BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Monday, October 3, 2016

क्या नरसंहारी सियासती मजहब पर हम खुले संवाद के लिए तैयार हैं? महिषासुर का पक्ष दुर्गोत्सव के मौके पर रखने के लिए कोलकाता आ रही हैं सुषमा असुर! पलाश विश्वास

क्या नरसंहारी सियासती मजहब पर हम खुले संवाद के लिए तैयार हैं?

महिषासुर का पक्ष दुर्गोत्सव के मौके पर रखने के लिए कोलकाता आ रही हैं सुषमा असुर!

पलाश विश्वास

सुषमा असुर का नाम अब हिंदी समाज के लिए अनजाना नहीं है।सुषमा असुर पिछले अनेक वर्षों से महिषासुर वध महोत्सव बंद करने की अपील करती रही है।वह झारखंड और बंगाल में महिषासुर के वंशजों का प्रतिनिधित्व करती है।अब देश भर में जारी महिषासुर विमर्श में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है।वही सुषमा असुर कोलकाता में सार्वजनीन दुर्गोत्सव के पंडाल का उद्घाटन करने आ रही है।बांग्ला दैनिक एई समय ने इस बारे में ब्यौरेवार समाचार पहल पृष्ठ पर छापा है और उस समाचार में सुषमा असुर का एक अन्य वक्तव्य भी प्रकाशित किया है।

महिषासुर वध का विरोध छोड़कर वे कोलकाता के दुर्गोत्सव में महिषमर्दिनी की पूजा के लिए नहीं आ रही है,बल्कि कोलकाता और बंगाल को महिषासुर का पक्ष बताने आ रही हैं।भारतभर के आदिवासियों के हक में असुरों की कथा व्यथो को लेकर बहुसंख्य हिंदू जनता से संवाद शुरु करने आ रही हैं।इस वक्त जेएनयू और गोंडवाना समेत देश के दूसरे हिस्सों में महिषासुर और रावण के वंशजों के खिलाफ जो नरसंहार अभियान के तहत फासीवादी हमले जारी हैं,जिसके तहत बंगाल में भी पुलिस महषासुर उत्सव रोक रही है,सुषमा असुर की यह पहल बहुत महत्वपूर्ण है।

कोलकाता में भारत विभाजन से पहले मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन और इसके साथ पूर्वी बंगाल के नौआखाली दंगों के दौरान कोलकाता में अमनचैन के लिए सत्ता की छिनाझपटी की नई दिल्ली से दूर जिस बेलेघाटा में आकर कोी मोहनदास कर्मचंद गांधी आकर ठहरे थे,जहां से वे नोआखाली गये थे और फिर दंगा और  भारत विभाजन रोक पाने में विफल होकर सोदपुर पानीहाटी के गांधी आश्रम में ठहरे थे,उसी बेलेघाटा के बहुत पास फूलबागान पूर्व कोलकाता सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति ने महापंचमी पर दुर्गा पूजा के उद्घाटन के लिए सुषमा असुर को न्यौता है और सुषमा असुर इसके लिए राजी भी हो गयी है।इस संवाद से बाकी देश के लोग कोई सबक सीखें तो हमारी बहुत सी मुश्किलें आसान हो सकती हैं।फूलबागान के लोगों को महिषासुर के वंशंजों को इसतरह आत्मीय जन बना लेने के लिए बधाई।

सुषमा असुर ने कहा कि हमारे समुदाय के बच्चे जब स्कूल कालेज में जाते हैं तब उन्हें राक्षस कहकर उनका उत्पीड़न और बहिस्कार होता है।हम कोई राक्षस दैत्य वगैरह नहीं ,हम भी दूसरों की तरह मनुष्य हैं, हम कोलकाता और बंगाल को यह बताने के लिए यहां आ रहे हैं। गौरतलब है कि गोंडवाना में भी आदिवासी खुद को असुर मानते हैं और वहां भैंसासुर की पूजा व्यापक पैमाने पर होती है,जहां दुर्गापूजा का चलन कभी नहीं रहा है।

हम पहले लिख चुके हैं कि दुर्गाभक्तों का एक हिस्सा आदिवासियों और महिषासुर एवम् रावण के वंशजों की कथा व्यथा से अनजान नहीं है और उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा उनके हक हकूक की लड़ाई का कमोबेश समर्थन भी करते हैं।वे दुर्गा के मिथक में महिषासुर प्रकरण के तहत दुर्गापूजा की पद्धति में संशोधन के पक्षधर हैं।सुषमा असुर भी यह बार बार कहती रही हैं कि महिषासुर वध के बिना अपनी आस्था के मुताबिक कोई दुर्गापूजा करें तो असुर के वंशजोंको इसपर आपत्ति नहीं होगी।

उदार दुर्गाभक्तों का एक हिस्सा सुषमा असुर की इसी अपील के मुताबिक दुर्गापूजा में महिषासुर वध रोकने के पक्ष में है।लेकिन इस पर कोई सार्वजनिक संवाद अभीतक शुरु हुआ नहीं है।सुषमा असुर यह संवाद शुरु करने जा रही हैं।

यह संवाद कोलकाता में दुर्गोत्सव के मौके पर शुरु करने की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।इसके सकारात्मक परिणाम निकल सकते हैं।बशर्ते की हम नरबलि की परंपरा को सतीदाह की तरह खत्म करने के लिए तैयार हो और नरसंहार संस्कृति की वैदिकी पररंपरा के पुलरूत्थान के आशय को समझने के लिए तैयार हों। ऐसा हुआ तो भारत की एकता और अखंडता और मजबूत होगी जिसे हम अपने धतकरम से चकनाचूर करते जा रहे हैं।

भारतीय सभ्यता की विकास यात्रा आर्य अनार्य संस्कृति के एकीकरण के तहत हुआ है।सती कथा के तहत तमाम अनार्य देव देवियों को चंडी और भैरव बनाकर एकीकरण की प्रक्रिया कामाख्या और कालीघाट जैसे अनार्य शाक्त धर्मस्थलों को भी सती पीठ में शामिल करने के तहत हुआ है।

गोंडवाना से लेकर पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में करीब एक लाख साल पहले मनुष्यों की पाषाणकालीन सभ्यता के पुरावशेष मिले हैं।मोहनजोदोडो़ और हड़प्पा की सिंधु सभ्यता का विंध्य और अरावली पर्वतों तक विस्तार हुआ है।खास तौर पर बिहार, झारखंड,बंगाल और ओड़ीशा में वैदिकी और ब्राह्मण काल  के बाद बौद्ध और जैन धर्म का बहुत असर रहा है।जो अब तक खत्म हुआ नहीं है।गोंडवाना के अंतःस्थल में जाये बिना हम भारत की एकात्मकता को समझ नहीं सकते।सांस्कृतिक एकता के तहत अवसरों और संसाधनों के बंटवारे के बिना समता और न्याय की दिशा खुल नहीं सकती और समरसता के पाखंड के बावजूद भारत कानिर्माण हो नहीं सकता तो हिंदू राष्ट्र का एजंडा भी हिंदूधर्म के सर्वनाश का कारण बना रहेगा।यही फासिज्म है।

बिहार और बंगाल में असुर आदिवासी दुर्गोत्सव और रावण दहन के दौरान महिषासुर और रावण के लिए शोक मनाते हैं और घरों से भी नहीं निकलते हैं।इसके साथ ही महायान बौद्धधर्म के असर में तंत्र के आाधार में जंगल महल में झारखंड औऱ बंगाल में आसिनी वासिनी सर्वमंगला आदि बौद्ध देवियों की पूजा प्रचलित है और मेदिनीपुर में दामाोदर पार दुर्गोत्सव उन जनसमूहों के लिए निषिद्ध है जो असुर नहीं है लेकिन इन तमाम देवियों की पूजा करते हैं।इसीतरह बंगाल बिहार झारखंड और ओड़ीशा में शिव की मूर्तियों के साथ बौद्ध और जैन मूर्तियों की भी पूजा होती है।

वैसे भी बहुसंख्य भारतीय तथागत गौतम बुद्ध और पार्शनाथ भगवान और सभी जैन तीर्थाकंरों की उपासना अपने देव देवियों के साथ उसीतरह करते हैं जैसे अविभाजित पंजाब में हिंदुओं और सिखों के साथ मुसलमानों के लिए भी गुरद्वारा तीर्थ स्थल रहा है और अंखड भारत में तो क्या खंड खंड भारत में अजमेर शरीफ में गरीबनवाज  या फतेहपुर सीकरी की शरण में जाने वाले किसी मजहब के पाबंद जैसे नहीं होते वैसे ही तमाम सीमाओं के आर पार अब भी पीरों फकीरों की मजार पर गैरमुसलमान भी खूब चादर चढ़ाते हैं।हमारे ही देश में हजारों साल से अइलग अलग मजहब के लोग एक ही परिसर में मंदिर मस्जिद में पूजा और नमाज पढ़ते रहे हैं बिना किसी झगड़े और फसाद के।

आजादी के बाद अयोध्या ,खाशी और वृंदावन को लेकर मजहबी सियासत ने जो फसाद खड़े कर दिये,वे हजारों साल से हुए रहते तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की हाल यूनान और रोम,मेसोपोटामिया का जैसा होता।जाहिर है कि पीढ़ियों से भारतीय की सरजमीं को हमारे पुरखों ने जो अमन चैन का बसेरा बनाया है,हमने उस उजाड़ने का चाकचौबंद इंतजाम कर लिया है।नफरत की यह आंधी हमने ही सिरज ली है।

झारखंड में जैनों का महातीर्थ पार्श्वनाथ का तीर्थस्थल पारसनाथ गोमो जंक्सन के बाद है तो बंगाल के बांकुड़ा से लेकर ओड़ीशा और मेदिनीपुर के प्राचीन बंदरगाह ताम्रलिप्त तक जैन मूर्तियों,स्तूपों और मंदिरों के अवशेष सर्वत्र है तो बौद्ध धर्म का भी असर सर्वत्र हैं।

मगध,पाटलिपुत्र,राजगीर और बोधगया से झारखंड के रास्ते ताम्रलिप्त होकर विदेश यात्राएं तब होती थीं।सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा इसी रास्ते से ताम्रलिप्त होकर श्रीलंका पहुंची थी तो चीनी पर्यटक व्हेन साङ के चरण चिन्ह भी इसी रास्ते पर हैं।झारखंड के असुर एक लाख साल से पाषाणकालीन युग से पत्थरों के हथियारों से लेकर मुगल शासकों के हथियार तक बनाने में अत्यत दक्ष कारीगर रहे हैं और उनमें से ज्यादार लोग लुहार हैं।

हम इस इतिहास के मद्देनजर बीसवी संदी की जमींदारी के जल जंगल जमीन पर कब्जे के जश्न के तहत नरबलि की प्रथा महिषासुर वध के मार्फत जारी रखे हुए हैं तो इस जितनी जल्दी हम समझ लें उतना ही बेहतर है।जल जमीन जंगल के दावेदार इस सत्ताव्रक के नजरिये से राक्षस, दैत्य, दानव, असुर, किन्नर, गंधर्व,वानर वगैरह वगैरह है और नरबलि की प्रथा उनकी ह्त्या को वैदिकी वध परंपरा में परिभाषित करने की आस्था है जो अब दुर्गोत्सव में महिषासुर वध है या रामलीला के बाद रावण दहन है और रावण को तीर मारकर जलाने वाले सत्ता शिखर के सर्वोच्च लोग हैं जो रमालीला मैदान पर इस नरसंहार को महोत्सव मनाते हैं।

गौरतलब है कि गोंडवाना से लेकर पूर्व और पूर्वोत्तर भारत के आदिवासी भूगोल में आदिवासियों के टोटेम और शरणा धर्म के साथ साथ जैन और बौद्ध धर्म और हिंदुत्व की मिली जुली संस्कृति हजारों साल से जारी है,जिसमें दुर्गोत्सव में महिषासुर वध और रावण दहन की ब्रिटिश हुकूमत के दौरान सार्वजनीन आस्था उत्सवों की वजह से भारी उथल पुथल मची है।

दुर्गोत्सव बीसवीं सदी से पहले जमींदारों और राजाओं की निजी उत्सव रहा है और उसमें प्रजाजनों की हिस्सेदारी नहीं रही है।दुर्गोत्सव नरबलि से शुरु हुआ और जाहिर है कि इस नरबलि के शिकार प्रजाजन ही रहे हैं,जिसके प्रतीक अब महिषासुर हैं।जाहिर है कि अलग अलग उपासनापद्धति,आस्था और धर्म के बावजूद आम जनता के दिलो दिमाग में कोई दीवार भारत के इतिहास में बीसंवी सदी से पहले नहीं थी।भा्रत विबाजनके सात दिलोदिमाग का यह बंटवारा सियासत के मजहबी बना दिये जाने से हुआ है और सत्ता की इस सियासत से हमेशा मजहब और मजहबू जनता को सबसे बड़ा नुकसान होता रहा है।

दूसरी तरफ, गोस्वामी तुलसीदास के लिख रामायण से ही मर्यादा पुरुषोत्तम की सर्व भारतीय छवि  मुगलिया सल्तनत के खिलाफ आम जनता के हक हकूक की लड़ाई को संगठित करने और संत फकीर पीर बाउल बौद्ध सिख जैन आदिवासी किसान आंदोलनों की परंपरा के तहत दैवीसत्ता का मानवीयकरण के नवजागरण की तहत बनी।

विडंबना यह है कि सत्ता और सामंतवाद के खिलाफ तैयार गोस्वामी तुलसीदास के अवधी मर्यादा पुरुषोत्तम राम अब रावण दहन के मार्फत देश के बहुजनों के खिलाफ जारी वैदिकी मुक्तबाजारी फासिस्ट नरसंहार अभियान का प्रतीक बन गये हैं।यही नहीं, राम के इस कायाकल्प से युद्धोन्मादी धर्मोन्माद अब हमारी राष्ट्रीयता है।

दक्षिण पूर्व एशियाई देशों तक में बोली समझी जानेवाली तमिल भाषा हमें आती नहीं है,जिसके तहत हम कम से कम आठ हजार साल का संपूर्ण भारतीय इतिहास जान सकते हैं।हम इसलिए द्रवि़ड़, आर्य, अनार्य, शक,  कुषाण, मुगल, पठान, जैन, बौद्ध, आदिवासी संस्कृतियों के विलय से बने भारत तीर्थ को समझते ही नहीं है तो दूसरी तरफ भारत की किसी भी भाषा के मुकाबले ज्यादा लोगों की भाषा,समूचे मध्य भारत के गोंडवाना की गोंड भाषा को जानने का प्रयत्न नहीं किया है।

तमिल भाषा  तमिलनाडु की अस्मिता से जुड़कर अपनी पहचान बनाये हुए है बाकी भारत से अलगाव के बावजूद।लेकिन गोंडवाना और दंडकारण्य के आदिलवासियों की गोंड भाषा के साथ साथ मुंडारी, कुड़मी, संथाल,हो जैसी आदिवासी भाषाओ के साथ साथ हमने भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही, ब्रज, बुंदेलखंडी, मालवी,कुमांयूनी और गढ़वाली और बंगाल समेत इस देश की सारी जनपद भाषाओं के विकास और  संरक्षणके बदले उन्हें तिलांजलि दी है।

जो वीरखंभा अल्मोड़ा में है,वहीं वीरस्तंभ फिर पुरुलिया और बांकुड़ा में है और वहीं,मणिपुर और नगालैंड के सारे नगा जनपदों के हर गांव में मोनोलिथ है।संस्कृति और भारतीयता की नाभि नाल के इन रक्त संबंधों को जानने के लिए जैसे तमिल जानना द्रविड़ जड़ों को समझने के लिए अनिवार्य है वैसे ही सिंधु सभ्यता के समय से आर्यावर्त के भूगोल के आर पार हिमालयी क्षेत्रों और विंध्य अरावली के पार बाकी भारत के इतिहास की निरंतरता जानने के लिए आदिवासी भाषाओं के साथ साथ तमाम जनपदों भाषाओं का जानना समझना अनिवार्य है।गोंड भाषा में ही इतिहास की अनेक गुत्थियां सुलझ सकती है मसलन सिंधु सभ्यता के अवसान के बाद वहां के शरणार्थियों का स्थानांतरण और पुन्रवास कहां कहां किस तरह हुआ है।इन भाषाओं को जानने के लिए संस्कृति नहीं,पाली भाषा जानना ज्यादा जरुरी है।

हिमालयी क्षेत्र में मुगल पठानकाल में पराजित जातियों का प्रवास हुआ है और वे अपनी मौलिक पहचान भूल चुके है।इसी तरह भारत विभाजन के बाद इस देश में विभिन्न जनसमूहों के शरणार्थियों का जैसे स्थानातंरण और पुनर्वास हुआ,वैसा मध्य एशिया के शक,आर्य,तुर्कमंगोल आबादियों के साथ पांच हजार सालों से होता रहा है तो उससे भी पहले सिॆंधु घाटी से निकलकर द्रविड़ भूमध्य सागर के आर पार मध्यएशिया से लेकर सोवियात संघ,पूर्व और पश्चिम  यूरोप तक और उससे भी आगे डेनमार्क स्वीडन और फिनलैंड तक फैलते रहे हैं।जैसे तमिल जनसमूह दक्षिण पूव एशिया में सर्वत्र फैले गये हैं और विभाजन के बाद बंगाल और पंजाबी के लिए सारी दुनिया अपना घर संसार बन गया है।पांच हजार साल तो क्या पांच सौ साल तक उनकी पहचान वैसे ही खत्म हो जायेगी जैसे हिमालय से उतरने वाले कुंमायूनि गढवाली गोरखा डोगरी लोगों की हो जाती है।वे न अइपनी भाषा बोल सकते हैं और न पीछे छूट गये हिमालय को याद करने की फुरसत उन्हें है।हममें से कोई नहीं कह सकता कि पांच हजार साल पहले हमारे पुरखे कौन थे और कौन नहीं।डीएनए टेस्ट से भी नहीं।

जाहिर है कि विविधताओं और बहुलताओं का जैसा विलय भारत में हुआ है ,विश्वभर में वैसा कहीं नहीं हुआ है और इसी वजह से विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताओं इंका, माया, मिस्र, रोम,यूनान,मंगोल,मेसापोटामिया,चीन की सभ्यताओं के अवसान के विपरीत हमारी पवित्र गंगा यमुना और नर्मदा नदी की धाराओं की तरह अबाध और निरंतर है।रंग नस्ल,जाति,धर्म निर्विशेष हमारे पुरखों ने विविधताओं और बहुलताओं से जिस भारत तीर्थ का निर्माण किया है,हम अंग्रेजी हुकूमत में जमींदारों और राजारजवाड़ों की जनविरोधी नरसंहारी रस्मों को सार्वजिनक उत्सव बनाकर उस भारत तीर्थ को तहस नहस करने में लगे हैं।धर्म का लोकतंत्र को खत्म करके ङम फासिज्म के राजकाज की वानरसेना बन रहे हैं।

अगर नर बलि से लेकर पशुबलि तक की वीभत्स पंरपराओं का अंत करने के बावजूद धर्म और आस्था की निरंतरता में असर नहीं हुआ है तो समूचे देश को और खासतौर पर अनार्य असुर द्रविड़ जनसमूहों और इस देश के आदिवासियों को बहुसंख्य जनगण में विविधता और बहुलता की भारतीय संस्कृति के मुताबिक शामिल करने के लिए महिषासुर वध और रावण दहन पर पुनर्विचार और संवाद की जरुरत है।

खुशी की बात यह है कि सुषमा असुर दुर्गोत्सव के दौरान महिषासुर उत्सवों के मध्य महिषासुर वध की पुनरावृ्त्ति कर रहे बहुसंख्य जनता को सीधे संबोधित कर रही हैं।

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