकिन सोनी ने सरकार के साथ सौदेबाज़ी का प्रताव नहीं माना. उसके बाद पुलिस द्वारा सोनी पर हमले और पुलिस की सोनी के खिलाफ़ गुंडागर्दी जोरशोर से चालू हो गयी है .
छत्तीसगढ़ का भाजपा का मुख्यमंत्री रमन सिंह सोनी सोरी से डर गया है .
दिल्ली में स्थित एक जर्मन टीवी चैनल से एक टीम कल दंतेवाड़ा गयी . उन्होंने सोनी सोरी का इंटरव्यू लिया .

कल रात में ही रात में ही पुलिस के आठ सिपाही बिना वर्दी और बिना नाम की पट्टी लगाए सोनी के घर में घुस गए . 

पुलिस वाले सोनी से पत्रकारों के आने का मकसद और उनके आगे के इरादों के बारे में पूछते रहे . 

देश में सभी पत्रकार कहीं भी जाकर लोगों से मिल सकते हैं .

किसी भी चैनल के बस्तर में आने और आदिवासियों से मिलने पर सोनी को किसी भी कानून के तहत परेशान नहीं किया जा सकता.  

पुलिस की यह हरकत पूरी तरह गैरकानूनी और गुंडागर्दी की है .

कुछ सप्ताह पहले सोनी सोरी अपने एक सहायक की मोटर साईकिल पर कहीं जा रही थी . पुलिस की गाड़ी ने आकर मोटर साईकिल को टक्कर मार कर सोनी की जान लेने की कोशिश करी .

मोटर साईकिल चलाने वाले लड़के ने मोटर साईकिल को सड़क से उतार कर जंगल के भीतर भगा दिया और गाड़ी की टक्कर से बच निकले . इसके बाद पुलिस की गाड़ी भाग गयी .

बस्तर के आईजी कल्लूरी ने सोनी को फोन कर के अपने आफिस में बुलाया और बताया कि मुख्यमंत्री जी ने कहा है कि अगर सोनी दंतेवाडा में किसी आदिवासी के मरने या आदिवासी को जेल में डालने के मुद्दे पर चुप रहेगी तो सरकार सोनी के ऊपर बचे एक एक केस को खत्म करवा देगी .

लेकिन सोनी ने सरकार के साथ सौदेबाज़ी का प्रताव नहीं माना. उसके बाद पुलिस द्वारा सोनी पर हमले और पुलिस की सोनी के खिलाफ़ गुंडागर्दी जोरशोर से चालू हो गयी है .

छत्तीसगढ़ का भाजपा का मुख्यमंत्री रमन सिंह सोनी सोरी से डर गया है .
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इस पर माननीय नये नवेले नोबेल लारियेट जी क्या विचार रखेंगे और क्या उनका शंति पुरस्कार आदिवासी इलाकों में राष्ट्र के अविराम युद्ध में कत्ल होते जा रहे बचपन को भी समर्पित है,जानने की प्रबल इच्छा है।

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