BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 7

Published on 10 Mar 2013 ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B. R. AMBEDKAR BHAVAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.PALASH BISWAS (JOURNALIST -KOLKATA) DELIVERING HER SPEECH. http://www.youtube.com/watch?v=oLL-n6MrcoM http://youtu.be/oLL-n6MrcoM

Wednesday, March 7, 2012

तिग्‍मांशु के बीहड़ में बागियों की तलाश अब भी जारी है

तिग्‍मांशु के बीहड़ में बागियों की तलाश अब भी जारी है



 आमुखसिनेमा

तिग्‍मांशु के बीहड़ में बागियों की तलाश अब भी जारी है

6 MARCH 2012 ONE COMMENT

♦ संदीप ठाकुर

हैकिंग की वजह से मोहल्‍ला लाइव पर बहुत लाइव गतिविधियां फिलहाल संभव नहीं। फिर भी हम कुछ कोशिशों के सहारे थोड़ी-बहुत हलचल शुरू कर रहे हैं। मोहल्‍ला लाइव के नये तेवर में आने की प्रतीक्षा करें। इस बीच पान सिंह तोमर जैसी शानदार फिल्‍म रीलीज हुई है, जिस पर हमारे पास कई समीक्षाएं आयी हैं। हम एक के बाद एक उन्‍हें प्रकाशित करेंगे : मॉडरेटर

तिग्मांशु केवल फिल्म नहीं बनाते बल्कि किसी घटना का वास्तविक मूल्यांकन सामाजिक व सांस्कृतिक बिंबों व प्रतीकों का नायाब चित्रण करते हैं। उनके समकालीन मिलन लूथरिया की सुपरहिट फिल्म 'द डर्टी पिक्चर' भी उसी पैटर्न पर अपने समय की सिनेमाई संस्कृति के दर्शन कराती है।

वैसे सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्‍में बनना कोई नयी बात नहीं लेकिन पुरानी बात ये है कि हम पुराने चश्मे से अभी तक उसे देखते जा रहे हैं। लोगों में सिनेमा में नये तत्व की खोज को लेकर, अभी कोई खासा उत्साह नजर नहीं आता और निर्देशक भी प्रयोग करने से अभी डरते हैं।

पान सिंह तोमर के माध्यम से यह एक ऐसी खोज है, जिसका दायरा अब तक बीहड़ों तक सीमित था, जो अब असीमित हो गया है। तिग्मांशु के बीहड़ों में बागियों की तलाश अभी तक जारी है, वे लगभग पिछले दो दशकों से वहां के सामाजिक राजनीतिक व सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाये हैं, जिनका फिल्‍मी सफर 'द बैंडिट क्वीन' में कास्टिंग डाइरेक्टर की भूमिका से, पहली निर्देशित फिल्म हासिल (2003) से अब तक की पिछली फिल्म साहेब बीवी और गैंगस्टर (2011) तक जारी है।

वे हमेशा से ही कस्बाई संस्कृति से प्रभावित रहे हैं, यह फिल्म उसी संस्कृति से प्रभावित हमे गंवारू व बीहड़ों की संस्कृति से परिचय कराती है।

इस फिल्म के पहले सीन मे, ठेलेनुमा रिक्शा सड़क पर धीमी रफ्तार से दौड़ रहा है। उस पर सवार एक इंसान हाथ में एक भोंपू लिये, शायद एक फिल्म के रीलीज होने के बारे में गला फाड़े जा रहा है। वैसे वह बीच में सदाबहार फिल्मी गाने भी चला सकता है। उसी भागते हुए रिक्शे पर एक पोस्टर भी है, जो आप कभी भी कहीं भी किसी भी उदासीनता व बदहाली झेल रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमाहाल पर लगे पोस्टर जैसा हो सकता है, जो आप को कभी भी तंगनुमा गलियों व कस्बाई शहरों के एकमात्र सार्वजनिक शौचालय या कूड़ाघरों के आसपास लगे मिल सकते हैं। वह शायद उस समय यही बताना चाहता हो, उनका असली हीरो वही है, जो घोड़े पर सवार कारतूस से भरे कमरबंद व माथे पर काले या लाल रंग का चटखारा तिलक लगा हो और जिसके कंधे पर दो नाली बंदूक सवार हो।

शायद उस समय पत्रकारों पर काम का बोझ ज्यादा होता होगा, रिपोर्टिंग करने से लेकर सुबह-सुबह अखबार बांटने तक का नेक काम खुद ही करना पड़ता होगा। फिर भी उस फट्टू पत्रकार के पास चर्बी ज्यादा रहती है, देखने से ऐसा लगता है वह कभी भी सुबह चार किलोमीटर नहीं दौड़ सकता क्‍योंकि उसे रेस हारने का डर नहीं है। यकीनन उस पत्रकार को शहर की आइसक्रीम खाने का अच्छा अनुभव है।

अच्छी आइसक्रीम खाने का लाइसेंस अब सिर्फ दो लोगों के पास है, जो इस देश में अंग्रेजों का कानून अब तक चला रहे हैं और जो लोग उस कानून से चल रहे हैं … अगर तीसरा कोई आइसक्रीम खाने की कोशिश करता है, तो वह बागी हो जाता है।

बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में

यह डायलाग कुछ ज्यादा सोचकर या समझ कर नहीं लिखा गया होगा। हां अगर बीहड़ क्वीन फूलन देवी अब तक पार्लियामेंट में होती, तो उनका बयान इस मसले पर जरूर आता।

इरफान खान हर बार की तरह अपने निभाये गये पिछ्ले किरदार को क्यों ज्यादा चुनौती देते हैं? उनसे यह यक्ष प्रश्न अगर किसी टीवी इंटरव्यू में पूछा गया होगा, तो उसका जवाब उन्‍होंने जरूर दिया गया होगा। हां यह फिल्म देखने मात्र से या भले ही कुछ समय के लिए, लेकिन आम दर्शकों ने अपना रीयल हीरो जरूर खोज लिया होगा। फिल्म को देखते वक्त कहीं-कहीं या कभी-कभी गाने के बोल सुनाई पड़ते हैं, जिसको ज्यादा इंपोर्टेंस देने की जरूरत नहीं है, क्‍योंकि इस पिक्चर के हीरो को गाना पसंद नहीं है।

वैसे इस फिल्म को देखने के बाद, कुछ लोग अपने गांव या कस्बे के आस-पड़ोस में विराजमान किसी पप्पू या कल्लू की चाय की दुकान पर, अगले कुछ हफ्तों तक, उस पात्र के बारे में जरूर बात करेंगे, जो सामाजिक समस्याओं से जूझते उस समाज के लिए कई मजेदार टिप्पणी या तंज मुफ्त में या कुछ चंद रुपये खर्च करने के बाद उनके शब्दकोश को दिया है।

पंजाब यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई करने वाली माही गिल को भी नहीं पता होगा कि इतनी जल्दी उनके बारे में कोई सार्थक चर्चा करेगा, जिसके लिए सिने जगत की मशहूर अभिनेत्री मल्लिका शेरावत जैसी कई अभिनेत्रियां वर्षों से तरस रही हैं।

वहीं बीहड़ में बसे सुदूर गावों की महिलाएं अगर इस फिल्म को देखेंगी, तो शायद ही उनके पास कोई स्पेस हो जो किसी भी महिला पात्र को कापी कर सकें। और हां बीहड़ में अब भंवर सिंह जैसे लोग शायद ही बचे हों, जो सिर्फ किसी निर्दोष बूढ़ी महिला को बदले की भावना से मार देते हों और लल्ला जैसे जवान लड़के को पीटने की अधिकतम सीमा के बाद तरस आ कर छोड़ देते हों।

वैसे भी इस फिल्म को देखने में भाषाई समस्या हो सकती है लेकिन अगर जिसने विशाल भारद्वाज की धम-धम धड़म धड़इया यानी 'ओमकारा' और अनुराग कश्यप निर्देशित 'गुलाल' मन लगाकर देखी होगी, वो ज्यादा शिकायत नहीं करेगा।

यह फिल्म सामंतवादी व्यवस्था में वर्चस्ववादी संस्कृति को लेकर उपजी एक रार है, जिसके मुख्य पात्र अपने ही लोगों द्वारा सताये जाने की घटना से गंभीर रूप से पीड़ित हैं। फिल्म के मुख्य पात्र ने उस दौर में आर्मी ज्वाइन किया था, जब देश आजाद हो रहा था और तब ज्यादातर लोग चौथी पास नहीं कर पाते थे। फिल्म का मुख्य पात्र एक ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और अपने उसूलों से गैर समझौतापरस्त देश का राष्ट्रीय धरोहर था। जिसका मन बहुत करता है कि अपनी मां की रक्षा के लिए कुर्बानी दे। लेकिन उस राष्ट्रीय धरोहर की कीमत उसके मेडल और सर्टिफिकेट चुकाते हैं, जो एक पुलिस थाने में बेरहमी से मेज से जमीन पर फेंक दिये जाते हैं। दरअसल इस देश में क्रिकेट को छोड़कर एकाध ही ऐसे खेल हैं, जिसमें खेलने वाले खिलाड़ियों के व उनके जीते हुए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मेडलों की इज्जत की जाती है या उनको कोई बड़ा नाम या इनाम मिलता है। हां, लेकिन उसकी तवज्जो तब जरूर बढ़ जाती है, जब तीन राज्यों की पुलिस कोई बड़ा गुप्त इनाम व मेडल या सीधे कहें तो प्रमोशन पाने के चक्कर में बीहड़ों में खाक छानती है। वैसे बीहड़ों में सबसे बड़ी सजा गद्दारी की होती है, जिसमें सामूहिक हत्या होना एक आम बात है और उसकी कीमत गांव के सरपंच व उसके लोग भी चुकाते हैं।

खैर पान सिंह की बदले की भावना उसे बागी तो बना देती है और वह अपने परिवार के प्रति हुए अमानवीय कृत्यों का बदला भी लेता है और चचेरों द्वारा हड़पी हुई जमीन भी वापस पा लेता है लेकिन उस पात्र को चाहने वाले दर्शको के मन में वो सवाल अब तक गूंज रहा होगा और शायद जवाब भी मांग रहा होगा, जो उसका चचा मरते वक्त तो नहीं दे पाया था लेकिन हो सकता है, ऊपर जाकर उसे जरूर कुछ बताये। वैसे अब फिल्मों में हीरो कम पात्र ज्यादा मिलते हैं, यह अब आपके ऊपर निर्भर करता है कि आपका हीरो कौन है।

मुख्य पात्र अपने आखिरी दम तक उस नहर तक पहुंचने की कोशिश करता है क्योकि वह सरेंडर का मतलब अच्छी तरह जानता है। आखिरकार चंबल का चैंपियन अपनी जिंदगी का आखिरी रेस दौड़ता है लेकिन उस स्टीपेलचीज चैंपियन को पता नहीं होता कि वह इस बार रेस हार जाएगा।

(संदीप ठाकुर। अंबेडकर सेंट्रल युनिवर्सिटी से पत्रकारिता एवं जनसंचार से परास्नातक। पत्र-पत्रिकाओं एवं अखबारों के लिए स्वतंत्र लेखन। पिछले दो सालों से सामाजिक कामों में विशेष रुचि। नदियों के संरक्षण को लेकर कई छोटे-बड़े आंदोलनों से जुड़ाव। 'एहसास मंच' नाम से छात्रो के एक सांस्कृतिक समूह का संचालन। sandeep.filmcritic@gmail.com पर संपर्क करें।)

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