BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Thursday, August 11, 2016

राह दिखाता गुजरात: आनंद तेलतुंबड़े

दलितों के इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन का संयोजन करने के लिए एक नौजवान दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की पहल पर बनी उना दलित अत्याचार लड़त समिति ने ऐलान किया कि दलित मरे हुए मवेशियों को उठाना बंद कर देंगे. उन्होंने सरकार से कहा कि वे शिव सैनिकों और खुद को गौ रक्षक कहने वालों से कहे कि वे सड़ती हुई लाशें उठाएं और उनका संस्कार करें. टाइम्स ऑफ इंडिया (28 जुलाई 2016) ने खबर दी कि कुछ ही दिनों के भीतर सड़ती हुई लाशों की बदबू ने गौरक्षकों और उनके सरपरस्त, राज्य, के होश ठिकाने ला दिए. समिति ने दायरा बढ़ाते हुए मैला साफ करना बंद करने का आह्वान भी किया है, जिसके वजूद को खुद अपनी ही एजेंसियों द्वारा कबूल किए जाने के बावजूद सरकार लगातार नकारती रही है. अगर दलितों ने सामूहिक रूप से अपने दलितपन से जुड़े बस इन दो कामों को छोड़ने का फैसला कर लिया तो जाति के पूरे निजाम को शिकस्त दी जा सकती है. अपनी असुरक्षा और प्रभुत्वशाली समुदायों की तरफ से होने वाले जवाबी हमलों के डर से वे ऐसा करने में नाकाबिल रहे हैं. इन गंदे कामों में लगा दिए गए दलित मुख्यधारा से दूर, अलग-थलग कर दिए जाते हैं, जिनके लिए सामाजिक तौर पर ऊपर उठने की गुंजाइश न के बराबर होती है.

राह दिखाता गुजरात: आनंद तेलतुंबड़े



गुजरात में मोटा समाधियाला गांव और उना कस्बे में हुए अत्याचारों के खिलाफ भड़के दलितों के आंदोलन में दलितों के नए सिरे से जाग उठने संकेत हैं. 11 जुलाई को यहां एक परिवार और इसके चार दलित नौजवानों को गाय की रक्षा की ठेकेदारी करने वाले गिरोह ने सबकी आंखों के सामने पीटा. 1970 के दशक में दलित पैंथर्स के बाद से कभी भी दलितों ने कभी भी इतने बागी तरीके से और भौतिक सवालों के साथ कोई पलटवार नहीं किया था. यों, देश में दलितों पर अत्याचार हर जगह होते हैं और गुजरात में जो कुछ हुआ, वे उससे कहीं ज्यादा खौफनाक होते हैं. लेकिन दूसरे अत्याचारों और उना में हुए इस अत्याचार में फर्क बस वो दुस्साहस है, जिसके साथ हमलावरों ने अपनी कार्रवाई का वीडियो बना कर इसे सोशल मीडिया पर डाल दिया. इससे जाहिर होता है कि उनको इस बात का पक्का यकीन था कि उन्हें अपने अपराधों के लिए कभी भी सजा नहीं मिलेगी. 2002 में इसी तरह के गौरक्षा के गुंडों ने दुलीना (झज्झर), हरियाणा में पांच दलितों को पीट-पीट कर मार देने के बाद उनमें आग लगा दिया था और इस घटना को छोड़ दें तो ऐसी घटनाओं की कभी भी ऐसी कोई जोरदार प्रतिक्रिया नहीं हुई. खुद गुजरात में ही सितंबर 2009 में सुरेंद्रनगर जिले के थानगढ़ में एक मेले में दलितों और ऊंची जाति के नौजवानों के बीच में एक छोटी सी झड़प में राज्य पुलिस ने तीन दलित नौजवानों को मार डाला था. बेशक, काफी हद तक थानगढ़ और ऐसी ही घटनाओं पर जमा हुए गुस्से और राज्य द्वारा इन अत्याचारों पर कोई भी कार्रवाई नहीं किए जाने से ही वह नाराजगी पैदा हुई है, जो मौजूदा आंदोलन के रूप में सामने आई है.

उना पुलिस थाने के करीब, कमर तक नंगे और एक एसयूवी में बंधे चार दलित नौजवानों को लोगों द्वारा सबकी नजरों के सामने बारी बारी से बेरहमी से पीटे जाने का वीडियो वायरल हुआ और इसने सब जगह पर गुस्से की एक लहर दौड़ा दी. शायद रोहिथ वेमुला के नक्शे कदम पर चलते हुए नाराजगी की पहली लहर में राज्य में अलग अलग जगहों पर करीब 30 दलित नौजवानों ने खुदकुशी करने की कोशिश की. इन्हीं में से कीटनाशक पी लेने वाले एक नौजवान 23 साल के योगेश सरिखड़ा की अस्पताल में मौत हो गई. लेकिन जल्दी ही इसके बाद विरोध का एक ऐसा बगावती तेवर सामने आया, जिसे आंबेडकर के बाद दलितों ने कभी भी नहीं आजमाया था. आंबेडकर ने दलितों से कहा था कि वे मवेशियों की लाशों को ढोना बंद कर दें. जब कुछ ब्राह्मणों ने यह दलील दी कि वे दलितों की कमाई का नुकसान कर रहे हैं, तो उन्होंने गुस्से में इसका जवाब देते हुए ऐलान किया था कि अगर दलित ऐसा करेंगे तो वे उन्हें नकद इनाम देंगे. बदकिस्मती से, सारे दलितों ने उनकी सलाह पर अमल नहीं किया और यह प्रथा आज तक चली आ रही है. आंबेडकर ने उन्हें ऐसे सभी पेशों को छोड़ने की सलाह भी दी थी, जो साफ-सुथरे नहीं हैं, लेकिन दलित कुछ तो अपने गुजर-बसर की जरूरतों के लिए और कुछ प्रभुत्वशाली समुदायों के दबाव के तहत उनको अपनाए हुए हैं. आधे पेट खा कर इज्जत के साथ जिंदगी गुजारने के अलावा आंबेडकर ने कोई और विकल्प नहीं पेश किया था. लेकिन गुजरात में चल रहे इस मौजूदा आंदोलन को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि इसने यह वाजिब मांग भी जोड़ी है कि अपने जातीय पेशों को छोड़ने वाले हरेक दलित को खेती लायक पांच एकड़ जमीन दी जाए.

इस रूप में दलितों के पास एक मजबूत हथियार तो है ही, उनके पास हिंदुत्व ब्रिगेड का एक मुंहतोड़ जवाब भी है, जिस पर गाय की रक्षा का सनक सवार है. घटना के एक हफ्ते बाद गांवों के बेशुमार दलित मरी हुई गाएं ट्रैक्टरों में भर कर ले आए और उन्हें गोंधल और सुरेंद्रनगर के सरकारी दफ्तरों के सामने डाल दिया. दलितों के इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन का संयोजन करने के लिए 
एक नौजवान दलित कार्यकर्ता जिग्नेश मेवाणी की पहल पर बनी उना दलित अत्याचार लड़त समिति ने ऐलान किया कि दलित मरे हुए मवेशियों को उठाना बंद कर देंगे. उन्होंने सरकार से कहा कि वे शिव सैनिकों और खुद को गौ रक्षक कहने वालों से कहे कि वे सड़ती हुई लाशें उठाएं और उनका संस्कार करें. टाइम्स ऑफ इंडिया (28 जुलाई 2016) ने खबर दी कि कुछ ही दिनों के भीतर सड़ती हुई लाशों की बदबू ने गौरक्षकों और उनके सरपरस्त, राज्य, के होश ठिकाने ला दिए. समिति ने दायरा बढ़ाते हुए मैला साफ करना बंद करने का आह्वान भी किया है, जिसके वजूद को खुद अपनी ही एजेंसियों द्वारा कबूल किए जाने के बावजूद सरकार लगातार नकारती रही है. अगर दलितों ने सामूहिक रूप से अपने दलितपन से जुड़े बस इन दो कामों को छोड़ने का फैसला कर लिया तो जाति के पूरे निजाम को शिकस्त दी जा सकती है. अपनी असुरक्षा और प्रभुत्वशाली समुदायों की तरफ से होने वाले जवाबी हमलों के डर से वे ऐसा करने में नाकाबिल रहे हैं. इन गंदे कामों में लगा दिए गए दलित मुख्यधारा से दूर, अलग-थलग कर दिए जाते हैं, जिनके लिए सामाजिक तौर पर ऊपर उठने की गुंजाइश न के बराबर होती है.


गुजरात को हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला के रूप में लिया जाता रहा है, जहां हम इसके असली चेहरे को साफ-साफ देख पाते हैं. एक तरफ जहां 2002 के कत्लेआम के जरिए मुसलमानों को उनकी हैसियत साफ-साफ बता दी गई कि भारत में रहने का अकेला तरीका यह है कि उन्हें हिंदुत्व की शर्तों पर रहना होगा और इस्लामी हिंदू बनना कबूल करना होगा. वहीं दूसरी तरफ दलितों को अपने साथ मिला कर, इनाम देकर या सजाओं की अनेक तहों वाली तरकीबों के जरिए उलझाए रखा गया. पहले 1981 में और 1985 में फिर से आरक्षण संबंधी दंगों में दलितों को इसी से मिलता-जुलता सबक सिखाया गया था, जो 2002 में मुसलमानों पर हुए हमलों से कहीं ज्यादा व्यापक थे और कहा जाता है कि जिनमें करीब 300 दलितों ने अपनी जान गंवाई थी. बार-बार होने वाले इन हमलों ने पहले से ही कमजोर उनकी चेतना पर अंकुश लगा दिए और जल्दी ही उन्हें 1986 के जगन्नाथ यात्रा जुलूसों में शामिल होते हुए देखा गया. लेकिन उनके दुख-दर्द पर इस मेल-मिलाप का कोई फर्क नहीं पड़ा. इसके उलट उन्होंने पाया कि उनकी बदहाली साल दर साल बढ़ती ही जा रही है, जैसा कि अत्याचारों के आंकड़े इसे उजागर करते हैं. आमफहम धारणा के उलट, दलितों पर अत्याचार करने में गुजरात हमेशा ही सबसे ऊपर के राज्यों में रहा है. भाजपा ने कभी भी यह दावा करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया कि गुजरात दलितों के खिलाफ अपराधों की सबसे कम दरों वाला राज्य है. हाल ही में इसने पिट्ठू 'दलित नेताओं' और 'बुद्धिजीवियों' का एक जमावड़ा खड़ा किया है, जो इसकी तरफ से यही राग अलापने का काम कर रहा है.

मिसाल के लिए उना अत्याचारों के संदर्भ में एनडीटीवी पर एक बहस के दौरान और फिर इसके बाद द वीक (7 अगस्त 2016) में लिखे गए एक लेख में नरेंद्र जाधव ने यह दिखाने की कोशिश की कि गुजरात बड़े अत्याचारी राज्यों में नहीं आता. संघ परिवार के साथ अपने तालमेल के लिए राज्य सभा सीट से नवाजे गए जाधव ने बताया, "2014 में ऊपर के तीन राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान और बिहार थे. अब बहस का मुद्दा बने गुजरात में असल में 2014 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की कहीं कम दर – 2.4 फीसदी – रही है जबकि ऊपर बताए गए राज्यों में यह 17 फीसदी से 18 फीसदी रही है." उन्होंने जानबूझ कर गलत आंकड़े बताए. क्राइम इन इंडिया 2014 में तालिका 7.1 घटनाओं की दरें मुहैया कराती है, जिनमें गुजरात की दर 27.7 (प्रति लाख एससी आबादी पर अत्याचारों की संख्या) है जो उत्तर प्रदेश के 18.5 से कहीं अधिक है. दिलचस्प बात यह है कि 2014 में गुजरात की हालत बेहतर दिखती है. इसके पहले से बरसों में गुजरात अत्याचारों के मामले में लगातार ऊपर के चार से पांच राज्यों में आता रहा है. 2013 में, जब आने वाले आम चुनावों और प्रधान मंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की ताजपोशी के दौर में नरेंद्र मोदी का वाइब्रेंट गुजरात प्रचार अभियान अपने चरम पर पहुंचा, दलितों के खिलाफ अपराधों की दर इसके पहले वाले साल 2012 के 25.23 से बढ़ कर 29.21 हो गई थी. इसने राज्य को देश का चौथा सबसे बदतर राज्य बना दिया. हत्या और बलात्कारों जैसे बड़े अत्याचारों के मामले में भी गुजरात ज्यादातर राज्यों को पीछे छोड़ते हुए ऊपर बना हुआ है. [देखें मेरा लेख: क्यों भाजपा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं दलित]

गुजरात में दलितों के आंदोलन ने सीधे-सीधे इन मतलबी दलित नेताओं और बुद्धिजीवियों को किनारे कर दिया है. इसने दिखाया है कि दलितों का सामूहिक आक्रोश खुद ही अपना चेहरा, अपने संसाधन और अपनी विचारधारा हासिल कर लेता है. द्वंद्ववाद का यह अनोखा फेर है कि दलितों की मुसीबतों का हल हिंदू राष्ट्र की प्रयोगशाला में तैयार हो रहा है!


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